आलेख: अन्नदाता और अन्नपूर्णा की सुनवाई को तैयार रहे राजस्थान

vasundhara_rajeदेश के पश्चिम में बसे राजस्थान में सामन्ती राज रहा और लोकतंत्र आने के बाद यहां के राजाओं, सामन्तों, ठिकानेदारों ने रियासती मानसिकता से उबर कर चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लिया। यानी एक मायने में फिर सत्ता की चाबी अपने हाथ करने की तैयारी कर ली। अपनी अपनी रियासतों में राजाओं के दमन के खिलाफ खडे ज़्यादातर जन नेताओं ने आज़ादी के बाद सक्रिय राजनीति की राह थामी तो राजाओं – सामन्तों ने अपना वजूद कायम ही नहीं रखा बल्कि चुनाव दर चुनाव खुद को मजबूत ही किया। यही वजह थी कि पहले चुनावों में 160 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में भी कब्ज़ा इन्हीं का रहा। उस वक्त जन नेताओं को जनता को वोट के लिए लुभाना भी नहीं आता था और मतदान करवाने वाली मशीनरी भी अभी नई-नई ही थी। इसलिए प्रदेश के पहले चुनाव में 20 दिन लगे। लेकिन आज राजस्थान में कई हफ्तों या दो – तीन चरणों में नहीं एक ही दिन में चुनाव होने जा रहे हैं। सरहदी इलाकों वाले इस प्रदेश में कई मुद्दे हैं जो मत देते वक्त हर मतदाता के मन में आस पैदा करते हैं और अपने पिछले फैसलों पर फिर से सोचने का मौका भी देते हैं।

राजस्थान में इस बार 15वें विधानसभा चुनाव 200 में से 199 सीट के लिए हो रहे हैं। अलवर की रामगढ़ सीट के एक प्रत्याशी की मौत होने से इस एक सीट पर चुनाव नहीं हैं। राजस्थान के हर इलाके के मुद्दे जुदा-जुदा हैं मगर चुनावी प्रचार और सरगर्मियों के बीच असल विकास से जुड़े गिने चुने मसले ही साफ तौर पर सामने आ पाते हैं। प्रदेश को जब 2003 में पहली बार महिला मुख्यमंत्री का नेतृत्व हासिल हुआ तो बदलाव पर सबकी कड़ी निगाह थी। ये नेत्री केन्द्र की राजनीति से प्रदेश की राजनीति की कमान संभालने उतरी थीं। मध्यप्रदेश के सिंधिया परिवार से ताल्लुक रखने वाली वसुंधरा राजे राजस्थान के धौलपुर से सुसराल के नाते से जुड़ी हैं। पहली बार 1985 में छठी विधानसभा के लिए धौलपुर से ही चुनाव जीतकर वसुंधरा राजे ने राजस्थान की राजनीति में मजबूती से अपने कदम रखे थे और फिर झालरापाटन से लोकसभा चुनाव जीतकर 1989 में पहली बार संसद पहुंचीं। इसके बाद लगातार संसद में जीत दर्ज करवाने के बाद केन्द्र में मंत्री भी रही। इन तमाम अनुभवों के साथ जब उन्होंने 2002 में प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा संभाला तो बुजुर्ग नेताओं का विरोध सहते हुए और कांग्रेस सरकार को चुनौती देते हुए पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब रहीं और 2003 के चुनाव में पहली बार 120 सीटों के बहुमत से भाजपा को जिताया। दूसरी बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में बने माहौल ने 2013 में उन्हें प्रचण्ड बहुमत यानी 163 सीटें दीं। इसी वजह से प्रदेश की जनता की आस भी उनसे ज़्यदा रहीं। केवल 21 सीटों के साथ विपक्ष कमजोर रहा मगर जनता खुद ही अपने मुद्दे अपने अपने तरीके से सरकार के सामने रखती रही। इन चुनावों में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने कड़ी टक्कर देने के लिए कवायद पूरी की है। दोनों की पाटियों ने घोषणा पत्र भी जारी किया है, लुभावने वादे और दावे भी हैं। लेकिन जब तक राजनेता अपने कहे को लेकर संजीदा नहीं होंगे, प्रदेश के चार करोड़ मतदाता भी जवाब मांगने का हौसला नहीं करेंगे।

