अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल

Amrita Rai

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल हो चुके हैं लेकिन आज भी पूरी दुनिया में महिलाएं अपने हक के लिए संघर्षरत हैं। भारत में भी संवैधानिक बराबरी के बावजूद हर स्तर पर महिलाएं अपने हक के लिए लड़ रही हैं। प्रस्तुत है इस मौके पर दिए भाषण का अंश- जिसका मुद्दा था- भारतीय मीडिया में महिलाओं की हैसियत और चित्रण।

New Delhi: President Pranab Mukherjee presents an award to nonagenarian V Nanammal, a Yoga enthusiast from Tamil Nadu, at the Nari Shakti Puraskar 2016 function at Rashtrapati Bhawan in New Delhi on Wednesday. PTI Photo

New Delhi: President Pranab Mukherjee presents an award to nonagenarian V Nanammal, a Yoga enthusiast from Tamil Nadu, at the Nari Shakti Puraskar 2016 function at Rashtrapati Bhawan in New Delhi on Wednesday. PTI Photo

मीडिया में महिलाओं की हैसियत – विषय पर बात करने से पहले मैं ये बात करना चाहूंगी कि मीडिया है क्या…दरअसल मीडिया वो माध्यम है जिसके जरिए जनता की तकलीफें, मुसीबतें, जीवन संघर्ष या उपलब्धियां हम दूसरों तक पहुंचाते हैं, उनकी आवाज़ बनते हैं। तो जब हम ये कर रहे होते हैं तो हम सूचना के वाहक शायद अनभिज्ञ होते हैं कि ये सूचनाएं कैसे महिलाओं के सश्कितकरण का काम कर रही होती हैं.. या कमज़ोर करने का…..इसमें कोई शक नहीं कि महिलाएं आज मीडिया में सशक्त हस्ताक्षर हैं, उनकी सम्पादकीय पहचान भले ही न हो, पत्रकारिता की वो दमदार foot soldier हैं । लेकिन, इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद, वे मीडिया को महिलाओं के मुद्दों और उनकी दुनिया के सरलीकरण से आगे नहीं ले जा सकी हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पर्दे पर महिलाएँ छायी हुई हैं। पत्रकार के रूप में महिलाओं ने अपना नाम भी स्थापित किया है। लेकिन अंग्रेज़ी के इक्का दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो हिन्दी माध्यम में कोई महिला पत्रकार संपादक नहीं बन सकी है। क्या एक ग्लास सीलिंग है पूरे स्ट्रक्चर में? क्या एडिटोरियल मैनेजमेंट स्किल की कमी है महिलाओं में ? मैं भी इसकी वजह ढूंढ रही हूँ। तो क्या यहां महिलाएँ सजावट के लिए इस्तेमाल हो रही हैं?

दरअसल महिलाओं के वर्कफ़ोर्स के रूप में उभरने के बावजूद नियम कानून मर्दों के हाथ में है।  महिलाएँ पुरूषों के बनाए सिस्टम में काम करने को मजबूर हैं जहाँ उनकी सामाजिक, मानसिक और शारीरिक ज़रूरत के हिसाब से नियम नहीं हैं। यानी नौकरी के अवसर में तो बराबरी है लेकिन  सोच के स्तर पर सिस्टम उनके लिए नहीं बना है। महिलाओं को घर और काम के बीच संतुलन का हक होना चाहिए। अन्यथा उन्हें घर और काम के बीच एक को चुनने की मजबूरी होती है और योग्यता से समझौता करना होता है। कई बार ये भी महसूस किया गया है कि महिलाओं को जगह देकर एहसान जताया जा रहा है।

