एक नदी में पत्थर की तरह कुछ-कुछ सोखा करती थी: अनामिका

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शख्सियत में इस बार हमने बात की कवयित्री, उपन्यासकार और आलोचक अनामिका से। उनका जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर में, 17 अगस्त 1961 में हुआ। अनामिका की लेखनी में महिला और उनसे जुड़े मुद्दों का सजीव वर्णन देखने को मिलता है। समाज मे मौजूद विसंगतियों पर गहरी सोच रखने वाली अनामिका इन्हें प्रमुखता से अपने उपन्यास और कविता के ज़रिए पाठकों के समक्ष रखती हैं। खुरदरी हथेलियां, स्त्रियां, दरवाज़ा, बीजाक्षर, अब भी बसंत को तुम्हारी ज़रूरत है, दूब-धान, जन्म ले रहा है नया पुरुष जैसी अनामिका की बेहतरीन काव्य रचनाएं हैं। साहित्य की अपनी यात्रा में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है 1996 में भारत भूषण पुरस्कार, 1998 में गिरिजा माथुर सम्मान और साहित्यकार सम्मान ने पुरस्कृत किया गया। हमने बात की कलम की दुनिया के इस सितारे से और जाना उनके ज़िंदगी के सफर के कुछ खास पहलुओं के बारे में…

Q: एक छोटी सी लड़की एक बहुत बड़ी सी लाइब्रेरी में अकेले घूमती है..जो दिखता है उसे पढ़ती है या जिन पात्रों का ज़िक्र उनके सामने आता है वो उनमें जीती है..वो लड़की और उसका बचपन कैसा था?

A: एक मेरी किताबें थी, दूसरे मेरे माता-पिता के वो दोस्त थे जो देश-विदेशी युनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे. अकादमिक लेखक थे, कवि थे, उनकी गपशप, अंतरग गपशप, चर्चाएं, देश-दुनिया की और जितनी भी राजनीतिक चर्चाएं होती हैं और उनके भीतर बहते हुए सतत साहित्यक चिंताओ की धारा होती है. उन सबके किनारे मैं चुपचाप बैठा करती थी. चुपचाप ऐसे जैसे कोई पत्थर पड़ा होता है कहीं किनारे पर लेकिन चुप-चाप पानी पीता हुआ पत्थर. तो यही मुझे लगता था कि मैं उस तरह से पड़ी हुई हूँ और कुछ-कुछ सोख रही हूँ. छोटे शहरों के जो हम लोग हैं. उस तरह के लोग जो ज़मीन से जुड़े हुए होते थे जैसे माँ से मिलने बहुत तरह की स्त्रियां आती थीं, जो अलग-अलग दुखों से परेशान होती थी. मां बहुत ही बड़े दिल की औरत थीं. तो लोग उनसे सलाह-मश्विरा करने आते थे।

Q: माता-पिता से आपकी दोस्ती कैसी थी?

A: रात में मैं पिताजी से कहानी सुने बिना और उनसे गपशप किए बिना सो ही नहीं पाती थी. वो अपने ढ़ंग से व्यस्त रहते थे लेकिन रात में मुझे थपकी देने मुझसे गपशप करने आते ही थे और अगर नहीं आते थे तो मैं उन्हें बहुत तंग करती थी. मैं पलंग के नीचे छिप जाती थी और मैं वहाँ बिल्लियों की तरह बैठी रहती थी. मानो बिल्ली बन के बैठी रहती थी…और पिताजी बेचारे कहीं से कहानी कविताएँ सुना के मुझे बाहर निकालते थे. उस समय मेरी उनसे दोस्ती हो जाती थी. एक अज़ब बात हुई जब मेरे पिता का इंतकाल हुआ. मैं यहाँ एम.ए. का एग्ज़ाम दे रही थी. उनके जाने के बाद मुझे ख्याल आया कि मैं अब कैसे रहूंगी? उसके बाद मुझे एक दम से लगा कि मुझे मां के लिए एक दोस्ताना अहसास उमड़ गया मेरे भीतर. माँ की उपस्थिति हवा जैसी थी, बैकग्राउंड म्युज़िक जैसी.

Q: पिता आपके बहुत मशहूर कवि रहे तो क्या ये वजह रही कि आप कविता की दुनिया से जुड़ीं?

A: गप्पी तो मैं थी ही. मुझे गपशप करना अच्छा लगता था. किसी से भी..कविता की सबसे बड़ी ताकत क्या है कि कविता एक अंतरंग अहसास रच देती है. ऐसी भाषा कि उस लेवल पर बात करती है जहाँ सारे ऊंच-नीच ढह जाती है. ये गपशप में भी यही होता है ना…कन्धे पर हाथ रख के आप अपने दुख-सुख बांट लेते हैं पूरी तरह से, वहां कोई ऊपर-नीचे नहीं होता. एक भाषण में होता है, कोई बोल रहा है, कोई सुन रहा है. मुझे लगता है कि जनतंत्र में इससे बड़ा कोई सपना ही नहीं हो सकता जो कविता में पलता है.

Q: अभिव्यक्ति की आज़ादी जिसे हम freedom of speech कहते हैं उसको लेकर आवाज़ें जो उठती हैं. जो विरोध हो रहा है वो कहीं न कहीं आपको विचलित करती हैं?

A: इसमें कहने का क्या शक है. हमारी जेनेरेशन पूरी इसी फिलोस्फी पर थी कि किसी को भी बोलने का हक है. सबकी सुनें, सब सभी से अपने मन की बात कह लें, आवाज़ गायब कर देना किसी को बोलने न देना…ये मुझे गलत लगता है. पुराना शेर आपने भी सुना होगा…

ताकि उनकी महफिल उनका,

आंखे अपनी बाकी उनका

तो ये जो है टुकुर-टुकुर चुपचाप देखने का जो भाव होता है वो न रहे जिसमें आप कह सकें ऐसा माहौल रचना और जरूरी नहीं बदतमीजियों से ही कहा जाए या बल्कि तमीज़ से कहा जाए. आप थोड़ा जज़्ब कर लें, अपने अंदर कुछ आत्मसात कर लें. उसके बाद सोच समझकर अपनी बात दोबारा सामने रखें..इसका असर होता है।

Q: अनामिका जी, औरत के बहुत सारे मुद्दे हैं जिसपर आपने लिखा है, लेकिन इस एक मुद्दे की बात करूं जो कहीं न कहीं आपको सोचने पर मजबूर करता है.

A: स्त्री का जो देह है वो जितनी भी स्त्री संबंधी अपराध होते हैं वो डायन दहन से लेकर, पोर्नोग्राफी से लेकर, सुरक्षित प्रसव की व्यवसथा से लेकर, बलात्कार से लेकर मारपीट, गाली-गलौच वो स्त्री के देह से जुड़े प्रश्न हैं. तो उसको उसके शोषण कि आधारभूमि ना समझा जाए बल्कि एक एसेट समझा जाए. आप जिससे पैदा हुए हैं, जिससे एक नए समाज का सपना जन्म लेता हुआ देखते हैं उसको उसकी तरह से उससे जुड़ी हुई आज़ादी दें.