पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर

Rajesh Badal

Journalist-Rajendra-Mathur

भारतीय हिंदी पत्रकारिता इन दिनों संक्रमण काल का सामना कर रही है . अनेक विधाएँ धीरे धीरे दम तोड़ती नज़र आ रही हैं .सामाजिक नज़रिए से उनकी आवश्यकता है ,लेकिन बाजार का दबाव कुछ ऐसा है कि साहसपूर्ण मुक़ाबला करना पत्रकारों और संपादकों के लिए आसान नहीं है .मीडिया के नए और आधुनिक अवतारों ने विचारपूर्ण लेखन ,ऐतिहासिक घटनाओं का निरपेक्ष लेखन ,खोजी पत्रकारिता ,ग्रामीण पत्रकारिता ,विकास पत्रकारिता ,शानदार संपादकीय टिप्पणियों और गुणवत्ता से परिपूर्ण संपादकीय पृष्ठों को अखबार के पन्नों से विलुप्त सा कर दिया है .टेलिविजन ने हिंदुस्तान को अप मार्केट और डाउन मार्केट की दो श्रेणियों में बाँट दिया है .अप मार्केट याने महानगरों और शहरों पर केंद्रित ख़बरें .इस श्रेणी के बारे में धारणा है कि उसे पढ़े लिखे लोग देखते हैं .उससे टीआरपी बढ़ती है और विज्ञापन मिलते हैं .डाउन मार्केट वह श्रेणी है ,जिसमें भारत की नब्बे फ़ीसदी आबादी रहती है .अर्थात जानबूझकर देश की प्रतिनिधि आवाज़ की उपेक्षा .इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि प्रिंट माध्यम में भी टीवी की ख़बरें ड्राइविंग सीट पर जा बैठीं हैं .चैनल उद्योग आने से पहले अखबार ड्राइविंग सीट पर बैठे हुए थे .उन्नीस सौ इक्यानवे से इस पतन की शुरुआत हो गई .यही साल हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष राजेन्द्र माथुर के हमारे बीच से जाने का साल है .तबसे पच्चीस साल हो गए .हर साल राजेन्द्र माथुर और शिद्दत से याद आते हैं .कुछ जानकार कहते हैं कि आज राजेन्द्र माथुर होते भी तो शायद कुछ न कर पाते .मेरा निवेदन है कि या तो उन्हें राजेन्द्र माथुर काल के दौरान भारतीय पत्रकारिता के सामने आईं चुनौतियों की जानकारी नहीं है या फिर उन्होंने राजेन्द्र माथुर को पढ़ा नहीं है .जब आपके बीच अभिमन्यु की तरह कोई मौजूद रहता है तो बाज़ार के चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता मिल जाता है .अफ़सोस ! आज कोई ऐसा अभिमन्यु पत्रकारिता में नज़र नहीं आता .मैं निराशावादी नहीं हूँ ,लेकिन आज पत्रकारिता के पेशे में परिस्थिति जन्य दबाव इतने हैं कि अंधी सुरंग में चलते हुए मशाल थामने का वक़्त भी कोई नहीं निकाल पा रहा है .राजेन्द्र माथुर के लेखन की यह मशाल हरदम मार्गदर्शन के लिए मौजूद है.

आज पत्रकारों की साख में गिरावट आई है .प्रामाणिक ,निष्पक्ष और सरोकारों पर केंद्रित लेखन पत्रकारिता से दिनों दिन अपने अस्तित्व की लड़ाई में हारता नज़र आ रहा है .यह चिंता की बात है .आज़ादी के आंदोलन से लेकर आपातकाल तक और आधुनिक तकनीक से लेकर माध्यमों के नए अवतारों तक का घटनाक्रम गवाह है कि जब भी कलम ने हालात के आगे हथियार डाले तो स्थितियाँ बिगड़ीं ही हैं .अतीत को भूलने का खामियाज़ा हमें भुगतना ही पड़ेगा .जो क़ौम अतीत को भूलती है ,उसकी जगह भी इतिहास का कूड़ेदान ही है.

अतीत की बुनियाद पर हमेशा भविष्य की इमारत खड़ी होती है .जब तक इतिहास की ईंटें मज़बूत रहतीं हैं , हर सभ्यता फलती-फूलती और जवान होती है .लेकिन जैसे ही ईंटें खिसकने लगतीं हैं,इमारत कमज़ोर होती जाती है .शिल्पियों ने अगर सही ईंट का चुनाव न किया तो घुन लगता है .इमारत ज़र्ज़र होती है .ज्ञान के जिस गारे का इस्तेमाल ईंट तैयार करने में होता है,वह मिलावट की माँग नहीं करता .भारतीय लोकतंत्र की इमारत से इन दिनों ज्ञानवान ईंटें खिसकने की शुरुआत हो चुकी है .इमारत में रहने वाले बेख़बर हैं .सवाल यह है कि किस भट्टे से विचारों की आँच में पकी ईंटों को लिया जाए ? न वो भट्टे रहे न वो ईंटें ,न वो गारा और न वो शिल्पी.

