रूस से फ़ासले के दूरगामी परिणाम …

 

Moscow: Prime Minister Narendra Modi with President of the Russian Federation Vladimir Putin arrives for a Meeting with Russian and Indian CEOs in Kremlin Moscow on Thursday, December 24, 2015. Photo - PTI

Moscow: Prime Minister Narendra Modi with President of the Russian Federation Vladimir Putin arrives for a Meeting with Russian and Indian CEOs in Kremlin Moscow on Thursday, December 24, 2015.
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तुम्हें गैरों से कब फुर्सत और हम गम से हैं कब खाली, चलो बस हो गया मिलना, न तुम खाली, न हम खाली…’, एक रूसी पत्रकार ने डॉक्टर मनमोहन सिंह के मॉस्को दौरे के वक्त कुछ इस अंदाज़ में अपनी पीड़ा बयां की थी. मनमोहन सिंह देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिनका मॉस्को दौरा महज 28 घंटे में समाप्त हो गया. तब से अब तक भारत की विदेश नीति में कई बदलाव आए, लेकिन रूस से रिश्तों की गाड़ी पटरी पर नहीं आ सकी. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाशक्तियों से भारत के संबंध मजबूत बनाने की कोशिशों में लगे हैं. मगर रूस के मामले में कोशिशें परवान चढ़ती नजर नहीं आ रहीं. इसका मुजायरा ब्रिक्स सम्मेलन में देख चुके हैं. उरी हमले के बाद से पाकिस्तान को घेरने की जद्दोजहद के बीच भारत को उम्मीद थी कि रूस और चीन उसके पक्ष का खुलकर समर्थन करेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं. चीन से तो अपेक्षा ही नहीं थी , लेकिन पुराना साझीदार होने के नाते माना जा रहा था कि रूस भारत का साथ देगा. अगर हम मुड़कर देखें तो अतीत में ऐसे कई मौकों पर मास्को न केवल भारत के साथ खड़ा दिखाई दिया, बल्कि उसने नई दिल्ली की आवाज भी बुलंद की. इसलिए ब्रिक्स से रूसी राष्ट्रपति पुतिन का यूं खामोशी से रुखसत हो जाना, दोनों देशों के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

बात केवल ब्रिक्स की ही नहीं है . जिस तरह से रूस ने भारतीय चिंताओं को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास को परवान चढ़ाया, उससे भी यही संकेत मिलते हैं कि गले मिलने वाली दोस्ती अब महज हाथ मिलाने की औपचारिकता तक सिमट गई है. ख़ास बात यह है कि 24 सितंबर से 10 अक्टूबर तक पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के चेरात इलाके में चले इस युद्दाभ्यास को ‘आतंकवाद विरोधी अभ्यास’ घोषित किया गया. यानी रूस कहीं न कहीं यह मानने लगा है कि पाकिस्तान आतंकवाद विरोधी है. रूस सोवियत संघ काल में पाकिस्तानी आतंकियों से मिले उस दर्द को भी भूल गया है, जिसमें हजारों रूसी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. मतलब साफ है कि रूस पाकिस्तान के साथ संबंधों को मधुर करना चाहता है. यह जानते हुए भी कि इससे भारत के साथ रिश्ते प्रभावित होंगे. 2010 में पुतिन ने एक बार कहा था कि उनका देश पाकिस्तान के साथ कोई सैन्य समझौता इसलिए नहीं करता, क्योंकि उसे अपने भारतीय साथियों की चिंताओं का ख्याल है. 2014 तक पुतिन अपनी इस बात पर कायम भी रहे, लेकिन अब रूस खुलकर पाक के साथ रक्षा समझौते कर रहा है. वो पाक को ‘सुखोई 35 एस’ जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान देने जा रहा है. इसके अलावा दोनों मुल्कों के बीच ‘एमआई35’ तकनीक के युद्धक हेलीकॉप्टर और आधुनिक टैंक के करार पर भी बातचीत चल रही है. वैसे, भारत हर संभव प्रयास कर रहा है कि रूस इस दिशा में कदम आगे न बढ़ाए. क्योंकि अगर पाकिस्तान को ‘सुखोई 35 एस’ विमान मिलता है, तो भारत की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाएंगी. यह दुनिया का एकमात्र ऐसा सुपरसॉनिक विमान है, जो बिना गति कम किए पूरे 360 अंश का घुमाव ले सकता है. इस तकनीक का लड़ाकू विमान अमेरिका में भी नहीं है. हालांकि जिस तरह से रूस अपने पुराने मित्र के आग्रह और चिंताओं को दरकिनार करता आ रहा है, उससे इस बात की संभावना बेहद कम है कि वो पाकिस्तान को सुखोई 35 एस देने से इंकार कर दे.

