नदी कथाः अंधी संभावनाओं का दलदल

Abhay Mishra

(भारत की नदियों और उनके इर्द-गिर्द बनते-बिगड़ते संसार पर एक विशेष श्रंखला के तहत इसबार बात नर्मदा नदी के कुछ हिस्सों की जहाँ जन-गण-मन का सच लहरों की तरह कलरव नहीं करता, कीचड़-सा रुका हुआ दिखता है.)

narmada_valleyकाई की वजह से पहाड़ी पूरी तरह फिसलन भरी हो चुकी थी ऐसे में उस पर चढ़ पाना मुश्किल लग रहा था लेकिन उन भिलाला आदिवासियों के लिए ये जनम-मरण का मामला था. चारों आदिवासियों को अपने साथी की जान की चिंता सता रही थी. उन्होंने उसे एक खाट में लिटाया और अपने कंधों पर टिकाकर वो सरपट पहाड़ी की चिकनाई पर अपने पैर साध रहे थे. साथ में कुछ और लोग भी हैं. उन्हें पहाड़ी के ऊपर बने झोपड़ीनुमा स्वास्थ्य केन्द्र में जल्दी पहुंचना है. उनके साथी लूका को करैत सांप ने डस लिया है. ऊपर बने स्वास्थ्य केंद्र में दो स्वास्थ्य साथी उनका इंतजार कर रहे है जिनकी उम्र 20 साल के आसपास होगी.

लूका को सांप ने तीन घंटे पहले काटा था उसका ज़हर लगातार फैल रहा है. जांच के बाद तय किया गया कि तुरंत ही वैक्सीन देनी होगी. इसके बाद एक स्वास्थ्य साथी सरपट नर्मदा की दिशा में पहाड़ी से नीचे उतरने लगता है. करीब दस मिनट बाद नदी किनारे पहुंच कर वह एक पेड़ से बंधी रस्सी को धीरे–धीरे बाहर खींचता है और रस्सी से बंधी एक पोलीथिननुमा चीज बाहर निकल आती है. स्वास्थ्य सेवक उस पैकेट को खोलकर उसमें से एक वैक्सीन बाहर निकालता है और फिर सलीके से पैकेट को दोबारा बांधकर नर्मदा को सौंप देता है. नर्मदा इस पैकेट में मौजूद वैक्सीन का तापमान बनाए रखेगी. जहां यह वैक्सीन का पैकेट डाला गया है उसके चारों ओर मछली पकड़ने के जाल से सुरक्षा घेरा भी बनाया गया है ताकि बहुतायत पाए जाने वाले मगरमच्छ और बड़ी मछलियां वैक्सीन को नुकसान ना पहुंचा सकें.

लूका को वैक्सीन दे दिया गया. उसे तहसील अस्पताल ले जाने की तैयारी हो रही है. सभी को भरोसा है कि अब लूका की जान बच जाएगी…. भीताड़ा गांव में आपका स्वागत है. गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर विंध्याचल की पहाड़ियों में बसा यह गांव सदियों से नर्मदा को ही जीता, गुनता और बुनता रहा है. यहां के रहवासियों के सुख दुख की साथी और जिम्मेदार नरमदा मईया ही हैं. सिंधु घाटी से भी बहुत पहले मानव के प्रथम आगमन का दावा करने वाली यह धरती अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.

मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले की साण्डवा तहसील का विताड़ा गांव दुनिया के उन चंद समाजों में शामिल है जो बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और फोन नेटवर्क जैसी मूलभूत सुविधाओं का अंशमात्र लिए बिना ही विकास के शिकार हैं. थोड़ा विस्तार में जाते हैं- बिजली यहां पहुंच नही सकती क्योंकि मात्र सौ-पचास घरों में बिजली पहुंचाने के लिए अरबों खर्च करना संभव नहीं है. सड़कों के नाम पर पगडंडियां हैं जो लोगों के पैरों के लगातार पड़ते दबाव के चलते बन गई हैं और जिनमें पहाड़ों से परिचित पांव ही आगे बढ़ सकते हैं. शिवराज सिंह चौहान के कागज़ ये दावा करते हैं कि भिताड़ा में एक स्कूल है.

सच्चाई यह है कि जिस स्वास्थ्य केंद्र का ऊपर जिक्र किया गया है उसका शासन से कोई ताल्लुक नहीं है. गांव के दो युवक जिन्होंने साण्डवा तहसील में रिश्तेदार के यहां रहकर आठवीं तक पढ़ाई की है उन्हें छत्तीसगढ़ की एक संस्था ने एक माह की ट्रेनिंग देकर सांप काटने का इलाज, सुई लगाना, बुखार और उल्टी दस्त की दवाई पहचानना सिखाया है लेकिन नवजात की नाल आज भी तीर से ही काटी जाती है. यहां रहने वाले आदिवासी इन्हें स्वास्थ्य सेवक बुलाते हैं क्योंकि डॉक्टर से उन्हें डर लगता है और इससे युवकों में भी भ्रम पैदा होने का खतरा है.

नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा संचालित एक जीवनशाला भी यहां है जहां एक झोपड़ी में पचास बच्चे पांचवीं तक पढ़ाई करेंगे जिसमें पर्यावरण की किताब मुख्य है. ककहरा सीखने की उम्र में इन बच्चों ने एक वाक्य सीखा है- जीवनशाला की क्या है बात, लड़ाई, पढ़ाई साथ-साथ.

भिलाला आदिवासियों ने सभ्यता से कभी कुछ मांगा भी नहीं. उन्हें कभी ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई होगी. बस उनके पास नर्मदा का बहता पानी था वो ही काफी था लेकिन विकास के बहाव ने इनकी नर्मदा में ठहराव ला दिया है. बहती नदी अब सरदार सरोवर का जलाशय कहलाती है. पानी ने बहना क्या बंद किया मानो जिंदगी ही थम गई. आदिवासियों ने आवाज तो उठाई लेकिन उन कानों पर हल्का सा कंपन भी नहीं उठा, उन आंखों में हल्का सा पानी भी नहीं उतरा जो आंखें इसी थमे पानी से चौंधियाती हैं. और रही बात नर्मदा से प्यास बुझाने की तो ऐसा भी हो सकता है इस बारे में पर तो कभी कोई विचार ही नहीं हुआ.

बीते दिनों तहसील अस्पताल में पेट के मरीजों की संख्या में कई गुना वृद्दि हुई है. दूसरी तरफ जलाशय में पानी बढ़ने से नदी किनारे मौजूद सैकड़ों छोटी छोटी जोतें डूब गई. आदिवासियों के ये खेत सरकारी पहाड़ पर थे. कोई पट्टा नहीं इसलिए कोई मुआवजा भी नही.

कुछ साल पहले तक इस क्षेत्र में मौतों का एक मात्र बड़ा कारण मलेरिया था लेकिन अब हैजा, टाइफाइड, डायरिया और पीलिया जैसी बिमारियों ने तेजी से अपनी जगह बनाई है. एक समय था जब पेट के असाध्य रोगों के ईलाज के लिए नर्मदा तीरे कुछ समय बिताने की सलाह दी जाती थी. आज वही जीवनदायिनी बांधों की वजह से अपने बहाव में आए ठहराव के कारण मोक्षदायिनी की भूमिका निभा रही है. सरदार सरोवर का जलाशय खत्म होता है तो महेश्वर का शुरु हो जाता है और महेश्वर बांध का जलाशय खत्म होते ही ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर का जलाशय प्रारंभ हो जाता है. यही स्थिति जबलपुर के बरगी डैम तक चलती रहती है. इस तरह नदी के पनढाल (जलागम) क्षेत्र में पचास हजार हेक्टेयर जंगल डूब चुका है. कई छोटे मोटे पनढाल अब बांध की गाद अपने में समाने का काम कर रहे है. नर्मदा पर बने बांधों ने 1312 किमी लंबी इस नदी के 446 किमी के हिस्से को ठहरे हुए पानी में बदल दिया है. जिसके चलते पश्चिमी मध्यप्रदेश का यह क्षेत्र जल्दी ही एक दलदली भूमि के रूप में जाना जाएगा.

अथाह पानी के किनारे पानी के लिए हाहाकार यह बात अहमदाबाद, भोपाल से लेकर दिल्ली तक किसी को समझ नहीं आ रही. दिल्ली को तो यह भी आज तक समझ नहीं आया कि भारत के सबसे बड़े डैम के किनारे बसे टिहरी में पीने का पानी टैंकरों से क्यों आता है? शायद सहज उपलब्धता ‘अपने को क्या करना है’, की नीति को मजबूती प्रदान करती है.

सरदार सरोवर डैम से चार राज्य गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान लाभांवित होते है. इन राज्यों ने दुनिया की सबसे पुरानी नदी घाटी को बहुत ही रोचक तरीके से आपस में बांटा है. भिताड़ा के आसपास मछली पकड़ने का अधिकार महाराष्ट्र का है लेकिन पानी पर उसका कोई अधिकार नहीं है. यानी जल बिन मछली पर महाराष्ट्र का हक है. यह भूमि भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश के पास है लेकिन पानी पर पूरा हक गुजरात का है. यानी प्रदेश सरकार अपने भिताड़ा गांव तक पानी लिफ्ट नहीं करवा सकती है क्योंकि पानी उसका नियंत्रण नहीं और गुजरात सरकार करवाना नहीं चाहती क्योंकि आदिवासी उसके नहीं. बहरहाल इन सभी राज्यों ने अदालत को लिखकर दिया है कि हमारे यहां विस्थापितों और प्रभावितों की संख्या जीरो है.