आज़ादी के आंदोलन में पत्रकारिता के कई शिखर पुरुषों ने आहुति दी है .नींव के उन पत्थरों ने देश की इमारत को स्वतंत्रता के बाद अनेक साल मूल्यों और सरोकारों से जोड़ कर रखा .उनकी अगली पीढ़ी ने भी यह ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाई .लेकिन इसके बाद हम लोग इस विरासत और परंपरा को सँभाल कर नहीं रख पाए .अतीत और वर्तमान का प्रामाणिक लेखन अब अपेक्षाकृत नहीं के बराबर है।बाज़ार का दबाव,रीढ़वान संपादकों का अकाल और पत्रकारिता का पेशा बन जाना इसके मूल में है .मालिकों और राजनेताओं ने मीडिया को मंडी में तब्दील कर दिया है .हर मोड़ पर बिकने को तैयार और हर मोड़ पर ख़रीददार .अफ़सोस इस वातावरण में जो नई ईंटें बन रही हैं ,वे इसी को असल पत्रकारिता समझ बैठी हैं .आने वाली नस्लें भी ऐसे ही आती रहेंगीं .एक अँधेरी सुरंग में भटकते हम लोग.

फिर इस माहौल में आशा की किरण कौन सी है?

उत्तर है – तकनीक. अगर उस तकनीक का संरक्षण हम कर सकते हैं ,जिसके ज़रिए विचारों के भट्टे में पकाई ज्ञानवान ईंटों से एक बार फिर मज़बूत इमारत खड़ी की जा सकती है तो निराशा के अँधेरे में डूबने का कोई कारण नज़र नहीं आता .यह तकनीक उस लेखन में उपलब्ध है, जो राजेन्द्र माथुर दे गए हैं .आज हम देश और दुनिया की मौजूदा कहानी पत्रकारिता के निरपेक्ष और प्रामाणिक चश्में से देखने-लिखने की आदत भूल चुके हैं .मगर आज़ादी के बाद चालीस-पचास साल की पत्रकारिता हमें भूलने की इजाज़त नहीं देती थी .इसी कारण राजेन्द्र माथुर ने हमारे सामने हिंदुस्तान के सफ़र का जो दस्तावेज प्रस्तुत किया है,वैसा लेखन पत्रकार-संपादक तो छोड़िए,इतिहासकार भी नहीं कर पाते .विडंबना है कि आधुनिक भारत की कहानी समग्र रूप से नहीं लिखी गई है .जो टुकड़ा-टुकड़ा खंडित इतिहास हमारे सामने आया है,वह निजी अनुभवों और पूर्वाग्रहों की झलकी मात्र है ।अनेक ज्ञानवान पाठक मुझसे असहमत हो सकते हैं .उन्हें अधिकार है .मगर मेरा निवेदन है कि राजेन्द्र माथुर को एक बार पढ़ लीजिए .आपकी धारणा बदल जाएगी .अफ़सोस ! वो हमारे बीच से जल्दी चले गए .भारत में आज़ादी के बाद इतिहास लेखन पर उन्होंने लिखा था,” आज के और 1947 से पहले के इतिहास लेखन में एक बड़ा फ़र्क़ है .इसे ध्यान रखना होगा .जब अँगरेज़ थे तो हमारी बुराई बताया करते थे .हमारे मालिक थे.अपने आपको ऊँचा साबित किए बिना साम्राज्य नहीं चला सकते थे,लेकिन आज भारत के महत्त्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की नज़ाकत समझते हुए कोई इतिहासकार भारत की सच्चाइयों को कड़वे और नीमचढ़े ढंग से प्रस्तुत नहीं करेगा।उसका लहज़ा प्रियम ब्रुयात का ही होगा,जिससे भारत में उसे दरवाज़े बन्द न मिलें .भारत के विद्वानों पर यह ज़िम्मेदारी आ गई है कि वे सच्चाई को निर्मम ढंग से उजाग़र करना और ग्रहण करना सीखें ताकि अपनी ही गुलाबी ग़लतफ़हमियों में गिरफ़्तार होकर हम फिर से पतनोन्मुख न बन जाएँ “.

