आई टी सेक्टर – भारत का कमाऊ पूत

Sandeep Yash
File Photo: IT Sector

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इसी बरस जब मार्च से कोविड का कहर बढ़ा तो सरकार ने कुछ सेक्टर्स में कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दे दी। उस फेहरिस्त में सबसे ऊपर आईटी सेक्टर का नाम था। बताने की ज़रुरत नहीं है कि  – क्यों। इस लेख को लिखते वक़्त ये सुविधा फिलहाल 31 दिसंबर बढ़ा दी गयी है। और हो भी क्यों न। दुनिया भर में हमारा आई टी सेक्टर भारत की अनूठी साख और सबलता का प्रतीक जो है।  तो चलिए आज इसके वजूद की तफ्तीश करते हैं। जगह कम है इसलिए ज़रूरी जानकारी पर ही तवज्जो रहेगी।

हमारे देश में इस सेक्टर की पहली आहट 1963 में बनी ‘भाभा समिति’ में मिलती है। इस समिति ने 1966–1975 के बीच कंप्यूटर निर्माण में घरेलू क्षमता तथा  तकनीक विकसित करने का नक्शा दिया था। इसके बाद बनी साराभाई समिति ने भी पहली समिति की सिफारिशों को सही ठहराया था

70 का दशक

– भाभा समिति की सिफारिश देश में एक ऐसा कंप्यूटर उद्योग लगाने की थी जो आत्मनिर्भर हो और जो पब्लिक सेक्टर के तहत पनपे। ये जिम्मा Electronics Corporation of India Limited (ECIL) को सौंपा गया। 1971 में ECIL अपना काम शुरू किया।  साथ ही 1973 में देश का पहला software export zone SEEPZ मुंबई में स्थापित किया गया।

– 1974 में बने Minicomputer Panel बना जिसने तकनीक और उत्पादन के नज़रिये से ECIL पर भरोसा जताया। सरकार ने कदम आगे बढ़ाये और मार्च, 1975 को National Informatics Centre की स्थापना की।

– पर ECIL के उत्पाद सरकार तक ही सीमित रहे। 1976 तक ये साफ़ हो गया था कि कीमत, तकनीक और घरेलु मांग के मोर्चे पर ये पहल नाकाम थी।

– तो 1978 में सरकार ने Minicomputer Policy लाकर प्राइवेट सेक्टर के लिए दरवाज़े पूरे खोल दिए।

आपकी जानकारी के लिए, इसी दशक में मुंबई में एक और एहम घटना घटी थी। इसने प्राइवेट सेक्टर (आई टी) के विकास का रास्ता विदेशों में खोला था।  हुआ ये कि 1974 में कंप्यूटर मेनफ़्रेम बनाने वाली एक अमेरिकी कंपनी बरोज़ ने Tata Consultancy Services (TCS) से अपने अमेरिकी ऑफिस के लिए  प्रोग्रामर्स मांगे थे। यहीं से मुंबई की कंपनियों द्वारा समुद्र पार आईटी कंपनियों में मेधावी प्रोग्रामर भेजने का चलन शुरू हुआ जो बढ़ता और फैलता चला गया।

–   जान लीजिये कि भारत में प्राइवेट सेक्टर (आई टी) का शुरुआती दौर काँटों से भरा था। अर्थव्यवस्था और नीति -दोनों का रवैय्या दोस्ताना तो नहीं था।
–  सॉफ्टवेयर पर आयात शुल्क 100% और हार्डवेयर पर 135 % तक था।
–   तब उद्योग का दर्ज़ा न होने से निर्यातकों को बैंक से क़र्ज़ तक नहीं मिलता था
–   घरेलु बाज़ार का आधार छोटा था
–  पर इसी दशक में कई ऐसी सॉफ्टवेयर कंपनियों के बीज भी पड़े जो आज दुनिया में सफलता और भारतीय मेधा का पर्याय हैं।

तो 70 का दशक ऐसी सरकारी नीतियों का गवाह रहा जो पब्लिक सेक्टर के इर्द गिर्द ही सिमटी रहीं। बुनियादी बदलाव दशक के अंत में आते हैं।