सतपुड़ा और विंध्याचल के बीच बहती नर्मदा से निकलते हुए पहाड़ों पर सरकारी लूट का एक और उदाहरण देखने को मिलता है. महाराष्ट्र की सीमा वाले सतपुड़ा में कुछ हद तक जंगल दिखाई देते है लेकिन मध्यप्रदेश की सीमा वाले विंध्याचल में हरे भरे पेड़ नदारद है. ठेकेदार अंधाधुध पेड़ों को काटते है जिनका कोई हिसाब नहीं रखा जाता. गाड़ी वहां तक जा नहीं पाती इसलिए पेड़ो को काटकर नर्मदा के रास्ते शहरों तक लाया जाता है. हालात यह है कि मध्यप्रदेश के इस क्षेत्र में पहाड़ बिल्कुल नंगे हो गए है. माई कब मालगाड़ी बन गई पता ही नहीं चला.

भिताड़ा सहित आसपास के कई गांवों में डायरिया के मरीज 15 -15 घंटे पैदल चलकर साण्डवा के अस्पताल पहुंचते हैं तो अस्पताल में ही प्राइवेट प्रेक्टिस करते डाक्टर चार पांच सौ रूपए मांगते है. यह रकम आदिवासियों की पूरे महीने की कमाई से भी ज्यादा है. मुर्गा, मछली और अऩाज देने से भी जब यह रकम पूरी नहीं पड़ती तो अपनी गाय तक देनी पड़ जाती है.

बारिश का मौसम तो यहां और विषम परिस्थितियां पैदा कर देता है. ग़ालिब के शेर -मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी की आंसा हो गई- को यहां के आदिवासियों ने सुना नहीं है लेकिन अनुभव ज़रूर किया है. वे दूर पहाड़ी पर आ रही बारिश से उनके घर कितनी देर में भीगेंगे इस बात का अंदाज़ा लगा लेते हैं. फिर दिन हो तो बात कर और रात हो तो जाग कर ये लोग अपना वक्त काट लेते हैं.

सुबह के वक्त जीवनशाला के बच्चे प्लास्टिक के पानी भरे लोटे और साथ ही एक छोटी सी लोहे की खुरपी लिए पहाड़ में इधर उधर जगह तलाशते नज़र आ जाते हैं. जीवनशाला के बच्चों को सिखाया जाता है कि खुरपी से एक गड्डा बनाए और फारिग होने के बाद उसे मिट्टी से ढंक दे ताकि मख्खियां ना हों और बिमारियों से बचा जा सके. नर्मदा को बांधने का दर्द बच्चों की बातचीत में झलकता है. वे भी जानते है कि नर्मदा का पानी पीने से हम बीमार पड़ सकते है.

ककराना में नर्मदा और हथनी का संगम है. भिताड़ा से ककराना होते हुए वापस जाने के लिए मान्या भिलाला अपनी नाव में हमारा इंतजार कर रहे है. सतपुड़ा और विंन्ध्याचल पर्वतों के बीच बहती नर्मदा में वोट का रास्ता किसी भी सैलानी का मन मोह लेता है. शायद कभी भवानी प्रसाद मिश्र ने इन्ही लहरों पर सवार होकर अपनी अमर कविता सतपुड़ा के घने जंगल ऊंघते हुए से अनमन जंगल की रचना की होगी. अब तो सरकारें भी यही चाहती है कि यहां सैलानियों के अलावा कोई ना आए. यहां आने वाले सैलानियों को तो शायद इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं होगा की जिस नाव में बैठ कर वो प्रकृति की छटा को निहार रहे हैं वो नाव जिस दरिया में हिलोरे मार रही है वहां कभी किसी मुन्नी ने अपने गुड्डे का ब्याह रचाया था.

नाव चलाते-चलाते अचानक स्थानीय साथी मान्या बोलते है इस समय हम लोग मेरे खेत के ऊपर से गुजर रहे है. फिर धीरे से मुस्कराते है उनकी मुस्कराहट पूरी तरह निर्दोष है जो मेरे गाल पर ज़ोर से महसूस होती है. ना चाहते हुए भी मैं वहां सभ्य समाज का प्रतिनिधि हूं.