कोराना महामारी और संसदीय व्यवस्थाओं के समक्ष चुनौतियां

Panchanan Mishra
File photo: Parliament

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कोरोना वायरस अथवा कोविड 19 वायरस के खतरे के चलते बीते 23 मार्च को संसद की कार्यवाही को तय कार्यकाल से करीब 10 दिन पहले ही स्थगित करना पड़ा था। उस दौरान हालांकि संसद के बजट सत्र में कई अहम बिलों पर चर्चा होनी थी और कई समितियों को बैठकों के जरिए अपनी रिपोर्ट भी तैयार करनी थी। पर देश भर में लॉकडाउन के ऐलान के साथ-साथ वायरस के खतरे के चलते अब तक संसद की स्थायी समितियों के साथ अन्य समितियों की बैठकें भी नहीं हो पा रही हैं। राज्यों की कई विधानसभाओं के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन इसी दौरान दुनिया के कई देशों ने संसद के साथ साथ समितियों की बैठकों को लेकर सोशल डिस्टेंसिंग के साथ साथ वर्चुअल पार्लियामेंट के प्रयोग किए हैं। भारतीय संसद ने भी संसदीय समितियों की बैठकों के लिए ऐसी किसी संभावना की तलाश करने की कोशिश शुरु की है। दरअसल कुछ सांसदों ने ब्रिटेन समेत कई अन्य देशों का उदारहण देते हुए संसदीय समितियों की बैठक वीडियो काँफ्रेंसिग के जरिए कराने की मांग की थी। बीते सात मई को राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दोनों सदनों के महासचिवों से संसदीय समितियों की बैठकें वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये कराने की संभावनाओं पर विचार करने को कहा है। दोनों महासचिवों को इस सिलसिले में रिपोर्ट जल्द सौंपने के लिए कहा गया है।

दरअसल कोरोना महामारी के खतरे ने दुनिया भर में संसदीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी सोशल डिस्टेंसिंग के परिप्रेक्ष्य में सोचने पर मजबूर किया। इस महामारी ने फरवरी महीने से दुनिया में अपना भीषण असर दिखाना शुरु किया था। फरवरी मार्च के दौरान भारतीय संसद के साथ साथ यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस जैसे तमाम अन्य देशों की संसद के सत्र चल रहे थे। हालांकि कई देशों में प्रथा है कि वहां साल भर के लिए संसद की कार्यवाही के लिए कैलेंडर पहले ही तय होता है जब कि भारत मे आम तौर पर साल में संसद के तीन सत्र आहूत होते है और बाध्यता है कि दो सत्रों के बीच 6 महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होगा। पर बहरहाल जैसे जैसे दुनिया के देशों में कोरोना का खतरा बढ़ता गया संसद की कार्यवाहियों को भी समय से पहले स्थगित करना पड़ा। लेकिन इसी दौरान इन्हीं जैसे करीब 23 देशों ने संसद की कार्यवाही को सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए चलाने से लेकर वर्चुअल पार्लियामेंट की संकल्पना को आगे बढ़ाया। इसके तहत संसदीय समितियों की बैठकों को भी वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिए करवाया जा रहा है। हालांकि भारत में संसदीय समितियों की बैठकें इन कैमरा यानी गोपनीय होती हैं और इन बैठकों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए करने का मामला इस लिहाज से काफी संवेदनशील भी है। लेकिन अगर दुनिया के कई देशों पर नजर डालें तो दोनों ही मामलों में चुनौतीपूर्ण निर्णय समय की मांग पर लिए गए हैं। पहला निर्णय संसद की बैठक को वर्चुअल कराना और साथ ही संसदीय समितियों की बैठकों को भी इसके लिए अनुमति देना।

