अभिव्यक्ति बनाम अराजकता

Gurdeep Singh Sappal

music_soundसुनते आये थे कि झूठ के पाँव नहीं होते. पर आजकल उसके पंख होते हैं. बिजली की गति से, समय-काल-स्थान की सीमाओं को लांघ कर, झूठ साइबर स्पेस के कोने कोने में ऐसे छा जाता है कि लगता है जैसे वही सनातन सत्य हो. रक्तबीज की तरह फैल जाता है.

यूँ तो सोशल मीडिया का जन्म अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिये हुआ था, लेकिन अब वह विकृत हो चला है. ज्ञान, सूचना, प्रोपेगंडा और अफ़वाह के भेद यहाँ समाप्त हो गये हैं. हर किसी की निजी राय अब ज्ञान है, फ़ैसला है. इसका चक्रव्यूह सिर्फ़ बारह महारथियों का नहीं है. यहाँ हर यूज़र महारथी है. उनके दंभ, तिरस्कार और लांछनों की गूँज इतनी ज़्यादा पैदा होती है कि कोई भी अभिमन्यु सच का पहिया ले कर कितना भी मुक़ाबला करे, उसे हारना ही है. यह प्रपंच का वह चक्रव्यूह है, जिसमें सच को उतरना भी है और हारना भी है.

कहा जाता है मानव सभ्यता पाँच हज़ार साल पहले शुरू हुई. क़रीब दो हज़ार साल पहले राज्य का स्वरूप बना. ढाई सौ साल हुये कि स्वाधीनता, समानता और भाईचारे के विचार को मान्यता मिली. बीसवीं सदी में मानवाधिकार मिले. लेकिन मानव मूल्यों के विकास का पहिया आख़िरकार इंटरनेट के मकड़जाल में उलझ गया है. सोशल मीडिया में मानवाधिकारों का तो कोई वजूद रहा नहीं. सभ्य आचरण भी नक्कारखाने में तूती की तरह है. इसमें जिसका चाहे चीरहरण कर दो, जिसे चाहे बेपर्दा कर दो. किसे भी बुली कर दो, किसी को भी गलिया दो. कोई बचाव नहीं, कोई सुनवाई नहीं. राज्य बेबस है, स्वाधीनता अराजक, नेतृत्व लाचार. यहाँ कौटिल्य से ले कर कालूराम तक को एक ही मंच उपलब्ध है. चार्वाक से ले कर चमचों तक के शास्त्रार्थ को बराबर मान्यता है. टके सेर भाजी और टके सेर खाजा चिरतार्थ हो रहा है.

सच यही है कि इंटरनेट की ताक़त अपरमपार है. लेकिन फिर भी लड़ना तो होगा. मानव सभ्यता तकनीक से हारनी नहीं चाहिये. समाज के बुद्धुकरण और निर्बाध मानसिक हिंसा और प्रताड़ना का सिलसिला कहीं तो थमना ही है. मानव विकास और उसके मूल्यों का सदियों के सफ़र का क़ाफ़िला यूँ ही तो नहीं लुट सकता.

पर यह लड़ाई निराली है. इंटरनेट के जिस प्लेटफ़ार्म पर ज़लालत छाई है, उसी प्लेटफ़ार्म को ही मज़बूत भी करना है. क्योंकि मर्ज़ ख़ुद ही इलाज भी है. यह सही है कि बहुत से लोग इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वाधीनता इस लिये चाहते हैं जिससे वो दूसरों की स्वाधीनता की हत्या कर सकें. लेकिन बहुत से लोग इस सच को भी समझते हैं कि यदि यह स्वाधीनता छीनने की हामी भरी तो फिर यह सिलसिला न जाने कहाँ जा कर थमेगा.

बड़ी चुनौती है. ज़हर को अपने ही गले उतार कर जूझना है. सभ्यता को उजाड़ते नेट के पागल, अनियंत्रित वेग को थामना भी है और उसे अनवरत बहते भी रहने देना है, ताकि उसकी अविरल धारा भविष्य की सभ्यता को सींच सके.

तकनीक का हल तकनीक में ही खोजना होगा. यह पहल संवेदनशील लोगों और बुद्धिजीवियों को करनी होगी. सूचना तकनीक का ख़ौफ़ अब आमतौर पर उनमें नहीं रहा, लेकिन अभी भी अपनी भूमिका को मात्र यूज़र तक सीमित किया हुआ है. तकनीक के विकास को सिर्फ़ टेक्नोक्रेट के भरोसे छोड़ने पर जो सूचना क्रान्ति आगे बढ़ेगी, वह ज़्यादातर सामाजिक सरोकारों से इतर ही होगी. वह उपयोगी तो होगी, लेकिन समाज और सभ्य मूल्यों के जटिल ताने बाने से उसका संबंध सांयोगिक ही होगा. मानव विकास के आगे के सफ़र को मात्र संयोग के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

यूँ भी यह नया फिनामिना है कि समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों की किसी रिसर्च में सीमित भूमिका है. इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो विज्ञान तकनीक के विकास का इंजन बुद्धिजीवी ही रहे हैं. लेकिन सूचना क्रान्ति के दौर में टेक्नोक्रेट और बुद्धिजीवी अलग अलग खाँचों में बँट गये हैं. अब तकनीक का इंजन वह लोग हैं जो कोर्स के अतिरिक्त कभी कुछ नहीं पढ़ते और उस पर फ़ख़्र भी करते हैं.

इसी लिये जो समाज को समझते हैं, चिंतित हैं, उन्हें ही आगे आना होगा. ख़ुद भले ही टेक्नोक्रेट न बन पायें, लेकिन तकनीक के विकास में भूमिका पुनः तय करनी होगी. सोशल मीडिया और इंटरनेट की कमियों को दूर करने के तार्किक उपाय ढूँढने की ज़रूरत है. सूचना तकनीक की ख़ूबी यही है कि यदि कुछ भी तार्किक है, तो वह सॉफ़्टवेयर में बदला जा सकता है. इस लिये लाचार यूज़र की मनःस्थिति से बाहर निकल कर तकनीक को दिशा देने की ज़िम्मेदारी उठानी ही है. क्योंकि मानसिक पीड़ा पर उतारु असंवेदनशील समाज मानव सभ्यता की न तो मजबूरी हो सकती है, न ही उसके विकास का अंतिम पड़ाव!

(इस लेख का संपादित रूप जनसत्ता समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है)