MOSCOW: Russia President Vladimir Putin observes a minute of silence with senior officials of security and intelligence agencies before a meeting on Russian plane crash in Egypt, at Kremlin in Moscow, Russia, early Tuesday, Nov. 17, 2015. The Russian intelligence agency has now claimed the crash of the passenger plane in Egypt was the result of a 'terrorist' act.  Photo - PTI

FILE: MOSCOW: File photo of Russia President Vladimir Putin with senior officials of security and intelligence agencies at Kremlin in Moscow, Russia, early Tuesday, Nov. 17, 2015. Photo – PTI

इस दशकों पुरानी दोस्ती के दरकने की शुरुआत अचानक नहीं हुई. जैसे-जैसे भारत अपनी रक्षा जरूरतों की पूर्ति और चीन को साधने के लिए अमेरिका पर निर्भर होता गया, वैसे-वैसे रूस और उसके बीच का फासला बढ़ता गया. इस बात में कोई दोराय नहीं कि वक्त के साथ-साथ रिश्तों में भी बदलाव आता है. विदेश नीति नफे-नुकसान और भविष्य की संभावनाओं के आकलन पर निर्धारित होती है. आज का रूस सोवियत काल जितना सशक्त नहीं है. जो तकनीक और वैश्विक समर्थन हमें अमेरिका के साथ से मिल सकता है, वह रूस से नहीं. लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि नए दोस्त बनाने की जद्दोजहद में पुराने दोस्तों को नजरअंदाज कर दिया जाए. रूसी विश्लेषक मानते हैं कि भारत-पाक के संदर्भ में जितनी संवेदनशीलता मास्को ने दिखाई, उतना रूस-अमेरिका के सन्दर्भ में नई दिल्ली नहीं दिखा पाई.

इस बात को समझते हुए भी कि अमेरिका रूस को अलग-थलग करना चाहता है, भारत ने उससे रिश्तों को तरजीह दी. ऐसे में रूस का पाकिस्तान के करीब जाना स्वभाविक है. दरअसल, अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभुत्व को नियंत्रित करना चाहता है, और ऐसा केवल तभी मुमकिन है जब भारत उसका साथ दे. वहीं, भारत को भी चीन से मुकाबले के लिए एक मजबूत हाथ की दरकार है. इसलिए दोनों देशों के रिश्ते हर दिन नई ऊंचाईयां छू रहे हैं. जितनी तवज्जो भारत को अमेरिका में मिल रही है, उतनी पहले कभी नहीं मिली. इसकी वजह चीन और भारत में व्यापार की असीम संभावनाओं के अलावा कुछ नहीं. रूस भारत का सबसे पुराना और विश्वसनीय सहयोगी रहा है, इसके बावजूद कुछ वर्षों में उसका भारत के साथ व्यापार बढ़ने के बजाए घटा है. 2009-10 में इसमें तकरीबन 16 फीसदी की कमी दर्ज की गई थी और 2015 में ये 7.8 प्रतिशत रही. जबकि इस दौरान चीन और अमेरिका के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार में तेजी आई.

रूस के रणनीतिकार समझते हैं कि भारत की अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए उन्हें पाकिस्तान और चीन को अपने करीब लाना होगा. भारतीय होने के नाते हमें भले ही यह बात अटपटी लग रही हो, मगर रूस के नजरिए से देखें तो इसमें कुछ गलत नहीं. यदि भारत अपने हितों की खातिर दोस्त बदल सकता है, तो यह अधिकार रूस को भी है. भारत के लिए मुश्किल यह है कि अगर रूस पाकिस्तान और चीन से रिश्ते ज्यादा मजबूत कर लेता है, तो उसके लिए संतुलन बना पाना कठिन हो जाएगा. रूस इस वक्त सहयोगियों की तलाश में है और पाकिस्तान में उसे वो संभावना नजर आ रही है. क्योंकि पाक और अमेरिका में दूरियां अब बढ़ने लगी हैं.

रूस का हमारे साथ रहना केवल रणनीतिक लिहाज से ही फायदेमंद नहीं है. एक दोस्त की हैसियत से भी उसका दर्जा हमारे लिए खास होना चाहिए. रूस और भारत की दोस्ती महज मुनाफा कमाने तक ही सीमित नहीं रही. सोवियत संघ के विघटन से पूर्व से दोनों देश एक दूसरे का सुख-दुख बांटते रहे हैं. हालांकि असल मायनों में दोस्ती का सूत्रपात 1954 में स्टालिन की मौत के बाद हुआ. रूस ने कदम कदम पर भारत का साथ दिया. चाहे वह चीन के साथ युद्ध हो, कश्मीर का मुद्दा या संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता की मांग. अंतरिक्ष विज्ञान में हमारी छलांग के पीछे भी मास्को का बहुत बड़ा हाथ रहा है. लेकिन इन सबके बावजूद भारत की तरफ से उसे कई मौकों पर आपेक्षित सहयोग नहीं मिला. यूक्रेन के ताजा मामले को छोड़ दें तो ईरान के मसले पर भारत ने रूस के पक्ष का समर्थन नहीं किया. उसने न केवल ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों का परोक्ष समर्थन किया, बल्कि वियाना परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ वोट भी दिया. रूस भारत, चीन और ब्राजील के बीच संबंधों में घनिष्टता का पक्षधर है, जबकि भारत का झुकाव अमेरिका के नजदीकी देशों की तरफ ज्यादा है. यह बात भी मॉस्को के रुख में बदलाव का मुख्य कारण है.

भारत में अमेरिका के राजदूत रहे अलेक्जेंडर कदाकिन ने कुछ साल पहले कहा था, ‘भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है, जिसके कई दीवाने हैं, रूस भारत की बहन है और वह चाहता है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले’. नरेंद्र मोदी सरकार को रूस में इसी विश्वास को बहाल करने का प्रयास करना चाहिए. क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले वक्त में एशिया में नया समीकरण पैदा होगा, जिसका खामियाजा भारत को उठाना होगा.