दुनिया के देशों के उदारहण

इन दिनों ब्रिटेन की संसद का सत्र चल रहा है और वो वर्चुअल पार्लियामेंट का बड़ा उदाहरण है। सभी संसदीय व्यवस्थाओं की जननी मानी जाने वाली यूनाइटेड किंगडम यानी की संसद ने इस महामारी और कड़े लॉकडाउन के वक्त कई अऩूठे और अनुकरणीय प्रयोग कर डाले हैं। मार्च महीने में संसद की कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित किया गया था और बीते 21 अप्रैल को ईस्टर त्योहार के बाद ब्रिटेन की संसद की बैठक फिर हुई। उसी दिन कार्यवाही नियमों में बदलाव करते हुए विशेष प्रावधानों को संसद की मंजूरी दी गई जिसके तहत संसद के भीतर के साथ साथ वर्चुअल यानी इंटरनेट के माध्यम से वीडियोकॉल के माध्यम से दोनों सदनों के सदस्य कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं। ये दरअसल हाइब्रिड व्यवस्था है जिसके तहत सांसद सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सदन के भीतर और बाहर से शामिल हो सकते हैं। दोनों सदनों में वीडियो कांफ्रेंसिग के लिए बड़े स्क्रीन लगा दिए गए हैं। सांसदों की संख्या कम है लेकिन संसदीय समितियों की बैठकें भी वर्चुअल करने और बैठकों में गवाहों की पेशी की भी ऑनलाइन व्यवस्था को मंजूरी मिली। इसी संसदीय सत्र के दौरान वहां कोरोना का सामना करने के लिए उचित प्रावधानों से जुड़ा बिल भी पारित हुआ। इन दिनों यूनाइटेड किंगडम की संसद के दोनों सदनों, हाउस ऑफ कामंस और हाउस ऑफ लार्डस की कार्यवाही चल रही है जिसमें देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कोविड 19 से ठीक होकर आने के बाद संसद में सवालों के जवाब दे रहे हैं। सांसद उनसे सदन के भीतर और साथ ही वर्चुअल माध्यम से सवाल कर रहे हैं, बिलों पर चर्चा हो रही है साथ ही रिमोट वोटिंग कराने की भी अनुमति वहां प्रदान की गई है। एक और खास बात ये कि ये बैठकें जूम एप्लीकेशन के माध्यम से हो रहीं हैं।

Parliament of the United Kingdom (File Photo)

Parliament of the United Kingdom (File Photo)

दुनिया की कुछ महत्वपूर्ण संसदीय व्यवस्थाओं में हुए बदलावों को भी यहां जानना जरुरी है। स्पेन की संसद ने कोरोना महामारी के देश में भीषण खतरे के बीच ही संसदीय व्यवस्था में तत्काल जरुरी बदलाव कर दिए। इसके तहत रिमोट सिटिंग तो होगी ही साथ ही रिमोट वोटिंग यानी ई मेल के जरिए वोटिंग की सुविधा भी संसद सदस्यों को मुहैया करवा दी। ब्राजील की संसद के दोनों सदन 513 सदस्यों वाली चैंबर ऑफ डिप्युटीज, और 81 सदस्यों वाली सीनेट को वर्चुअल तरीके से बैठक करने के बारे में प्रस्ताव पारित किया गया है। कनाडा में निचले सदन हाउस ऑफ कामंस और उच्च सदन सीनेट की बैठकें मार्च के महीने में ही कोरोना महामारी के चलते स्थगित करनी पड़ीं लेकिन फिर 11 अप्रैल को दोनों सदनों की आपात बैठक बुलाकर ये प्रस्ताव पारित किए गए कि स्थायी समितियां वर्चुअल तरीके से काम करेंगीं। हाउस ऑफ कामंस की स्वास्थ्य और वित्त संबंधी स्थायी समितियों के साथ दूसरी समितियां लगातार ऑनलाइन यानि वर्चुअल बैठक करके सरकार की ओर से कोरोना वायरस से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा कर रही है। इसी प्रस्ताव के जरिए हाउस ऑफ कामंस की प्रक्रिया और सदन संचालन संबंधी समिति को भी निर्देशित किया गया कि संसद की और समितियों की वर्चुअल बैठकों के लिए नियमों में बदलावों या सुझाव को सूचित करें। मिस्र में सोशल डिस्टैंसिंग के जरिए सदन में बैठकें हो रही हैं और सभी एहितायती उपाय किए जा रहे हैं। हालांकि वहां भी कोरोना वायरस से मौतें हुई हैं।