80  का दशक

– हालांकि इस दशक के शुरू मं कुछ बड़ी कंपनियों ने सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट शुरू किया था पर नतीजे ख़ास नहीं आये।  सॉफ्टवेयर की बुनाई हार्डवेयर पर निर्भर थी और इस विषय पर नीतियां उम्मीद जगाने वाली नहीं थीं। बुनियादी ढांचा भी कच्चा था।

– ये microchip revolution का भी दौर था। सरकार को अब देश की प्रगति और विकास में इस सेक्टर की महत्ता का एहसास होने लगा था।

–  1984 में सरकार, New Computer Policy (NCP-1984) लाती है। आईटी सेक्टर को लाइसेंस -परमिट राज से मुक्ति मिलती है

–  सॉफ्टवेयर निर्यात को delicensed industry का दर्ज़ा मिलता है, विदेशी कंपनियों को देश में अपनी निर्यात इकाईयां लगाने की अनुमति मिलती है,
सारे देश में Software Technology Parks बनाने की योजना बनती है।

– सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर पर लगा निर्यात कर 60 % तक घटा दिया जाता है। सरकार 100% तक विदेशी इक्विटी को अनुमति देने के साथ सभी इनपुट और उत्पादों पर से ड्यूटी खत्म कर देती है।

– इस दौर में भारतीय कम्पनिया कम लागत और Capability Maturity Model (CMM) जैसी उन्नत तकनीक अपना चुकी थीं।  इससे पश्चिमी देशो से काम भारत आना शुरू हुआ।  मुंबई जैसे पुराने केंद्र हाशिये पर जाने लगे और बंगलोर जैसे नए केंद्र वजूद में आये।

–  1986 -87 में, सरकार ने तीन computer networking schemes – INDONET, NICNET और ERNET को प्रोत्साहित किया

–  इतने मेहनत  के पीछे सरकार की मंशा थी कि ये सेक्टर विदेशी मुद्रा अर्जित करे जिसकी देश में फिलहाल कमी थी।

–   देश का आईटी सेक्टर आज जिन बुलंदियों को छु रहा है, विशेषज्ञ इसका श्रेय इसी दौर की मुखर नीतियों को देते हैं

90 का दशक

– 1991 में हुए उदारीकरण का फायदा इस सेक्टर को भी मिला।  मल्टीनेशनल्स को आमंत्रण और 100 % विदेशी निवेश की अनुमति दी गयी। इनमें 75 % निवेश महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात और दिल्ली को मिला।  Offshore Model, Onsite Model और Global Delivery Model भी वजूद में आये और सेक्टर को विस्तार दिया।

-1991 में Department of Electronics ने Software Technology Parks of India (STPI) बनाया। इसका मक़सद कंपनियों को अलहदा शहरों में
VSAT communications मुहैया कराना था।

– 1993 से सरकार ने इन कंपनियों को खुद की संचार प्रणाली बनाने की अनुमति दे दी जिससे मुकम्मल काम को सीधे विदेश भेजा जा सके।

– 1995 -96  में इस सेक्टर ने कई कीर्तिमान बनाये थे

– सन  1999 -2000 में कुल सॉफ्टवेयर निर्यात 17,150  करोड़ रुपये था जबकि घरेलु बाजार 7200 करोड़ रुपये का हो गया था

– सन  1999 -2000 तक ये सेक्टर 2, 84000 पेशेवरों को रोज़गार दे रहा था

सन 2000 -2010 तक

–  इस दशक में पिछली नीतियों के सकारात्मक परिणाम मिलने शुरू हो गए थे। हमारे आई टी सेक्टर ने बड़ी तेज़ी से विकास किया और खूब विदेशी मुद्रा कमाई थी।

–  2005 में Special Economic Zone (SEZ) Act पास हुआ।  इससे ड्यूटी फ्री हार्डवेयर आयात करने में मदद मिली और 10 वर्षों तक निर्यात पर आयकर छूट भी। नतीजतन सॉफ्टवेयर कंपनियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ।

