आलेख: गुजरात चुनाव के दर्पण में

Dr. Vishnu Pandya
File Photo : Voters stand in a queue to cast their vote (PTI Photo)

File Photo : Voters stand in a queue to cast their vote (PTI Photo)

गुजरात की 26 सीटों पर 23 अप्रैल का मतदान अपने साथ जुड़े हुए राजनीतिक अतित से अलग-थलग नहीं हैं। कारण ये है कि अनेक जाति-जनजाति-वर्ण-संप्रदाय-कॉम के अस्तित्व ने गुजरात का मानचित्र (नक्शा) बनाया है। कम से कम पांच हजार वर्ष की यह परंपरा हैं: संकल्प, समन्वय, सामंजस्य, संघर्ष और सिद्धि का शिखर। विनाश से निर्माण, आपत्ति को अवसर में बदलना भर सामन्थ गुजराती की प्रकृति रही है।

ये प्राच्य-स्थान लोथल चार बार सुनामी में नष्ट हुआ, तो चारों बार लोथल वासियों ने निर्माण किया। पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ के जीर्णोद्धार की भी ऐसी ही कहानी है। 2002 में विनाशक भूकंप से संपूर्ण नष्ट हुए कच्छ को अब ‘नूतन कच्छ’ के रुपांतर का सौभाग्य प्राप्त है। इसी को गुजरात की अस्मिता कहते हैं, जिसे प्रचलित करने वाले संविधानविद् साहित्याकार कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी थे।

महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा, मदाम कामा, जमशेद जी टाटा, दयानंद सरस्वती, सरदार भगत सिंह के साथी भगवती चरण वोहरा और गुजरात राज्य स्थापना के आंदोलकारी नेता इंदुलाल याज्ञिक ने आधुनिक गुजरात की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक छवि को संवारा है।

1960 के पूर्व, अलग सौराष्ट्र और शेष गुजरात, मंबुई-महाराष्ट्र से जुड़ा हुआ था। 1960 में गुजरात राज्य बना। प्रथम मुख्यमंत्री डॉ जीवराज नारायण मेहता थे, जिन्हें खुद के दल कांग्रेस के अविश्वास को झेलना पड़ा। दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता समस्त देश में पंचायती राज के संस्थापक-विचारक भी थे। 1967 से गुजरात में दल-बदल की राजनीती आई। 1974 में प्रथम छात्र आंदोलन हुआ, जिसका लक्ष्य भ्रष्टाचार के खिलाफ संर्घर्ष का था। मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और 1974 के जनआंदोलन का प्रभाव समस्त देश में जेपी आंदोलन पर पड़ा। आपातकाल के पूर्व गुजरात में पहली बार कांग्रेस विरोधी सरकार बनी, जिसने राष्ट्रीय फलक पर ‘जनता दल’ के निर्माण को प्रेरित किया था। आपातकाल में गुजरात ने सबसे बड़ा संघर्ष किया, उसी संघर्ष के भूगर्भवास में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा पायी थी। वाजपेयी, आडवाणी, पीलू मोदी, वीरेन शाह, जस्टिस नथवाणी, मीनू मसानी जैसे दिग्गज गुजरात से सांसद बने। सरदार पुत्री मणिबहन पटेल और समर्थ महामंत्री एच एस पटेल को भी सक्रिय सांसद बनने का मौका मिला। मोरार जी देसाई और नरेन्द्र मोदी-गुजरात से चुने गए सांसद भारत के प्रधानमंत्री बने।

इस बार का माहौल 2014 का सन्धान है। ‘गुजरात से प्रधानमंत्री’ यह मानसिकता तो है ही, लेकिन ‘गुजरात मॉडल’-सा विकास समस्त देश में हो, ‘सबका साथ, सबका विकास’ राजसूत्र हो, यह भी इस बार के चुनाव की विशेषता है। तीसरा प्रभाव है, देश की आंतरिक-बाह्य सुरक्षा के लिए दृढ, संवेदनशील नेतृत्व की चाहत का होना। वर्तमान राजनीति में अकेले नरेन्द्र मोदी ऐसे नेता है, जिसने पांच वर्ष में देश को नया आयाम दिया है। और कोई विकल्प ही नहीं, ना नेतृत्व का, ना दल का। यहा एक वास्तविक परिस्थिति है और गुजरात का मतदाता भलिभांति समझता है कि अबके दिनों में देश को राजनीति स्थिरता और सामाजिक इच्छा शक्ति, दोनों की जरुरत रहेगी।

ऐसा नहीं कि नागरिक को अन्य राजनीतिक दलों से संपूर्ण निराशा रही है। अतित में 1974 तक गुजरात में कांग्रेस का शासन रहा। बाद में भी उनकी सरकार बनी। राजनीतिक संतुलन गुजरात के लिए सहज-स्वभाविक रहा है। लेकिन वर्तमान स्थिति में गुजरात ने 1952 से प्रवृत्त जनसंघ और 1977 में जनता दल को सम्मिलित, फिर 1980 से भारतीय जनता पार्टी के रूप में सर्वाधिक दल की आंदोलनात्मक और शासन कौशलदत्य, दोनों का परिचय जनता को रहा है। 1967 तक जनसंघ का एक भी विधायक विधानसभा में नहीं था। उसी दल को 1996 के बाद शासकदल बनने का सौभाग्य मिला, जो आज भी याथावत् है। 2014 में यहां से सभी 26 सीटों पर भाजपा विजय हुई थी। हो सकता है कि नागरिक कुछ सीमा तक संतुलन के लिए दो-तीन सीट अन्य दलों को दें, लेकिन समग्र दृष्टि से गुजरात अपनी कैल्कुलेटिव प्रकृति के साथ राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य ही रखेगा। हमारे कवि उमाशंकर जोशी के कविता में एक पंक्ति है “हुं गुर्जर भारतवासी” मै गुजराती अवश्य हूं, लेकिन मैं ठोस भारतीय भी हूं।

2019 के चुनाव परिणाम में उसी गुजरात की तस्वीर देखने को मिलेगी।

- पद्मश्री डॉ विष्णु पण्डया