पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर

Rajesh Badal

भारतीय हिंदी पत्रकारिता इन दिनों संक्रमण काल का सामना कर रही है . अनेक विधाएँ धीरे धीरे दम तोड़ती नज़र आ रही हैं .सामाजिक नज़रिए से उनकी आवश्यकता है

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उलट कर मार करने वाला तीर

Rajesh Badal

मीडिया के संक्रमण काल का एक अजीब सा दौर है. न निगलते बनता है न उगलते. छोड़ते हैं तो ज़िन्दगी की रेस में पिछड़ने का ख़तरा और अंगीकार करो तो दिल, दिमाग

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कितने लोग इस भगत सिंह को जानते हैं

Rajesh Badal

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की भाषा पर आप क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने बानवे-तिरानवे साल पहले लिखी थी.

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