अफ्रीका से रिश्तों का नया सिलसिला

New Delhi: DG of ICCR C Rajasekhar, ICCR president Lokesh Chandra, Former Foreign Secretary, Shashank , Dean of Group of African Heads of Mission, Alem Tsehaye Woldemariam observe silence for Congolese student, Masonda Ketada Olivier who was beaten to death by a group of men in Delhi, during the Africa Day Celebration at ICCR in New Delhi on Thursday, May 26, 2016. Photo: PTI

New Delhi: DG of ICCR C Rajasekhar, ICCR president Lokesh Chandra, Former Foreign Secretary, Shashank , Dean of Group of African Heads of Mission, Alem Tsehaye Woldemariam observe silence for Congolese student, Masonda Ketada Olivier who was beaten to death by a group of men in Delhi, during the Africa Day Celebration at ICCR in New Delhi on Thursday, May 26, 2016.
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मैं अपने साथी भारतीयों से अपील करती हूं कि अगली बार जब आप किसी अफ्रीकी नागरिक से मिलें तो उससे हाथ मिलाएं और कहें कि भारत आपसे प्यार करता है.

दिल्ली में कांगो के नागरिक की हत्या पर अफ्रीकी देशों की चिंता के बाद विदेशमंत्री सुषमा स्वराज का ये बयान बताता है कि भारत सरकार अफ्रीकी देशों से रिश्तों को लेकर कितनी गंभीर है.

भारत और अफ्रीका के बीच संबंध यूं तो चार हजार साल पुराने बताए जाते हैं. लेकिन अगर कुछ सदियों के इतिहास की बात करें तो ये रिश्ते डेढ़ सौ साल पूरे कर चुके हैं. (2010 में ही दक्षिण अफ्रीका में पहले भारतीय नागरिक के आगमन की 150वीं वर्षगांठ मनाई गई थी.) भारत और अफ्रीका में कई समानताएं हैं. भारत की जितनी आबादी है, अफ्रीका के सभी देशों की मिलाकर तकरीबन उतनी ही आबादी है और दोनों मिलकर दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा हैं. भारत और अफ्रीका दोनों ही उपनिवेशवाद के शिकार रहे और दोनों ने इसके खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी. नस्लभेद, रंगभेद, समानता, न्याय और सम्मान के लिए संघर्ष का दोनों का एक जैसा इतिहास रहा है. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दौरान ये रिश्ते और ज्यादा मजबूत हुए.

नेहरू के बाद के दौर में भी भारत का अफ्रीकी देशों पर खासा प्रभाव था. हालांकि शीत युद्ध के दौरान भारत के अफ्रीका से रिश्ते ठंडे पड़ गए. शीत युद्ध के बाद भी भारत ने अफ्रीकी देशों से रिश्तों को लेकर ऐसी तत्परता नहीं दिखाई जैसी उससे अपेक्षा थी. ज्यादातर अफ्रीकी देश खासकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन के चलते भारत को सम्मान की निगाह से देखते थे. अफ्रीका में भारतवंशियों की अच्छी खासी तादाद है लेकिन भारत की विदेश नीति के रणनीतिकारों ने इसे कभी संसाधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया. आज भी अफ्रीका को भारत का बड़ा सामरिक और आर्थिक साझीदार नहीं कहा जा सकता. इसके उलट चीन का यहां अच्छा खासा प्रभाव है और वो महाद्वीप का बड़ा आर्थिक खिलाड़ी है.

भारत-अफ्रीका के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर किस हद तक उदासीन था इसका अंदाज़ा इससे ही लग जाता है कि सदी की शुरूआत में भारत अफ्रीका के बीच व्यापार महज कुछ अरब डॉलर तक सीमित था. दरअसल आजादी के 60 साल बाद ही भारत को अफ्रीका के साथ आर्थिक रिश्तों की अहमियत समझ में आई. मनमोहन सरकार की अगुवाई में 2008 में नई दिल्ली में पहले भारत-अफ्रीका फोरम समिट का आयोजन हुआ. अगर ये कहा जाए कि यहीं से भारत-अफ्रीका संबंधों की नई इबारत लिखी जानी आरंभ हुई तो गलत नहीं होगा. नतीजा ये हुआ कि आज दोनों पक्षों के बीच व्यापार तकरीबन 100 अरब डॉलर हो गया है. 2008 से 2013 के बीच अफ्रीकी देशों से भारत का आयात 80 फीसदी बढ़ा है जबकि निर्यात में 100 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

2014-15 में भारत के कुल 758 अरब डॉलर के व्यापार में अफ्रीका का योगदान 9.4 फीसदी यानी 75.65 अरब डॉलर था. भारत का कुल निर्यात 310.34 अरब डॉलर का रहा जिसमें से 10.6 फीसदी यानी 32.8 अरब डॉलर अफ्रीकी देशों को था. इसी तरह इसी अवधि में भारत के कुल आयात 447.96 अरब डॉलर में से अफ्रीका का हिस्सा 8.7 फीसदी यानी 38.8 डॉलर रहा.