यूरोपीय संसद की बैठक भी हो रही है हालांकि सोशल डिस्टेंसिंग के साथ साथ सदस्य वहां की संसद में ऑनलाइन या वर्चुअल माध्यम से हिस्सा ले सकता है। फ्रांस में कोविड-19 के प्रसार के दौरान उच्च सदन यानी सीनेट की बैठक को हफ्ते में एक बार कर दिया गया है। प्रश्नकाल में पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या को घटाकर 10 किया गया है और सरकार के जवाबदेह प्रतिनिधियों के साथ राजनीतिक दलों के प्रमुखों के साथ ही सीमित संख्या में बैठक हो रही है। उसके निम्न सदन यानी नेशनल एसेंबली में बैठकों को सीमति किया गया है साथ ही जरुरी होने पर सदस्य वर्चुअल तरीके से सदन की बैठक में भाग ले सकता है। नेशनल एसंबली की समितियों की बैठक में कोरोना वायरस से जुड़े मुद्दों पर ही चर्चा हो रही है। इन सबके लिए सभी राजनीतिक दलों के प्रमुखों में पहले आम राय बनाई गई। हालांकि रिमोट मीटिंग यानी दूर से बैठक करने के इस नए प्रावधान में वहां किसी बिल या मुद्दे पर रिमोट वोटिंग का प्रावधान स्वीकार नहीं किया गया है। जर्मन संसद बुंदेशटैग की बैठक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए दोनों सदनों में हो रही है। कोरोना वायरस से निपटने के लिए वहां की संसद ने इस दौरान कई नए कानून पारित किए और मौजूदा कानूनों में बदलाव भी किए। जापान की संसद डायट की कार्यवाही इन दिनों चल रही है। जापानी संसद के दोनों सदनों में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव और हाउस ऑफ काउंसलर्स में सुरक्षा उपायों को अपनाते हुए सदन के साथ साथ समितियों की भी बैठक जारी है। इसका एक कारण ये भी है कि जापान ने कोरोना के प्रकोप को थामने में सफलता भी हासिल की है। दक्षिण अफ्रीका की संसद ने हाल में नियमों में बदलाव करके दोनों सदनों की बैठकों को वर्चुअल तरीके से करने को मंजूरी दी है। जैसा कि आपको मालूम है कि दक्षिण अफ्रीका में संसदीय समतियों की बैठकें गोपनीय नहीं होतीं इसीलिए इनकी बैठकों का प्रसारण सोशल मीडिया के प्लेटफार्म्स पर भी हो रहा है। नार्वे की संसद ने भी इस दौरान कई अनूठे प्रयोग किए। इसके तहत वहां संसद की पूरी संख्या की बजाए पार्टी के शीर्ष नेताओं को ही संसद की कार्यवाही में प्रत्यक्ष तौर पर भाग लेने के लिए कहा गया। वोटिंग से लेकर कोरम के लिए भी संख्या घटा दी गई। पार्टियों के फ्लोर लीडर चर्चा करके किसी विषय की महत्ता के मुताबिक संख्या को नियंत्रित कर सकते हैं। कार्यवाही के नियमों को शिथिल करना पड़ा और कमेटी की बैठकों को ऑनलाइन करने की अनुमति दी गई। संसदीय समतियों के टूर को भी फिलहाल रोक दिया गया है। यहां एक बात बताना जरूरी हो जाता है कि भारत में संसद का सत्र नहीं चलने की सूरत में कार्यपालिका को अध्यादेश जारी करने की शक्तियां हैं जब कि कई देशों में सिर्फ संसद को ही ऐसे अधिकार है, यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौरान भी आपात सत्र वहां बुलाकर कानून पारित करने की मजबूरी होती है।

Rajya Sabha Chairman M Venkaiah Naidu and Lok Sabha Speaker Om Birla

Rajya Sabha Chairman M Venkaiah Naidu and Lok Sabha Speaker Om Birla

भारतीय परिप्रेक्ष्य

संसदीय कार्यवाही के मामले में भारतीय लोकतंत्र दुनिया के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। देश की संसदीय कार्यप्राणाली में समितियों की और खासकर 1993 में अस्तित्व में आई विभाग संबंधी स्थायी समितियों की बड़ी भूमिका होती है। संसदीय कामकाज आमूमन साल भर में 65 से 70 दिनों का होता है लेकिन दोनों सदनों लोक सभा और राज्य सभा को प्रत्यक्ष कार्य के अलावा और भी बहुत-से कार्य करने होते हैं, ये कार्य समितियों द्वारा किये जाते हैं। समितियाँ मुख्य तौर पर तीन काम करती हैं। समितियों को भेजे गए विधेयकों की समीक्षा करना, मंत्रालयों से संबंधित विशिष्ट विषयों का चयन करना और सरकार द्वारा कार्यान्वित किये जाने पर इनकी समीक्षा करना और विभागों के बजटीय खर्च की जाँच करना। यही वजह है कि इन्हें मिनी पार्लियामेंट कहा जाता है और जब संसद नहीं चल रही होती तो भी ये समितियां बैठक करके, विशेषज्ञों से राय लेकर विधिक कामकाज को पूरा करती हैं। भारतीय समिति व्यवस्था में बैठकों से लेकर उनकी उसमें हुई चर्चा गोपनीय होती है जिसका मकसद ये है कि पार्टी लाइन से ऊपर उठकर विभिन्न दलों के सांसद उसमें अपनी बेबाक राय रखते हैं। समिति की बैठकें तो अभी संसद भवन परिसर में ही होती हैं और संसदीय टूर के हालत में बैठक को छोड़कर कहीं और बैठक के लिए सभापति या स्पीकर की अनुमति की आवश्यकता होती है। हालांकि कई देश जैसे दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, कई मामलों में ब्रिटेन और अमेरिका में समितियों की बैठकें सार्वजनिक होती हैं। बहरहाल हाल में कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा और शशि थरुर ने समितियों की बैठकों को वीडियो कांफ्रेंसिग से करवाने की मांग की जिसके बाद इस पर देश व्यापी चर्चा शुरु हुई है।