एक दूसरा पहलू महिला पत्रकारों के काम के बारे में या जिम्मेदारी के बारे में है, जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहती हूँ। जो आज के विषय से मेल भी करता है कि मीडिया में महिलाओं का चित्रण कैसा है। मीडिया में महिला पत्रकारों की बड़े पैमाने पर भागीदारी के बावजूद पत्रकारिता केवल सेट पैमाने या मानदंडों पर ही हो रही है। जिसमें राजनीति है, खेल है। स्कैंडल है। आपदाएँ हैं। मनोरंजन है। इस दायरे से बाहर निकलने या इसे तोड़ने का कोई विमर्श नहीं है। ख़ुद महिला पत्रकारों के बीच भी कोई नारी विमर्श नहीं है। महिलाएं भले ही उसी पृष्ठभूमि से आती हों, जिससे पुरुष आते हैं, फिर भी उनके हालात अलग हैं, उनके मुद्दे अलग हैं,  उनकी संवेदनाएँ अलग हैं। किसी मुद्दे को लेकर उनकी अलग सोच है, आज की पत्रकारिता में इसकी कोई झलक नहीं मिलती। मीडिया किसान का मुद्दा उठाता है, लेकिन महिला किसान का मुद्दा सरोकार से बाहर है । दलित – आदिवासियों की बात गाहे बगाहे हो भी जाती है, दलित महिलाओं की, आदिवासी महिलाओं की बात ग़ायब है । महिलाओं को केवल और केवल एक सपाट घेरे में समेट दिया गया है, कि वे केवल महिला हैं। उनके सभी सरोकार केवल एक ही prism से देखे जाते हैं। मानो सभी कामकाजी परिस्थितियाँ, सभी आर्थिक सामाजिक फ़ैक्टर, सभी भौगोलिक भिन्नताएं सिर्फ़ और सिर्फ़ दैहिक दायरे में सिमट कर, अपनी विशिष्टता अपनी complexities खो देते हैं, महिला केवल महिला रह जाती है, उसके तमाम सरोकार केवल और केवल उसके महिला होने से शुरू हो कर, वहीं तक limit हो जाते हैं।

ये अनायास नहीं है, कि मीडिया में, ख़ासतौर पर टीवी मीडिया में आए दिन महिलाओं के चरित्र हनन  पर, उनपर सस्ती टिप्पणियों पर कभी भी किसी मीडिया ऑफ़िस में कोई पुरज़ोर विरोध के स्वर नहीं उठे। पुरुष दम्भ और पुरुषवादी सोच के चलते जो चित्रण किया जाता है, जो भाषा गढ़ी जाती है, जो पहलू परदे पर पेश किया जाता है, वह निश्चित ही महिलाओं को नागवार गुज़रता है पर वे न तो उसे रोक पाती हैं और न ही विरोध दर्ज कर पाती हैं। नतीजा, नारी मुद्दों पर मीडिया डिस्कोर्स गिरते गिरते केवल और केवल सनसनी तक सीमित रह गया है।

आखिर में मैं ये कहना चाहूंगी कि महिला पत्रकार केवल नौकरी नहीं करती हैं, या यूँ कहें, कि जब वो पत्रकार बनने चली थीं, तो केवल नौकरी करने नहीं चली थीं। वे बदलाव का एजेंट बनना चाहती थीं। वे समाज को समझने और उसे बदलने की ललक ले कर आयी थीं और आज भी आ रही हैं। लेकिन मीडिया के आज के असेंबली लाइन प्रोडक्शन के सिलसिले की ऐसी गिरफ़्त में फँस जाती हैं कि केवल और केवल इस मीडिया मशीन का एक पुर्ज़ा भर रह जाती हैं। नौकरी की सुरक्षा, पत्रकारिता के ग्लैमर और सिस्टम की rigidity के चलते अपनी तमाम क्रांतिकारिता, समझ और संघर्ष को अपनी ख़ुद की बीट तक या ख़ुद की कॉपी तक सीमित कर देती हैं। महिला पत्रकार अपनी इस ऐतिहासिक सामाजिक भूमिका से निरपेक्ष रहेंगी, इससे इतर केवल assembly line production का पुर्ज़ा भर बन कर संतुष्ट हो जाएंगी तो ख़ुद मीडिया में भी बदलाव नहीं ला पाएंगीं। ग्लास सीलिंग टूटेगी नहीं, अपने हक़ के नियम क़ानून और स्पेस मिलेगी नहीं, बराबरी का हक़ केवल और केवल नौकरी पाने और नौकरी करने तक ही सिमटा रहेगा।

वैसे एक सच ये भी है, की हम सब महिला पत्रकार इन सवालों से अक्सर रूबरू होती रहती हैं, चाहे ऑफ़िस में या फिर अपने ही अंतर्मन मैं। लेकिन फिर भी हमारे अंदर विचलन क्यों नहीं पैदा हो रहा है ? क्यूँ हम ख़ुद ही विमर्श से दूर है? क्या महिलाएं हमेशा मेल सेंट्रिक यानी पृत-सत्तात्मक व्यवस्था में प्रश्रय ही ढूँढती रहेंगीं और नौकरी और तनख़्वाह की primacy के चलते अपनी बीट अपनी कॉपी के घेरे में क़ैद रहेंगी? या इससे आगे कोई रास्ता बनाएंगी?  इसी ओपन सवाल के साथ मैं अंत करना चाहती हूँ।