अग्निपथ

Sandeep Yash
File photo: Migrants during Coronavirus outbreak

File photo: Migrants during Coronavirus outbreak

हम अब लाक्डॉन 4 में हैं। आज बहस जीवन बनाम आजीविका की है।  पर हम सब की साँसे आजीविका की गलियों से होकर ही गुज़रती हैं। जान लीजिए कि 3  मई तक देश को 18 हज़ार करोड़ रुपये तक का नुक्सान हो चुका था। अंतराष्ट्रीय कंसल्टेंसी फर्म गोल्डमैन साक के मुताबिक़ चालू वित्तीय वर्ष में भारत के GDP की विकास दर 1.6% के आस पास रह सकती है। निचोड़ ये कि महामारी का सबसे बुरा असर छोटे उद्योग, उड्डयन, निर्माण , पर्यटन और ऑटोमोबाइल सेक्टर्स पर पड़ा है जहाँ बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजित होते हैं। तो इस सूरतेहाल में कारवां और नहीं रोका जा सकता। डॉ हरिवंश राय बच्चन की माने तो आज अग्निपथ ही एक मात्र सत्य है। और मन बना चुकी केंद्र सरकार ने ज़ोन्स -लाल हों, ऑरेंज हों या हरे हों -इसका फैसला राज्यों पर छोड़ दिया है। राज्यों ने ये दायित्व जिलों को दे दिया है। यानी निकट भविष्य में देश के आर्थिक उत्थान और सेहत की रूपरेखा यहां तैयार होगी। और विशेषज्ञ कहते हैं कि शुरुआत हमें देश के शीर्ष आर्थिक केंद्रों से करनी होगी।  मसलन
1 . मुंबई
2 . दिल्ली एनसीआर
3 . जयपुर
4 . बैंगलोर
5 . हैदराबाद
6. अहमदाबाद
7 .चेन्नई
8 . कोलकत्ता
9 . सूरत
10 . पुणे
11. औरंगाबाद
12 . नासिक
13 . होस्पेट
14 . श्रीपेरम्बदूर
15 . तिरुपुर

इन केंद्रों में भूमि और सस्ता श्रम उपलब्ध है, स्वस्थ और स्थायी औद्योगिक वातावरण है, सड़कें, हवाई अड्डे मौजूद हैं, बाजार भी आस पास हैं। पर मुश्किल ये है कि इनमे से कई आर्थिक केंद्र फिलहाल रेड जोन में है। फिर भी यहाँ काम शुरू कराना सरकारों के लिए आज प्राथमिकता और चुनौती क्यों बन चुकी है।

क्रिसिल  की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ इन केंद्रों से
–  देश की 60 % GDP तय होती है
– 58 % प्रवासी श्रमिक वर्ग यहीं खपता है
–  66 % विनिर्माण (manufacturing ) यहीं होता है
–  60 % निर्माण (construction output) यहीं होता है
–  53 % सेवा क्षेत्र (services sector) यहीं पर हैं

आपकी जानकारी के लिए, यहां पर कार्यरत 58 % श्रमिक वर्ग में 24 % वेतनभोगी हैं, 26 % कैसुअल लेबर हैं और करीब 50 % स्वरोजगार श्रेणी में आते हैं। तो फिर चाबी कैसे घुमाई जाए, कैसे इंजन चालु किया जाए  – प्राण और देश दोनों को बचाना है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं कि ” हमें यह देखने की जरूरत है कि क्या दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के एक वर्ग के लिए रोजगार सुनिश्चित करने के लिए काम शुरू करने का कोई तरीका है। यदि व्यवसायी और ठेकेदार श्रमिकों को सैनिटाइज़र और मास्क प्रदान कर सकते हैं, सोशल डिस्टन्सिंग सुनिश्चित कर सकते हैं, तो कम से कम कुछ गतिविधि शुरू की जा सकती हैं”। वहीँ विशेषज्ञ कहते हैं कि व्यावसायिक गतिविधियां पटरी पर लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को तीन बुनियादी पहले करनी होंगी

पहली – महामारी और फजीहत से डरे प्रवासी श्रमिकों का विश्वास जीत उन्हें जल्द वापस लाना होगा। इसके तहत

–  श्रमिकों के गृह राज्यों को उनकी ऑनलाइन रजिस्ट्री बनानी होगी जिसमें उनके हुनर सहित सारा विवरण होगा
– किसी भी आपदा में, इन आर्थिक केंद्रों में काम कर रहे श्रमिक की रोटी, कपडा, मकान और चिकित्सा सहायता- कानूनन सुनिश्चित करना         होगी
– ज़्यादातर श्रमिक ठेकेदारों द्वारा लाये जाते हैं, इस प्रथा को ख़त्म कर सरल एवं परस्पर कॉन्ट्रैक्ट्स लाने होंगे
– गंतव्य राज्यों को आने वाले श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन सरल बनाना होगा
– काम का स्वच्छ और सुरक्षित माहौल देना होगा

