आचार्य विनोबा भावे

Sandeep Yash
Vinoba Bhave

Vinoba Bhave

आज विनोबा भावे की 125वीं जयंती है। इनसे जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा ह्यै। ये उन दिनों की बात है जब चम्बल अपनी बदनामी से पिंड छुड़ाने की भरसक कोशिश कर रहा था। इसी बाबत 1960 में बागी मान सिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह ने नैनी जेल, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से एक चिट्ठी लिख कर विनोबा भावे को चम्बल आने का आग्रह किया था। उन्होंने लिखा था की फांसी चढ़ने से पहले वो चंबल घाटी की समस्या का निराकरण और विनोबा जी के दर्शन करना चाहते है। विनोबा जी फिर चंबल आये थे और 10-26 मई 1960 के बीच 20 बागियों ने उनके सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया था। ऐसा था विनोबा भावे का नैतिक आभामंडल।

विनोबा जी का जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के गगोडे गाँव में हुआ था। विनायक नरहरि भावे यानी विनोबा भावे, नरहरि शंभू राव और रुक्मिणी देवी के सबसे बड़े पुत्र थे। एक प्रखर छात्र होने के बावजूद इनकी दिलचस्पी पारम्परिक शिक्षा में न होकर आध्यात्म और स्वतंत्रता आंदोलन में थी। एक दिन अंतरात्मा की आवाज़ पर ये देशभ्रमण पर निकल पड़े। फिर इनके काशी प्रवास के दौरान महात्मा गाँधी का BHU आना हुआ। दूसरे दिन अखबार में छपे उनके भाषण से प्रेरित होकर विनोबा जी ने अपने सारे शैक्षिक सर्टिफिकेट्स जला दिए। आखिरकार इन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया था।

जून 7, 1916 को 20 वर्षीय विनोबा जी, कोचरब आश्रम, अहमदाबाद में गाँधी जी से मिले और उनके आग्रह पर आश्रम में रहने का निश्चय किया। गाँधी जी को साउथ अफ्रीका से भारत आये कुछ ही वक़्त हुआ था और वो स्वतंत्रता आंदोलन को तेज करने के उपाये ढूढ़ रहे थे। विनोबा जी ने खादी आंदोलन और शिक्षा प्रकल्पों से जुड़ कर उनके प्रयासों को बल दिया था। इसी आश्रम में एक अन्तःवासी मामा फड़के ने विनायक नरहरि भावे को पहली बार ”विनोबा” के नाम से पुकारा था जिसका मराठी भाषा में अर्थ ”सम्मानित जन” होता है।

विनोबा जी महात्मा गाँधी को अपना गुरु माना था और अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा गाँधी जी के आश्रमों में गुज़ारा। अपने वर्धा प्रवास के दौरान इन्होने मराठी में एक मासिक पत्र ‘महाराष्ट्र धर्म’ भी निकाला जिसमे उपनिषद पर आधारित निबंध छपते थे। आने वाले बरसों में विनोबा जी ने जन -असहयोग और स्वदेशी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था, चरखा कात कर आम जन को प्रेरणा दी थी। 1932 में उन्हें जेल जाना पड़ा। वहाँ भी उनका समय कैदियों को मराठी भाषा में गीता का मर्म समझाते हुए बीता। बाद में इन सारे संदेशों ने एक किताब की शक्ल ली थी।

विनोबा जी को गाँधी जी का अटूट विश्वास प्राप्त था। यही वजह थी कि 5 अक्टूबर, 1940 को उन्होंने विनोबा जी को सत्याग्रह आंदोलन के दौरान पहले सत्याग्रही के तौर पर प्रस्तुत किया था।

आज़ादी के बाद गाँधी के सपनो का भारत बनाने के लिए विनोबा जी ने सर्वोदय आंदोलन शुरू किया -जिसका अर्थ था ” जन जन का विकास”, मशहूर भूदान आंदोलन इसी विचार की उपज था। इस आंदोलन की शुरुआत 18 अप्रैल, 1951 को हिंसाग्रस्त तेलगाना के पोचमपल्ली गाँव से हुई थी। यहाँ विनोबा जी के आग्रह पर स्थानीय ज़मींदारों ने हरिजनों को खेती के लिए तमाम एकड़ ज़मीन दे दी थी। भूदान आंदोलन अगले 13 बरस तक चला था। विनोबा जी ने देश भ्रमण कर लगभग 44 लाख एकड़ ज़मीन दान में हासिल की थी। इसमें से करीब 13 लाख एकड़ ज़मीन भूमिहीन किसानो को बांटी गयी थी। भूदान आंदोलन को अपने शांतिप्रिय और अहिंसात्मक चरित्र के लिए देश -विदेश में काफी सराहना मिली थी। ऐसे ही विनोबा जी ने ग्रामदान सिद्धांत को भी बढ़ाया था – इसके तहत समस्त गॉव को एकल सूत्र में पिरोना और एक परिवार का स्वरुप देना था।

1959 में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने ब्रह्म विद्या मंदिर की स्थापना की थी। उस दौर में उन्होंने गोहत्या पर भी कड़ा रुख अपनाते हुए प्रतिबंधित करने की मांग की थी, उपवास किया था। विनोबा जी मराठी, तेलुगु, गुजराती, कन्नड़, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओँ के जानकार थे। वो मानते थे कि भारतीय शास्त्रों के सन्देश जन जन तक पहुंचाने के लिए उनका संस्कृत से अन्य भाषाओं में अनुवाद होना ज़रूरी है। ये काम भी उन्होंने बखूबी किया था। स्वराज्य शास्त्र, गीता प्रवचन, तीज शक्ति जैसी पुस्तकें भी उन्होंने लिखीं थीं।

विनोबा जी पहली अंतराष्ट्रीय शख्सियत थे जिसे मैग्ससे पुरस्कार से नवाज़ा गया था। नवंबर, 1982 में वो गंभीर रूप से बीमार पड़े और स्वेच्छा मृत्यु का मार्ग अपनाते हुए अन्न -जल त्याग दिया। श्रीमद्भगवतगीता के दर्शन में आजीवन रमे भारत के इस लाल ने 15 नवंबर, 1982 को प्राण तज दिए। तब इनकी उम्र 87 बरस की थी। कृतज्ञ राष्ट्र ने इस अहिंसा के उपासक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और आध्यात्मिक शिक्षक को 1983 में भारत रत्न सम्मान से आभूषित किया।

आज महात्मा गाँधी के इस आध्यात्मिक वारिस नाम आदि शंकर, रामानुज, माधव, रामकृष्ण , विवेकानंद, महर्षि अरविन्द और टैगोर जैसे महान सपूतों के साथ श्रद्धा से लिया जाता है जिन्होंने अपने दर्शन, नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति से भारत को समृद्ध और बेजोड़ बनाया।

राज्य सभा टीवी परिवार का आचार्य विनोबा भावे को नमन