दुधारी तलवार है सोशल मीडिया

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कुछ हफ्ते पहले कॉमेडियन कपिल शर्मा ने सोशल मीडिया पर भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया . उन्होंने न केवल प्रधानमंत्री को टैग किया बल्कि अच्छे दिनों पर तंज भी कसा. कपिल को उम्मीद थी उनका शो हिट कराने वाली जनता इस मुद्दे पर भी उनका साथ देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सोशल मीडिया पर तो उनका मजाक उड़ा ही, राजनीतिक पार्टियों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी. इस एपिसोड से एक बार पुनः यह बात सिद्ध हो गई है कि सोशल मीडिया चलाने का कौशल हर किसी के पास नहीं होता.

एक अनुमान के मुताबिक़ इन दिनों देश में 12 करोड़ लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं . इसमें से एक करोड़ 60 लाख के आसपास ट्विटर और लगभग 6 करोड़ फेसबुक पर उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. इस वजह से नेताओं में भी अभिव्यक्ति के इस नए हथियार की ललक दिन ब दिन बढ़ रही है. चुनाव प्रचार में भी अब पारंपरिक साधनों के साथ साथ सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल होता है.दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह आम आदमी पार्टी ने जीत दर्ज की , उसे देखते हुए सभी पार्टियों ने सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है . अब उत्तरप्रदेश सहित अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी इसकी झलक देखने को यक़ीनन मिलेगी .

इसकी एक वजह यह भी है कि हर उम्र और तबके के लोग किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से जुड़े हैं. खबरों के साथ-साथ विचारों को वायरल होते देर नहीं लगती. जितनी जल्दी पोस्ट लोगों को पसंद आती है,उतनी तेजी से उसका नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है. दूसरे शब्दों में विचार और विवाद के बीच महीन रेखा है, जो अधिकतर लोगों को समझ नहीं आती. कई बार जिसे हम विचार समझते हैं, वो विवाद का कारण बन जाता है. इन विचारों का विस्फोट पहुंच की व्यापकता पर भी निर्भर करता है, लिहाजा बेहद आवश्यक है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति अपने विचारों को शब्दों का रूप दें तो उनका भाव नपातुला हो.

ऐसे उदाहरण हैं, जब अतिरेक और नासमझी ने अनायास ही किसी विवाद को जन्म दिया . पंकजा मुंडे की सूखा सेल्फी का उदाहरण देखिए . महाराष्ट्र के सूखा पीड़ित इलाकों के दौरे पर गईं मंत्री ने यह सोचकर सूखे तालाबों के साथ सेल्फी सोशल मीडिया पर शेयर की कि लोग दौरे की गंभीरता समझेंगे. मगर प्रतिक्रिया एकदम उलट रही. सेल्फी को सूखा पर्यटन कहा गया और उन्हें फजीहत झेलनी पड़ी. शशि थरूर को भी इसी तरह सोशल मीडिया पर सक्रियता के कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा था. एक ट्वीट के चलते उन्हें बड़े विवाद का सामना करना पड़ा . थरूर सोशल मीडिया के इस्तेमाल में माहिर नेताओं में से हैं . कई मौकों पर वे इसका परिचय दे चुके हैं . लेकिन वो भी इस दुधारी तलवार का सटीक आकलन नहीं कर सके.

भारत ही नहीं पूरीदुनिया में ऐसे लोगों की लंबी चौड़ी सूची है, जिन्हें मीडिया के इस तेज तर्रार रूप को सही ढंग से संभालना नहीं आया. ब्रिटेन की राजनीति में ब्रुक्स न्यूमॉर्क को ऐसे राजनेता के रूप में थे , जो महिलाओं के हक में आवाज उठाते थे . उनके कैंपेन सोशल मीडिया पर उम्मीद से ज्यादा सफलता हासिल करते थे.

महिलाओं के बीच ब्रुक्स की छवि हीरो की थी, मगर आज हर तरफ से उन पर उंगलियां उठ रही हैं. सोशल मीडिया पर ब्रुक्स अब भी छाये हैं, पर मजाक के रूप में. ब्रुक्स ने अभिव्यक्ति के इस साधन का इस्तेमाल कुंठित इच्छा पूर्ति के लिए किया. जब एक अंडरकवर पत्रकार ने सोशल मीडिया पर खुद को कंजर्वेटिव पार्टी की पी आर गर्ल के रूप में पेश किया तो ब्रुक्स अश्लील भावनाओं का इजहार करने से स्वयं को रोक नहीं सके. इस पूरे विवाद से केवल ब्रुक्स को नहीं, प्रधानमंत्री डेविड कैमरून को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा .

सोशल मीडिया एक साथ करोड़ों लोगों तक पहुंच की विशेषता के चलते राजनीतिज्ञों को लुभा रहा है . आज शायद ही कोई ऐसी शख़्सियत हो जिसका फेसबुक या ट्विटर अकाउंट न हो. अपने विचारों के साथ साथ आस पास की घटनाओं और आरोप प्रत्यारोप के लिए इसी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है.

राजनेता समझते हैं कि यहां उठाई गई आवाज की गूंज दूर तलक सुनाई देगी, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभाव उनकी समझ से बाहर हैं. जो इस दुधारी तलवार के दोनों सिरों को बखूबी पहचानता है, उसके लिए सकारात्मक रूप से सुर्खियों में रहना आसान है. उदाहरण के लिए सुषमा स्वराज के ट्विटर पर तकरीबन 5 63 मिलियन फॉलोअर्स हैं. कुछ वक्त पहले अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने ट्विटर पर उनकी सक्रियता को देखते हुए उन्हें सुपर मॉम ऑफ स्टेट के नाम से सम्बोधित किया था. अखबार ने लिखा था कि वे जिस तरह से विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए तत्परता से अभियान चलाती हैं, वो सराहनीय है. विदेशमंत्री की तरह रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने भी सोशल मीडिया के सकारात्मक प्रभाव को समझकर वो लोकप्रियता हासिल कर ली है, जो शायद दूसरे किसी रेलमंत्री को इतने कम समय में नहीं मिली. शिकायतों को दबाकर बैठने वाला रेलवे अब महज एक ट्वीट पर हरकत में आ जाता है.

ज़ाहिर है सोशल मीडिया के फायदे तभी तक हैं, जब तक हम विचारों की अभिव्यक्ति में बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करते हैं. जहां हम इसमें चूके, वहां नुकसान लाजमी है.