-. सन 2000 में Information Technology Act पास हुआ जिससे e-commerce को कानूनी आधार मिला, क्षेत्र का विस्तार हुआ

– 2004 में National broadband policy का ऐलान हुआ जिसमे 2010 तक 2 करोड़ नागरिकों को ब्रॉडबैंड की सुविधा देने का संकल्प था

– विशेषज्ञों के अनुसार विदेशी कंपनियों को (देसी कंपनी से जुड़े बगैर) भारत में तिजारत करने का नीतिगत फैसला बेहद कामयाब रहा।  इस दौर में तमाम ऐसी कंपनियों ने भारत में अपने नीड का निर्माण किया।

– इसी दशक में बैंक, सरकारी ऑफिस, रेलवे स्टेशन , एयरपोर्ट वगैरह का तेज़ी से कम्प्यूटरीकरण हुआ।  E‐Governance का विस्तार हुआ, इसका लाभ भी आई टी उद्योग को मिला।

– आकड़ों के मुताबिक़ इस दशक में 1250 मल्टीनेशनल कंपनियों ने भारत में अपना ऑफिस खोला।  इनमें से तमाम का फोकस R&D पर रहा। .

सन 2010 और आगे

– भारत दुनिया का अव्वल सोर्सिंग डेस्टिनेशन बन चुका था। Online retailing, cloud computing और e-commerce हमारे आई टी उद्योग के आधार रहे

– 2016 17 में सेक्टर की विकास दर करीब 14 % रही

– भारत का internet user base दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा था

– देश के कुल निर्यात में इसका हिस्सा 3 % (1998) से बढ़ कर 26 % (2011 -12) हो गया था

– 2019 तक इस सेक्टर में 7000 start-ups और 1,200 से ज़्यादा technology start-ups दर्ज़ थे

– पिछले कुछ बरसों में 18 देसी start-ups 1 अरब डॉलर के मूल्यांकन को छू चुके हैं

– लगभग 200 भारतीय आई टी कंपनियों ने 80 देशों में 1000 से ज़्यादा डिलीवरी सेंटर खोले हैं .

– 2019 20 में भारत का ग्लोबल सोर्सिंग में 55 % हिस्सा था।
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तो जाते जाते

– भारत में आई टी उद्योग, सर्विस सेक्टर का हिस्सा है।
– ताजा आकड़ों के मुताबिक़ इस सेक्टर से प्रत्यक्ष तौर पर करीब 41 लाख और अप्रत्यक्ष तौर पर एक करोड़ से ज़्यादा लोग जुड़े हैं
– इस सेक्टर की हालिया दशक में औसत विकास दर 7. 7 % रही है
– 2020 में इस सेक्टर से अनुमानित राजस्व 191 अरब डॉलर था
– 2025 तक ये राजस्व 350 अरब डॉलर होने की सम्भावना है
–  2025 तक डिजिटल इकॉनमी का आकार 1 खरब डॉलर होने का आकलन है
– अप्रैल 2000 से मार्च, 2020 के बीच इस सेक्टर में करीब 45 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया
– फरवरी 2019 में सरकार ने National Policy on Software Products 2019 जारी की
– 2019 -20 में सरकार ने Artificial Intelligence (AI) के विकास के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का ऐलान किया
– आई टी उद्योग का भारत की जी डी पी  में करीब 8% का योगदान है
–  इस वक़्त देश में 31922 रजिस्टर्ड आई टी कंपनियां हैं
– ये सेक्टर देश के लिए सर्वाधिक विदेशी मुद्रा अर्जित करता है। देश के कुल निर्यात में इसका हिस्सा करीब 25 % है
– आई टी उद्योग के श्रमबल  में लगभग 30 % महिलाएं हैं

सच कहें तो ये एक ऐसा विषय है जिस पर कई किताबें लिखीं जा सकती है। इस अकेले एक सेक्टर ने चंद दशकों में भारत के प्रति सोच को बदल कर रख दिया और साबित किया कि आज के तकनीकी युग की गाथा भारत के बगैर लिखी ही नहीं जा सकती।  और इस सत्य को प्रमाण की ज़रुरत नहीं है।