नज़रिया- अब राजस्थान इम्तेहान सदन में, धोक जनता दरबार में

Kshipra Mathur

Jaipur: Former Rajasthan chief minister Ashok Gehlot (R), State Congress President Sachin Pilot (L), AICC general secretary KC Venugopal (second R) and Congress incharge for the state  Avneesh Pandey greet each other after the party's win in the Assembly elections, in Jaipur, Tuesday, Dec. 11, 2018. (PTI Photo)

Jaipur: Former Rajasthan chief minister Ashok Gehlot (R), State Congress President Sachin Pilot (L), AICC general secretary KC Venugopal (second R) and Congress incharge for the state Avneesh Pandey greet each other after the party’s win in the Assembly elections, in Jaipur, Tuesday, Dec. 11, 2018. (PTI Photo)

राजस्थान कुछ महीनों से अपना मन बनाने के लिए नेताओं के कहे, किए और उनके हर कदम पर निगरानी कर रहा था। प्रदेश के चुनाव में फिर एक बार भाजपा एक बार कांग्रेस का फार्मूला फिट रहा। क्लाइमेक्स में जनता ने साफ जनादेश भी दिया लेकिन बीती सरकार को सिरे से खारिज भी नहीं किया। कांग्रेस 100 पर और भाजपा 73 पर यानी विपक्ष भी दमदार रहेगा इस बार। इस बात का अंदाज तो था ही कि जनता बहुत सयानी हो गई है। प्रदेश में उसे बदलाव चाहिए था लेकिन केन्द्र में वह मौजूदा सरकार की बाट जोह रही है।