देखने में ये आंकड़े भले ही सुखद लगें लेकिन इनकी जब चीन, अमेरिका या यूरोपीय यूनियन के देशों से तुलना करें तो भारत अब भी इस मामले में कच्चा खिलाड़ी नजर आता है. महत्वपूर्ण ये भी है कि भारत के अफ्रीका से आयात-निर्यात में काफी विसंगतियां हैं. मसलन अफ्रीका से भारत आयात होने वाली चीजों में 84 फीसदी रॉ मटीरियल होता है जैसे कच्चा तेल(भारत अपनी जरूरत का 26 फीसदी अफ्रीका से आयात करता है), सोना, कपास या कीमती पत्थर. यही नहीं निर्यात के मामले में भी ऐसी ही विसंगति है जैसे भारत अफ्रीका को जो निर्यात करता है उनमें 67 फीसदी उपभोक्ता वस्तुएं होती हैं. 17 फीसदी इंटरमीडिएट गुड्स, 14 फीसदी कैपिटल गुड्स और 2 फीसदी रॉ मटीरियल होता है. जाहिर है इस क्षेत्र में अभी बहुत संभावनाएं हैं खासकर चीन को देखते हुए जिसका अफ्रीका के साथ व्यापार 200 अरब डॉलर को पार कर चुका है और उसके सामान से अफ्रीकी देशों के बाजार भरे पड़े हैं. भारत ने अफ्रीकी देशों में 35 अरब डॉलर निवेश किया हुआ है. अफ्रीका से भी हालांकि भारत में निवेश हुआ है लेकिन ये इसका 96 फीसदी अकेले मॉरिशस से हुआ है जिसके बारे में जब तक सवाल उठते रहते हैं.

आज चीन की अर्थव्यवस्था संकट में है. पिछले साल उसकी ग्रोथ 6.9 फीसदी रही जो पिछले 25 सालों में सबसे कम है. इसका असर अफ्रीका से उसके व्यापार पर भी पड़ा है. 2015 में अफ्रीका से होने वाला चीन को आयात पिछले साल के मुकबले 38 फीसदी कम हुआ है जबकि चीन का अफ्रीका में सीधा निवेश 2015 के पहले हिस्से में 40 फीसदी गिरा. दूसरी ओर भारत की ग्रोथ 7.5 फीसदी की रफ्तार से हो रही है और आज हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था हैं. चीन के अफ्रीका में पैर उखड़ने से भारत के लिए पैर जमाने का अनुकूल माहौल तैयार हो रहा है. अफ्रीका के कई देशों में अभी विकास की पटरी पर दौड़ना शुरू ही किया है. ऐसे में वहां आधारभूत ढांचे के विकास के लिए व्यापक पैमाने पर डिमांड पैदा हो रही हैं. जरूरत इस बात की है कि सरकार और भारतीय कंपनियां इस समझें और अवसरों का फायदा उठाएं तथा इस महाद्वीप से हमारे संबंधों को नया आयाम दें.

New Delhi: Folk artists perform at the inaugural session of the India Africa Forum Summit at Indira Gandhi Sports Complex in New Delhi on Thursday, October 29, 2015.  Photo - PTI

FILE | New Delhi: Folk artists perform at the inaugural session of the India Africa Forum Summit at Indira Gandhi Sports Complex in New Delhi on Thursday, October 29, 2015.
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सिर्फ व्यापार नहीं है रिश्तों का आधार

भारत और अफ्रीका के रिश्तों का आधार महज आर्थिक नहीं है. भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भी अफ्रीकी देशों का साथ चाहिए. भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है तो अफ्रीका सबसे अधिक देशों वाला महाद्वीप. अफ्रीकी देशों की कुल जनसंख्या भी भारत के बराबर ही है लेकिन इसके बावजूद न तो भारत को और न ही अफ्रीका महाद्वीप को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिली. भारत और अफ्रीका मिलकर ये लड़ाई लड़ सकते हैं. भारत-अफ्रीका जिस एक साझा खतरे से जूझ रहे हैं वो है आतंकवाद. भारत यहां लश्कर, तालिबान, आईएसआईएस के निशाने पर है तो अफ्रीका के कई देश भी बोको हरम, अलकायदा की गतिविधियों के चलते परेशान हैं. खुफिया सूचनाओं के आदान प्रदान और रणनीतिक सहयोग के जरिए दोनों ही पक्ष एक दूसरे की काफी मददगार साबित हो सकते हैं. खासकर सोमालिया जैसी जगहों के समुद्री लुटेरों से निपटने में तो ये सहयोग काफी अहम साबित हो सकता है.

जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में आज जिस तरह की सक्रियता देखने को मिल रही है और विकसित देश जिस तरह इस मुद्दे पर अपना एजेंडा विकासशील देशों पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें भी भारत और अफ्रीका की साझा रणनीति एक-दूसरे के लिए हितकारी है. मानव संसाधन विकास के मोर्चे पर भी भारत अफ्रीका की काफी मदद कर सकता है इस समय तकरीबन 40 हजार अफ्रीकी छात्र भारत में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं. अफ्रीका के कई बड़े राजनेता, ब्यूरोक्रेट भारत में पढ़कर गए हैं. ऐसे छात्रों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है और दिल्ली में हुई घटना इसमें रोड़ा बनती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से विदेश नीति को अपनी सरकार की प्राथमिकताओं की सूची में टॉप पर रखा है और जिस तरह वे दुनिया भर की यात्रा कर रहे हैं उससे साफ है कि सरकार अफ्रीकी महाद्वीप में छुपी अनंत संभावनाओं की अनदेखी नहीं करना चाहती. अफ्रीका में बसे 27 लाख भारतीय वहां के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं. ये लाखों भारतवंशी अहम भारत और अफ्रीकी देशों के बीच मज़बूत कड़ी हैं.