प्रदेश के मारवाड़, हाडौती, मेवाड़, बांगड़, ढूंढाड़, मेवात आदि सभी अंचलों के अपने मसले हैं मगर पानी की किल्लत,किसानों के कर्ज और उपज के सही मूल्य सहित रोजगार के समाधान की सबको तलाश है। जहां सरहदी इलाकों में दूर दूर बसे गांव और ढाणियों में पढ़ना और इलाज पाना आज भी दुष्कर है तो कुटीर और उद्योग धंधों को फिर से आबाद करने की ललक कमोबेश हर इलाके में है। प्रदेश के हर क्षेत्र की कला – संस्कृति की विविधता को स्थानीय बाजार विकसित कर आज तक कोई भी सरकार सही मायने में नहीं भुना पाई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पहले से बेहतर हुए हैं, लेकिन ये काम और बडे पैमाने पर होने की दरकार है। चुनावों में एक नेता का ये कहना कि बाल विवाह में पुलिस की दखल नहीं करने देंगे, इस ओर इशारा है कि जन प्रतिनिधियों को समाज की रीति – नीतियों का देश – प्रदेश के विकास से नाता और उसकी संवेदनशीलता समझाने की ज़रूरत है। इस बार की सरकार ने पिछली सरकार की मुफ्त दवा योजना को जारी रखने के साथ ही भामाशाह स्वास्थ्य योजना के जरिए निजी अस्पतालों में मु्फ्त इलाज की सुविधा देकर राहत पहुंचाने का काम किया है। जहां गर्भ में लिंग जांच पर मौजूदा सरकार के प्रशासनिक अमले ने डिकॉय आपरेशन के जरिए धुंआधार कार्रवाई करते हुए अपराधियों में डर पैदा किया और शिशु लिंगानुपात में अब तक शर्मनाक आंकडों वाला प्रदेश अब पूरे देश में ऐसी मिसाल बना कि इसकी सराहना देश के प्रधानमंत्री ने प्रदेश में आकर की।

बच्चियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने में कुछ योजनाएं मददगार जरूर बनीं लेकिन आधी आबादी की सुनवाई और ज्यादा हो तो नजदीक ही पढाई की अच्छे मौके और शराबबन्दी की मांग पर कोई मुखर होकर बोलता नजर आए। प्रदेश को स्मार्ट सिटी देने, रिंगरोड, द्रव्यवती परियोजना जैसी सौगात देने और पानी के मसले को सुलझाने के लिए नदी और बांध परियोजनाओं की कई पहल भी इस कार्यकाल में हुई लेकिन इन्हें पूरा होने में अभी और वक्त की दरकार है। आज भी प्रदेश के कई इलाकों में रेल नहीं पहुंच पाई है तो आगे बढ़ चुके इलाकों में वक्त से कदमताल करते हुए हवाई अड्डे की मांग है। बिजली की बढ़ती कीमत को काबू में करना आने वाली सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। यमुना नदी और पानी की दूसरी परियोजनाओं पर पड़ोसी राज्यों से झगड़े हैं जिन्हें सुलझाना प्राथमिकता में होना चाहिए। बाड़मेर सहित सरहदी इलाकों में 15 सालों से पानी की कोई भी परियोजना ज़मीन पर नहीं उतर पा रही। जैसलमेर में सैंकड़ों गांव प्यासे हैं। आज भी आर्मी के टैंकर पानी का एक मात्र ज़रिया हैं। नर्मदा का पानी अब भी सब तक नहीं पहुंचा है। पोकरण योजना भी चन्द हिस्से तक ही पहुंच पाई। तेल रिफाइनरी पर हर पार्टी खामोश है। रोजगार के वादे तो हैं लेकिन कोई रोडमैप भी होना ही चाहिए। माही बजाज सागर योजना के सपने भी अभी अधूरे हैं। इसी तरह मेवाड़ बांगड़ इलाके के आदिवासी विकास की राह में तेजी से आगे बढना चाहते हैं, उन्हें पूरे अवसर कैसे मिलें, इसका रास्ता भी राजनीति के गलियारों से ही निकलेगा। शहरों के नियोजित विकास और यातायात को काबू में करना वक्त  की मांग है जिस पर काम तेजी से होना चाहिए। सफाई और शौचालयों के बारे में जागरूकता आदतों में बदलाव का बड़ा संकेत है। अब आगे की बात अधिकारों और ज़िम्मेदारी की है। जाति, गोत्र, मजहब, छींटाकशी चुनाव प्रचार के साथ ही खत्म हो जाए और मतदाता के मन और मर्जी से चुने उम्मीदवार सबकी उम्मीदों को पूरा कर पाएं ये चाहत तो पल रही है लेकिन किसी भी देश की खुशहाली आखिरकार अन्नदाता और अन्नपूर्णा से ही होती है, इस बात का खयाल रखकर ही विकास के पैमानों पर खरा उतर पाएगा राजस्थान।

 – डॉ. क्षिप्रा माथुर