फिलहाल, ये तो रही प्रवासी श्रमिकों की बात जिसका इन आर्थिक केंद्रों के कुशल संचालन के साथ सीधा रिश्ता है।

दूसरी पहल – Inter-state Migrant Workmen Act, 1979 Act जैसे श्रम कल्याण कानूनों में बदलाव /  नए कानून की दरकार – ISMW Act,  The Orissa Dadan Labour Act, 1975 को ख़त्म कर लाया गया था। 40 बरस से ज़्यादा पुराने इस कानून को नयी ज़मीनी सच्चाइयों के हिसाब से बदलने की ज़रुरत है।  मसलन, तमाम श्रमिक किसी लाइसेंसशुदा ठेकेदार द्वारा नहीं लाये जाते हैं पर इस एक छोटी सी खामी के चलते ये तबका अक्सर कानूनी मदद से महरूम हो जाता है। ये कानून उन सस्थानो पर लागू भी नहीं होता जहाँ 5 से कम श्रमिक काम करते हैं।  इसी तरह The Unorganised Workers’ Social Security (UWSS) Act, 2008 है। इस कानून का लक्ष्य असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याण है। ये अधिनियम, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को गृह -आधारित श्रमिक, स्वरोजगार करता व्यक्ति या दिहाड़ी मजदूर के रूप में परिभाषित करता है।  इस अधिनियम की दो ख़ास बातें हैं – 1.असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का पंजीकरण  2. एक श्रमिक की पहचान संख्या के साथ पोर्टेबल स्मार्ट आई-कार्ड। पर इन उपयोगी प्रावधानों और योजनाओं का कवरेज अभी भी काफी बढ़ाया जाना है।

तीसरी पहल – नए ज़िलों में आर्थिक केंद्र बनाने होंगे। और प्रत्येक जिले का स्थानीय वार्षिक GDP 3 -4 % बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।  मिसाल के तौर पर गुजरात का आनंद ज़िले ने देश के डेयरी सेक्टर को अंतराष्ट्रीय पहचान दिलाई है या फिर उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जिला जो अपने शानदार टुलिप फूलों के बागों को लेकर खबरों में है। इसी तरह अमरावती अपने कपास के लिए, काडपा अपने पत्थर के लिए, जबलपुर अपनी खदानों के लिए, मुरादाबाद अपने पीतल के बर्तन के लिए और सांगली अपने हल्दी उत्पादकों के लिए मशहूर है।  देश भर में फैले ये जिले अपनी विशिष्टता के चलते देश का विकास इंजन बन सकते हैं। ये न सिर्फ सुरक्षित हैं बल्कि विशाल आर्थिक क्षमता भी रखते हैं।  साथ ही ज़िले लम्बे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय आर्थिक एवं औद्योगिक असंतुलन की समस्या का निवारण भी कर सकते हैं।

तो जाते जाते – सरकार संजीदा है। इसी अप्रैल में लाखों प्रवासी श्रमिकों का डाटा इकट्ठा करने का काम शुरू किया है। इसमें राज्यों से भी डाटा मंगवाया गया है। ये जानकारी- राहत शिविरों, श्रम कार्यस्थलों और प्रवासी श्रमिक बस्तियों से जुटाई गयी है। इसका मक़सद करोड़ों प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों को विपदा के इस दौर में तुरंत राहत देना है। इसी तरह जनवरी में लांच हुई One nation -One ration card योजना है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत अब कोई भी प्रवासी श्रमिक देश के किसी भी जिले की में 5 किलो सस्ता राशन ले सकेगा। ये योजना इसी जून तक सारे देश में लागू हो जाएगी। आपकी जानकारी के लिए इसी सरकार के कार्यकाल के दौरान असंगठित तबके के लिए तमाम सामाजिक सुरक्षा योजनाएं भी लांच हुई हैं – मसलन प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, JAM और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना। आज विपदा के इस दौर में ऐसी योजनाए असंगठित क्षेत्र तक राहत पहुंचने में कारगर साबित हो रही हैं। तो हम विश्वास के साथ कह सकते हैं की ऐसे पुष्ट कदम आज जिलों और श्रमिकों के विकास के साथ साथ नव भारत के निर्माण और समृद्धि के लिए संजीवनी साबित होंगे।