अब कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद लोकसभा भी कांटे का हो गया है। दो सौ विधानसभा सीटों वाले राजस्थान की हर 199 सीट ने अपना अपना ठिकाना ढूंढा और 15वीं विधानसभा के इन चुनावों में न कोई लहर, न कोई वैचारिक एजेण्डा इसे हिला पाया। कामरेड भी जीते, नया मोर्चा भी, अपराधी भी पार लगे, ईमानदार भी नकारे गए और जाति की राजनीति ने फिर झण्डे गाढे। कई मंत्री – विधायक ठीक से ठिकाने लगे तो अपने दम पर खड़े दावेदारों ने अपना कुनबा बढ़ा लिया। वोट ऐसे बंटे कि इस बार नए समीकरण भी उभरे। अब तक चुनाव आयोग के जरिए आए आंकडों से जाहिर है कि पिछली बार 45 फीसदी वोट से फिसल कर भाजपा को हासिल हुए करीब 39.8 फीसदी और कांग्रेस 33 फीसदी से बढ़त कर करीब 39.3 में ही गढ़ जीत गई। यानी वोट के बंटवारे के लिहाज से तो भाजपा दशमलव से आगे ही है। अब तक मुट्ठी भर ही रहे निर्दलीयों और दूसरी पार्टियों ने रिकॉर्ड 20 फीसदी वोट और 26 सीटें लेकर दोनों पार्टियों को आईना जरूर दिखाया है। कांग्रेस ने चुनाव से पहले दूसरी पार्टियों से हाथ मिलाते हुए पांच सीटें छोड़ी तो नतीजा मिलाजुला रहा लेकिन साथ मिलकर चलने की आहट तो नजर आ ही रही है। अब जो जनता के हाथ में है वो है महकती हुई उम्मीदें। और जो जीती हुई पार्टी के हाथ में जनता को देखना है वो है घोषणा पत्रों में दिखाए सपनों को छूने का साहस।
इन चुनावों में भी पार्टियों के छोटे बड़े नेताओं की बयानबाजी ने उस जागरूक जनता को नाराज किया जो चुनावों को सिर्फ रोमांच नहीं बल्कि लोकतंत्र के उस उत्सव के तौर पर देखती है जहां उसकी भागीदारी हो, उसके हक के फैसले हों और इस उत्सव की उमंग सालों साल कायम रहे। इस मौके पर राजस्थान को खुद को याद दिलाना है कि उसे क्या चाहिए, कैसे चाहिए, कब तक चाहिए। अब सत्ता की कमान संभालने को तैयार कांग्रेस के युवा नेतृत्व सचिन पायलट और कांग्रेस के दिग्गजों को अपना घोषणा पत्र ही याद दिलाएं तो युवाओं को 3500 रूपए बेरोजगारी भत्ता देने का वादा है, सरकारी स्कूलों का वक्त बदलने की बात है, स्वास्थ्य के हक और मुफ्त दवाओं, दिव्यांगों को मुफ्त शिक्षा का जिक्र है, हर पंचायत समिति में मोबाइल वैन और एक रूपए किलो गेंहू और आदिवासी इलाकों के लिए दाल – तेल की पहुंच का हवाला है। इस बार जमीनी संगठन अपनी बातों को कागजों में मनवाने में कामयाब हुए है इसलिए खैरियत है कि खान मजदूरों को दिव्यांग श्रेणी में रखकर उन्हें तमाम लाभ और नई खनन नीति भी इस जन घोषणा पत्र में दर्ज है। इसके अलावा एक बड़ा वादा नजर आता है सभी संभागीय मुख्यालयों पर मूक बधिर बच्चों के लिए स्कूल खोला जाना। और अपनी शिकायतें दर्ज करवाने की पुख्ता व्यवस्था। कई आयोगों और बोर्डाें की भी लम्बी फेहरिस्त भी है। हिन्दू विस्थापितों को नागरिकता देने का आश्वासन भी है। नागरिकता की प्रक्रिया तो केन्द्र ने बनाई है लेकिन अमल में आने में कई बाधाएं हैं। देखना है नई सरकार प्रशासनिक सुस्ती और अनदेखी सेे कैसे पार पाती है।
ये याद रखना होगा कि राजस्थान में चुनाव की कमान संभाले कांग्रेस संगठन महासचिव और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पहले कार्यकाल में घोषणा पत्र को मुख्य सचिव के हाथ देकर उसे ही सरकार के पांच साल के कामकाज का रोडमैप मानकर काम करने का आदेश दिया था। लेकिन दूसरे कार्यकाल में ये पहल नदारद थी। कारण तलाशने होंगे। वादे हवा में न रहें ये जिम्मा मीडिया की निगरानी और जनता के जागे रहने से ही हो पाएगा। किस काम के लिए कितना बजट रखा। शिक्षा का बजट बढ़ाया कि नहीं, सामाजिक क्षेत्र पर ध्यान देने के लिए संवेदनशील अफसरों को चुना कि नहीं और हर काम को अंजाम देने के लिए चुनी टीम के काम का आकलन किया या नहीं। इन सबके बीच जनता – अफसर – नेताओं के आपसी संवाद का तौर तरीका बदला या नहीं। अब राजशाही का रवैया छोड़कर लोकसेवक की तरह पेश आना ही होगा। जनता के बीच उसकी जरूरतें जानने, उन्हें पूरा करने जाना ही होगा। इसके लिए सामाजिक संगठनों के जुड़ाव को भी वैचारिक मतभेदों से परे जाकर मजबूत करना होगा ताकि समाज के ताने बाने को हम मिलकर दुरूस्त कर सकें।
प्रदेश को अपने हाथों की कठपुतली मानने वाली संस्थाओं के चंगुल से बाहर निकलना भी एक चुनौती होगी इस सरकार के लिए। कोई भी छूटा महसूस न करे ये जिम्मा तो कुर्सी का ही है। उद्योग धन्धों को जिन्दा कर दें तो जाने कितने ही परिवार जी उठेंगे यहां। शराब से प्रदेश का पीछा छुड़ाने का कोई फार्मूला निकाल लाएं तो सदियों तक लाखों परिवार उन्हें बर्बादी से बचाने के लिए दुआएं देते रहेंगे। अगर बेटियों और महिलाओं की सच में फिक्र है तो शराबबन्दी का तरीका निकालना ही होगा, और राजस्व के बेहतर विकल्प तैयार करने ही होंगे।
राजस्थान की कला, संस्कृति, धरोहर को संवारने, पानी की योजनाओं को समय पर पूरा करने, शहीदों के परिवारों और कामगारों की तकलीफें खत्म करने, पढ़ाई के लिए दूर जाने की दिक्कत को मुफ्त परिवहन से सुलझाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी, जेण्डर बजटिंग आदि व्यवस्थाओं को लेकर संजीदगी, आदिवासियों के हितों के संरक्षण और जो तमाम अहम बातें नदारद लगें उन्हें याद करके प्राथमिकता में जुड़वाते भी जाना है। राजस्थान में न खनिज की कमी है, न पर्यावरण और पर्यटक स्थलों की। अब उस पैमाने पर और उस रफ्तार से काम करना है कि इस बार किसी की सुनवाई न होने और व्यवस्था पर नाकामी का कोई इल्जाम नहीं आए। जन प्रतिनिधि सिर्फ पांच साल में एक बार नजर आने के दाग से भी उबरने का इन्तजाम कर ही लेें तो बेहतर। प्रदेश को सकारात्मक ऊर्जा से भरने वालों की गूंज इतनी हो कि जन प्रतिनिधि सदन में जनघोष करता रहे तो जनता भी जयघोष में पीछे नहीं रहेगी। आने वाले साल यानी 2019 के लोकसभा चुनावों में सूबे की सत्ता पर काबिज़ पार्टी और विपक्ष दोनों की सदन और धरातल पर  सक्रियता ही तय करगी कि एक और बड़े इम्तेहान में कौन बाज़ी मरेगा।
 – डॉ क्षिप्रा माथुर