आज़ादी मिले सिर्फ़ दस पंद्रह बरस बीते हैं .देश के नवनिर्माण का सपना धुँधलाने लगा है ।राष्ट्रीयता का संकल्प कपूर की तरह उड़ता जा रहा है और माथुर हालात का बयान कुछ इस तरह करते हैं -“अगर भारत का राजनीतिक वातावरण दिन ब दिन हताश,सूखा और बंजर होता जा रहा है तो यह इसलिए चिंता का विषय नहीं है कि हिमालय पार के पागल क्रांतिकारी हम पर चढ़ आएँगे .चीन के ख़िलाफ़ तो दुनिया की दूसरी ताक़तें हमें गारन्टी दे सकतीं हैं लेकिन अपने आप के ख़िलाफ़ हमें कौन गारन्टी देगा ? हम यह क्यों माने बैठे हैं कि हमारी इमारत को कोई धक्का नहीं देगा तो वह कभी गिरेगी ही नहीं.भारत की ज़मीन पर यदि चीन के घुड़सवार नहीं आए तो हमारी प्रजातांत्रिक प्रणाली पर तानाशाही के घुड़सवार तो चढ़ाई कर ही सकते हैं .जैसा वे पाकिस्तान में कर चुके हैं .तब उन मूल्यों का क्या होगा,जो इन सोलह वर्षों में हमने बड़ी मेहनत से क़ायम किए हैं.चीन की चुनौती का जवाब देने के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि हम जनता में उज्जवल भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न करें .आस्था का अभाव तेज़ाब की तेज़ी से समाज की नींवों को गला देता है .यह हमें याद रखना चाहिए “।

हिंदुस्तान के इतिहास में नेहरू युग का अपना अलग महत्त्व है .उनके बारे में राजेन्द्र माथुर की कलम से निकला ,”अगर नेहरू को मूर्ति और अवतार न मान कर सिर्फ इंसान माना जाए तो उनके व्यक्तित्व की अनेक गहरी परतें एक के बाद एक खोलीं जा सकतीं हैं .मगर इस तरह व्यक्ति को समझने का रिवाज़ हमारे देश में कम है .हम महापुरुषों को ईश्वर का नुमाइंदा मानते हैं और मनुष्य -मनुष्य में भले ही फ़र्क़ होता हो ,लेकिन ईश्वर -ईश्वर में फ़र्क़ नहीं हो सकता .नेहरू से संबंधित सामग्रियाँ तो काफी सरगर्मी से बटोरी जाएँगीं .संभावना कम है कि उस सामग्री की व्याख्याएँ कम हों .इंटरप्रेटेशन की योग्यता भारत में अभी पूरी तरह उदित नहीं हुई है”.अठारहवें गणतंत्र दिवस पर वो हमारे सोच पर प्रहार करते लिखते हैं,”भारत सचमुच अजीब देश है .उन्नीस सौ बयालीस के अकाल में लाखों लोग कलकत्ता के फुटपाथों पर मर गए .इतने बड़े असन्तोष की आग में ब्रिटिश साम्राज्य का महल जल कर भस्म हो जाना चाहिए था और मुनाफ़ाख़ोरी का रिवाज़ भी।लेकिन वह नहीं हुआ। हिंदुस्तान में आग तब लगी,जब धर्म की बेमतलब लड़ाई शुरू हुई .पंजाब और बंगाल के धर्म युद्ध में लाखों सर कट गए और करोड़ों शरणार्थी बन गए “।

अतीत के अध्याय हमें किस तरह तुलनात्मक अध्ययन सिखाते हैं ,ज़रा देखिए-भारत की सभ्यता इस माने में अदभुत है कि इतना स्थिर समाज सदियों तक चीन के अलावा कहीं और नहीं रहा.लेकिन सामाजिक स्थिरता के साथ साथ जितनी राज्य गत अराजकता भारत में रही है ,उतनी पृथ्वी पर और कहीं नहीं रही .हमारा समाज हिमाचल की तरह अटल रहा .राजा और राज्य समुद्र की लहरों की तरह क्षणभंगुर रहे।ऐसा क्यों हुआ ?चक्रवर्ती राजा की अवधारणा के बाद भी सच्चे चक्रवर्ती उँगलियों पर आसानी से क्यों गिने जा सकते हैं ? चीन की तरह अखण्ड देश और अखण्ड समाज हम क्यों नहीं बना सके ?

