एक वृक्ष भी बचा रहे

Sandeep Yash
File photo: World Environment Day (Twitter image)

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जून 5 को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।  इस बरस महामारी के चलते पर्यावरण हमें सन्देश और चेतावनी, दोनों दे रहा है। इसकी बानगी सोशल मीडिया में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा की गयी tweets में देखी जा सकती हैराष्ट्रपति – “‘हमारा दायित्व है कि अपनी भावी पीढ़ियों के लिए हम अधिक हरी-भरी और पर्यावरण अनुकूल दुनिया छोड़कर जाएं”
उप राष्ट्रपति – ” आइए हम ऊर्जा और पानी की बचत करके, डिस्पोजेबल प्लास्टिक के उपयोग को कम करके, पुन: इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री को बढ़ावा देने, पौधे लगाने और जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को कम करके प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प लें

पर्यावरण का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है, ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन में साफ़ झलकता है – ””माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः” यानी यह भूमि मेरी मां है, मैं उसका पुत्र हूं ” .उन्होंने कई और तरफ भी इशारा किया

–  हम अपनी धरती की समृद्ध जैव विविधता को संरक्षि‍त करने का अपना संकल्‍प दोहराते हैं।

–  आइए, हम सभी सामूहिक रूप से यथासंभव ठोस प्रयास कर पृथ्‍वी पर अपने साथ फल-फूल रही वनस्पतियों और जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करें

– अथक प्रयासों से हम इस धरती को आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर स्थान बना सकते हैं।’

तो इस बरस विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है ”Celebrating Biodiversity”, तो जैव विविधता यानी Biodiversity  को बचाना हमारे लिए इतना ज़रूरी क्यों हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक ईंगर एंडरसन ने इस मौके पर ”क्यों” का जवाब देते हैं। कुछ ज़मीनी सच्चाइयां दुनिया के सामने रखते हैं।

पहली –  मानव ने पृथ्वी की बर्फ-मुक्त सतह का 75 प्रतिशत चेहरा बदल डाला है

दूसरी – 1990 के बाद से दक्षिण अफ्रीका के आकार के तीन गुना के बराबर 420 मिलियन हेक्टेयर जंगल खत्म हो चुके हैं

तीसरी – लगभग 10 लाख वन्यजीव प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। अवैध वन्यजीव व्यापार आज दुनिया में चौथा सबसे बड़ा अवैध व्यापार अपराध है।

चौथी – वैश्विक जीडीपी का लगभग आधा हिस्सा प्रकृति पर निर्भर है

पांचवी -हमारे महासागर और जंगल अरबों लोगों को पालते हैं, रोजगार देते हैं। अकेले जंगलों से 9 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है

छठवीं  -लगभग चार अरब लोग मुख्य रूप से प्राकृतिक दवाओं पर निर्भर हैं

सातवीं – वनीकरण से हम अपने शहरों, इमारतों को ठंडा रख आवश्यक उत्सर्जन (emisions reduction) में लगभग एक -तिहाई कटौती कर सकते हैं। इससे  पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने  मदद मिलेगी।

मोटे तौर पर – इकोसिस्टम और जैव विविधता – शहरों, कृषि, बुनियादी ढांचे, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा, ऑक्सीजन, स्वच्छ पानी और जलवायु की सेहत पर सीधा असर डालते हैं, मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ये व्यवस्था  – पौधों और फसलों की प्रजातियां बढ़ा कर प्रकृति को स्थिर और उपजाऊ बनाये रखती हैं। जान लीजिये की एक तंदुरुस्त इकोसिस्टम तमाम आपदाओं का बेहतर तरीके से सामना कर सकता है और उबर सकता है। भारत इस मायने में काफी धनी रहा है। देखिये इसकी बानगी

–   भारत, दुनिया के 17 प्रचुर जैव विविधता संपन्न देशों में से एक है। दुनिया में मौजूद 35 जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट में से 4 भारत में हैं -हिमालय, पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा क्षेत्र और सुंदरवन (जिनमें निकोबार द्वीप समूह भी शामिल हैं)

– पौधों की 50 हज़ार से अधिक प्रजातियों के साथ भारत साड़ी दुनिया में में 10 वे नंबर पर है

–  भारत दुनिया की करीब 12% पक्षी प्रजातियों का घर है।

–  देसी प्रजातियों की बात करें तो – भारत 69 प्रजातियों के साथ पक्षियों में दसवें नंबर पर, 156 प्रजातियों के साथ सरीसृप (repitiles) में पांचवें और 110 प्रजातियों के साथ उभयचरों (amphibians) में सातवें नंबर पर है।

-भारत में दुनिया के लगभग आधे जलीय पौधों (Aquatic plants) पाए जाते हैं। हमारे पास लगभग 8,000 किमी की समुद्रीय सीमा है जो इस विरासत को समृद्ध और संरक्षित करती है।

-भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ बाघ और शेर, दोनों पाए जाते हैं

-हमारे देश में पौधों की 33% ऐसी प्रजातियां हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं पायी जाती हैं

– भारत में मैंग्रोव वन दुनिया के पूरे मैंग्रोव वनस्पति का लगभग 3% है

– कच्छ में ऊँट की एक अनोखी नस्ल है – खारी। ये नस्ल समुद्री पानी और मैंग्रोव में तैरने में पारंगत होती है। इसे सरकार द्वारा विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है

