आर्डर- आर्डर गोदावरी को पानी ना दिया जाए…

Abhay Mishra

Shahi_Snan2पिछले हफ्ते आए हाईकोर्ट के एक फैसले ने सदियों पुरानी परंपरा पर सवालिया निशान लगा दिया, कोर्ट ने वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या के प्रति चेतने को कहा और एक भयावह भविष्य का संकेत दे दिया.

बाम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि कुंभ के तीसरे शाही स्नान के लिए गोदावरी में गंगापुर बांध से पानी ना छोड़ा जाए. न्यायालय और याचिकाकर्ता का तर्क था कि पहले स्थान पर पीने का पानी आता है दूसरे स्थान सिंचाई और तीसरे स्थान पर व्यावसायिक उपयोग के लिए पानी की प्राथमिकता है, शाही स्नान इस प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं है.

न्यायालय ने इसे राष्ट्रीय जल नीति का उल्लंघन करार दिया. जहां पूरा मराठवाड़ा सूखे जैसी स्थिती का सामना कर रहा है, पहली नजर में ये निर्णय एकदम सही लगता है. कोर्ट के इस निर्णय का सुधारवादियों ने जहां एक ओर स्वागत किया और तो वहीं साधु संतों ने इसकी आलोचना की.

तीसरे शाही स्नान के लिए बांध से एक टीएमसी पानी छोड़ा जाना था. अब तक जितना पानी स्नान के लिए छोड़ा गया है उससे करीब 300 गांवों के पीने के पानी की समस्या का समाधान हो सकता था. आस्थावान सदियों पुरानी स्नान परंपरा में अवरोध पैदा करने का आरोप लगा रहे है.

लेकिन इन सबके बीच गोदावरी नदी है, जो पूरे विवाद के केंद्र मे होते हुए भी उपेक्षित है. उसके पानी पर उसका भी हक है ये मानने को कोर्ट, साधु संत, याचिकाकर्ता सहित कोई भी तैयार नहीं है.

दरअसल कुंभ में जुटी लाखों की भीड़ से नदी के तट और जल में गंदगी भी भर गई है, मेला प्रशासन का मानना है कि गंगापुर से पानी का फ्लो आता तो नदी साफ हो जाती है, इस गंदे पानी में स्नान करने से कई तरह की बिमारियों की आशंका फैल गई है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि भविष्य में कुंभ मानव निर्मित नदियों के किनारे ही आयोजित होंगे. इन शाही स्नानों में गोदावरी के लिए कुछ भी शाही नहीं है, उसका पानी निचोड़ कर बांध में रख लिया जाता है और उसे बदले में कारखानों और घरेलू सीवेज से भर दिया जाता है. संसाधनों को लेकर अज्ञानता, हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों खराब कर रही है.

2003 के उज्जैन कुंभ में भी क्षिप्रा नदी को दोनों ओर से बांध कर बीच के हिस्से में टैंकरों से पानी लाकर डाला गया था ताकि सूखी क्षिप्रा के किनारे लगने वाला कुंभ सफल हो सके. उस समय मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती ही थी जिन्हे आज देश भर के पानी के संरक्षण का जिम्मा सौंपा गया है.

गए पानी पर किए गए ऑडिट में 2010 में कहा गया था कि 70 फीसदी पानी पहली तीन श्रेणी यानी पीने, सिंचाई और व्यापारिक उपयोग में लाया जाता है और 30 फीसदी दूसरी चीजों में. दूसरी चीजें क्या हैं ये साफ नहीं है.

क्या नदी का अपने पानी पर हक इस 30 फीसदी में भी नहीं आता. उमा भारती के जल संसाधन मंत्री बनने के बाद भी ना तो इन ऑकड़ों को स्पष्ट किया गया है नाहि इनमें रत्तीभर भी बदलाव आया है. लाखों की आबादी जो कुंभ में आस्था की डुबकी लगाने पहुंच रही है उसकी आस्था को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है? नदी को खत्म कर उसे स्वीमिंग पूल की तरह उपयोग में लाने से कौन सी परंपरा का पालन हो रहा है ?

बहरहाल इस इलाके में कॉटन और सोयाबीन मिले बंद पड़ी है, खरीफ की बुआई में भारी कमी आई है. मराठवाड़ा और कोंकण के कुछ इलाकों में बारिश बेहद कम हुई है. लेकिन इससे पहले सरकार को किसने रोका था इन गांवों को पानी देने से.

दरअसल महाराष्ट्र में पानी काफी पहले से राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है. बांधों और नदियों के पानी पर दबंगों का ही कब्जा रहता है. इस बात की कोई गारंटी नहीं कि गंगापुर बांध का पानी गरीबों तक पहुंच पाएगा. इस बात की पूरी आशंका है कि मराठवाड़ा में पानी किसी भी दिन बड़े जनसंहार का कारण बन सकता है.

महाराष्ट्र सरकार ने कैलाश मानसरोवर से पवित्र जल लाने के लिए एक टीम को चीन भेजा. इस टीम में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़वनीस की पत्नी भी शामिल थी. इस जल को लाकर कुंभ स्थान में रामघाट में डाला गया. अब सरकार और समाज दोनों के लिए चेतने का वक्त है कि प्रतीकात्मक चीजों से ना कुंभ सफल हो सकता है ना खेती. इसके लिए गोदावरी की शरण में जाना होगा, उसकी चिंता करनी होगी.