हालांकि इस बीच देश में कैबिनेट की बैठक से लेकर प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक या फिर विभिन्न सरकारी कामकाज के लिए बैठक का मामला हो, हर जगह वीडियो कांफ्रेंसिंग यानी वर्चुअल मीटिंग को सहजता से अपना लिया गया है। अगर भारतीय संसद के उदारहण को देखें तो यहां चुनौतियों के मुताबिक व्यवस्थाओं को अपनाया गया है। हाल में ई पार्लियामेंट से लेकर ई विधान की शुरुआत ने जोर पकड़ा है। संसद और विधान सभाओं के पीठासीन अधिकारियों की बैठकों में ये तय किया गया कि डिजिटल पार्लियामेंट को साकार किया जाएगा। इसका असर संसद में दिख रहा है जहां प्रश्नकाल के लिए प्रश्नों की लाटरी लगाने से लेकर शून्यकाल के मुद्दे उठाने, चर्चा की मांग करने के साथ प्रस्ताव पेश करने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था को सांसदों ने अपनाया है। संसद में आगामी मॉनसून सत्र है जो जुलाई-अगस्त में होता है, लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उम्मीद जताई है कि ये बैठक अपने तय समय पर ही होगी।

चुनौतियां

अब जब इस कोरोना के संकट का असर काफी वक्त तक रहने वाला है तो व्यवस्थाओं को भी इसके मुताबिक ढालना होगा। इसमें मूलभूत रुपस के कुछ बातें कही जा सकती हैं। उनमें सबसे प्रथम तो ये कि कोविड 19 वायरस का प्रकोप कम होने या खत्म होने के बावजूद अब दुनिया भर में संसद की कार्यवाही की आधारभूत संरचना में बदलाव आऩा तय लगता है। अगर संसदीय कामकाज या समितियों की बैठकों में वर्चुअल को अपनाया जाता है तो इसके लिए कई संसदीय नियमों में संशोधन भी करने होंगे और कई परम्पराओं को भी बदलना पड़ेगा। सोशल डिस्टेंसिंग से लेकर ज्यादा से ज्यादा तकनीक का इस्तेमाल होना अब शुरु होता दिखेगा। असाधारण परिस्थियों में असाधारण कदम उठाए जाते हैं उन्हीं में से एक रिमोट वोटिंग या वर्चुअल वोटिंग सिस्टम हो सकता है। सांसदों की बेहतर समझ के लिए संसदीय कार्य से जुड़ी तमाम वेबसाइट को यूजर फ्रैंडली बनना होगा और सभी जानकारियों को हर समय अपडेट करके रखना होगा ताकि सांसदों को वो सुगमता से हासिल हो सके। इसमें सरकार का डिजिटल इंडिया कार्यक्रम जो कि पहले से ही चलाया जा रहा है वो काफी मददगार साबित हो सकता है। एक अहम बात नई बनने वाली संसद की इमारत को लेकर भी हो सकती है, क्यों कि अब इसमें सोशल डिस्टेंसिंग से लेकर कोविड 19 वायरस से उपजी चुनौती से निपटने के लिए आधार भूत संरचना की भी आवश्यकता होगी। लेकिन वर्चुअल पार्लियामेंट और वर्चुअल कमेटी की बहस के बीच सबसे अहम बात ये है कि संसदीय संस्था का काम सभी के लिए प्रभावी कानून बनाने से लेकर स्क्रूटनी यानी जांच को होता है और वर्चुअल व्यवस्था में उसे हर हाल में बरकरार रखना ही होगा।