भारतीय इतिहास ,उसके सोच और राजनीतिक व्यवस्था का मिश्रण लेखन हमारे पाठ्यक्रमों में हाशिए पर है .न मीडिया में और न अन्य शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में ।इस हाल में भारत की नई नस्लें विचार और दर्शन के बन्द दरवाज़ों को देखकर पनप रहीं हैं .ख़तरा बड़ा है .क्या हम इसे भाँप रहे हैं .शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में न सही तो कम से कम मीडिया संस्थानों में सोच के स्वस्थ्य बीज अंकुरित किए जाने चाहिए .एक एक बीज से विकसित वृक्ष समाज में मानसिक शीतलता और झूम झूम कर ताज़ी हवा के झौंके तो देता ही रहेगा .चालीस पैंतालीस बरस पहले राजेन्द्र माथुर की टिप्पणी देखिए -फूट कोई बाहर वाला नहीं डालता .फूट और एकता दोनों ही क़ौमों के भीतर बसतीं हैं .भारत का बँटवारा तो अँगरेज़ करके गए,लेकिन श्रीलंका को तो बाँट कर वे नहीं गए थे .फिर क्या कारण है कि अपनी आज़ादी के 38 साल बाद लंका विभाजन की कगार पर है .क्या कारण है कि पाकिस्तान 1971 में टूटा ? क्या कारण है कि अंगरेज़ों की विदाई के चौदह साल बाद 1974 में साइप्रस नामक द्वीप-देश दो भागों में बँट गया ? लेबनॉन की आबादी साथ साथ रहने का कोई उपाय क्यों नहीं खोज पा रही ? सारी दुनिया में फूट डालने वाले अंगरेजों के घर में क्या हो रहा है ? 1921 में आयरलैंड का बँटवारा किसने कराया ? 1969 से उत्तरी आयरलैंड सुलग रहा है और आतंकवाद को ख़त्म करने का तरीक़ा किसी सरकार को समझ नहीं आ रहा है .इस तरह संघीय ढाँचे में जहाँ भारत यूरोप से भी आगे निकल चुका है ,वहाँ ब्रिटेन अभी ग्रेट ब्रिटेन तक नहीं बन पाया .

कभी कभी लगता है कि भारतीय राष्ट्र -राज्य किसी जापानी सूमो पहलवान का ओवरकोट है ,जिसे कीकड़ ( दुबले ) बदन के आदमी ने पहन लिया है .यह कोट हमें मिला है .उसे अपने बढ़ते बदन के अनुसार हमने समय समय पर सिला नहीं है .लेकिन अब कीकड़ पहलवान चाहता है कि ओवरकोट की ज़रूरतों के मुताबिक़ शरीर का विकास हो और वह विराट आकार का बन जाए .विकास हो भी रहा है ,क्योंकि ओवरकोट को शरीर से अधिक महत्वपूर्ण मानना भारत की सनातन परंपरा है .पहले हम एक साँचा बना लेते हैं .फिर जीवन को उसमें ढालते हैं .ज़िल्द पहले,किताब बाद में .टेलीविजन पहले ,कार्यक्रम बाद में .राष्ट्र पहले ,राष्ट्रीयता बाद में .विवाह पहले ,प्यार बाद में .लेकिन भारत के बाल विवाह भी पश्चिम के वयस्क विवाहों से पुख्ता होते हैं कि नहीं ? इसलिए कह सकते हैं कि भारत की एकता इस शर्त पर क़ायम रहेगी कि जी जान से अखिल भारतीयता की क़द्र करने वाला जो वर्ग इस देश में है ,उसकी अस्मिता की क़द्र की जाए .उसने जो लक्ष्मण रेखाएँ खींच रखीं हैं ,उनका आदर किया जाए .यह सवाल महज चुनाव जीतने या हारने का नहीं है , सवाल यह भी है कि जो वर्ग भारत को शेषनाग की तरह टिकाए हुए है ,उसके स्वैच्छिक सहयोग के बिना कोई स्थिरता क़ायम रह सकती है ? जो देश स्थाई रूप से नाराज़ और असहमत हो ,वो क्या तेज़ी से तरक़्क़ी कर सकता है ?

दरअसल शब्द की सत्ता शाश्वत है .हर दौर में शब्द अपनी ताक़त बरक़रार रखता है .वह कभी बासा नहीं होता।क्या हम आज के पत्रकारों-संपादकों और मौजूदा दौर के इतिहास लेखकों को यह समझा सकते हैं ? आसान नहीं है .इसके लिए हमें पूरा तन्त्र खड़ा करना पड़ेगा और इस काम में समाज – छात्रों और शिक्षकों को पूरे मनोयोग से साथ देना पड़ेगा .