– भारत के पास दुनिया की मात्र 2.5 % भूमि है, 16 % मानव, पशु जनसँख्या है, कुल 4 % पेय जल है पर यहाँ दुनिया की 8% जैव विविधता का निवास है

तो कहानी बढ़ाते हैं – जब विरासत इतनी समृद्ध हो तो किसी भी देश की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ जाती है। देखते है कि इस बरस पर्यावरण को लेकर भारत ने क्या लक्ष्य रखे हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक़ सरकार का लक्ष्य अगले पांच बरसों में 200 शहरों में नगर वन या urban forest विकसित करना है। इस प्रकल्प में वन विभाग, नगर निकायों, गैर सरकारी संगठनों, कॉर्पोरेट्स और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। भारत संभवतः एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पेड़ों, जानवरों, पक्षियों को भी पूजा जाता है। यह पर्यावरण के प्रति भारतीय समाज का सम्मान है। हमारे यहाँ युगों से ग्राम वन की भी परंपरा रही है। अब इस नई योजना से शहरों में वृक्षों की कमी को भरा जा सकेगा। इस कदम से वृक्षारोपण और मिटटी में नमी बनाये रखने में सहायता मिलेगी जो जैव विविधता संरक्षण योजना का हिस्सा है।

पर नगर /शहरी वन क्या हैं और आज इनकी ज़रुरत क्यों है भारत को

”एक शहरी वन पेड़ों का वो समूह है जो एक शहर,कस्बे या एक उपनगर के भीतर बढ़ता है। इस परिभाषा में रिहायशी बस्तियों के अंदर और आसपास उगने वाले किसी भी प्रकार के वृक्ष, पौधे या वनस्पति शामिल हैं। इन वनो का स्वामित्व निजी और सरकारी – दोनों हो सकता है

आपकी जानकारी के लिए
-एक बड़ा पेड़ प्रति वर्ष 150 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड सोख कर उतनी ही मात्रा में ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ता है

_  वृक्षों का एक झुरमुट आस पास की इमारतों की air conditioning का खर्च करीब 30 % तक कम कर सकता है

-नेब्रास्का नेशनल फारेस्ट (574 sq km) अमेरिका और तिजूका फारेस्ट, रिओ डे जनेरो (32 sq km), ब्राज़ील – नगर वन के दो अच्छे उदहारण हैं

आज के दौर में जब देशों का तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है, हरियाली कम हो रही हो, तमाम तरह के प्रदूषण बढ़ रहे हों, बीमारियां बढ़ा रहे हों, तो इन वनो की प्रासंगिकता बेहद बढ़ जाती है। शहरी वन अपने इलाके को पर्यावरण के हानिकारक प्रभाव से बचते हैं। ये प्रदूषण पर अंकुश लगा कर आबोहवा को सहज रखते हैं, तेज़ हवा और तूफान को धीमा करते हैं, जल के तेज़ बहाव को रोक कर भूजल संरक्षण में मदद करते हैं, और पथिक को चिलचिलाती धूप से भी बचाते

हैं। पर सबसे बड़ी बात – ये नगर वन शहरों को urban heat island effect से बचा कर ठंडा रखते है, रिहाइश लायक रखते हैं।


आपकी जानकारी के लिए, नगर वन की अवधारणा उत्तरी अमरीका में सन 1620 में नवंबर के महीने में कुछ तीर्थ यात्रियों द्वारा प्लैमॉथ शहर में शुरू की गयी थी। इसी नगर वन से इन्हें उस दौर में हीटिंग, खाना पकाने, क्लैपबोर्डिंग, फर्निशिंग, बाड़-बिछाने, सड़क, खेल के लिए भवन, और आवास बनाने के लिए कच्चा माल मिलता था। पर इस अवधारणा को औपचारिक मान्यता 1970 के दशक में ही जाकर मिली।
फिलहाल, Standing Committee on Science & Technology, Environment & Forests Report ( Status of Forests in India, February 12, 2019) के मुताबिक़ भारत का राष्ट्रीय वन आवरण (National Forest Cover) 21. 54 % है। और ताज़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक़ देश में इस वक़्त 4 हज़ार राजस्व जिले या शहर हैं -इनमें 46 शहरों की आबादी 10 से ज़्यादा है, तीन की आबादी 30 लाख से ज़्यादा है। ये योजना फिलहाल 200 शहरों में ही लांच हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक़, भविष्य में इसका राष्ठ्रव्यापी सफल कार्यान्वयन National Forest Cover में उत्साहजनक वृद्धि कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अगली पीढ़ी के लिए एक बेहतर देश छोड़ कर जाने का सपना यहीं जन्म लेता है।

चलते चलते – प्राचीन भारतीय संस्कृति और दर्शन का वन, वृक्षों तथा  पर्यावरण से गहरा नाता नरेश सक्सेना की इस कविता में महसूस करिये।

एक वृक्ष भी बचा रहे

अंतिम समय जब कोई नहीं जायेगा साथ
एक वृक्ष जायेगा
अपनी गौरैयों -गिलहरियों से बिछुड़कर
साथ जायेगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले