कोरोना वायरस बनाम Solidarity Clinical Trial

Sandeep Yash
File photo: World Health Organization logo

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SARS-CoV-2 के खिलाफ टीका या वैक्सीन विकसित करने के लिए एक अभूतपूर्व दौड़ कुछ महीनो से जारी है। आती खबरों के मुताबिक़ कम से 44 टीके विकास के प्रारंभिक चरण में हैं और जिनसे हम किसी परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं। पर कुछ बुनियादी सवाल हैं- जैसे – क्या फिनिशिंग लाइन पार करने वाला पहला टीका सुरक्षित और प्रभावी होगा? क्या ये नियामक बाधाओं को जल्दी पार कर पायेगा। क्या ये COVID-19 महामारी को ख़त्म करने के लिए पर्याप्त डोज या खुराक मुहैया करा पायेगा – और सबसे बड़ा मुद्दा समय का – यानी क्या ऐसी किसी वैक्सीन का विकास तत्काल हो सकता है – इन सारे सवालों का एक ही जवाब था -शायद, अगर इसके लिए समन्वित वैश्विक वैक्सीन विकास या coordinated global vaccine development efforts हों तो।

इस मुद्दे पर मंथन चल रहा था और शुक्रवार, 20 मार्च, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने नॉर्वे के ओस्लो विश्विद्यालय के साथ मिल कर एक बड़े वैश्विक परीक्षण की घोषणा की जिसका नाम Solidarity Clinical Trial रखा गया, अर्जेंटीना, बहरीन, कनाडा, फ्रांस, ईरान, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, स्विट्ज़रलैंड और थाईलैंड इसमें भाग लेने वाले प्रारंभिक देश हैं। भारत भी जल्द इस मुहीम का हिस्सा बना। ये दुनिया में होने वाला सबसे बड़ा महाप्रयोग है जिसमे तमाम प्रयोगशालाएं, हज़ारों स्वस्थ्य कर्मी, सैकड़ों अस्पताल, मरीज़ और स्वयंसेवक शामिल हैं। इस पहल को वैश्विक स्तर पर 1 अरब डॉलर से ज़्यादा का योगदान जनता,संगठनो और देशों से मिल चुका है।

आपकी जानकारी के लिए किसी नयी वैक्सीन के बनने और बाज़ार में आने में बरसों लग सकते हैं। और इस गंभीर बीमारी का उपचार जल्द से जल्द चाहिए।
इसलिए तय हुआ कि मौजूदा उपचार विकल्पों पर ही सीधे काम किया जाए।

इस तरह प्रयोग में शामिल मरीज़ों को निर्धारित उपचार के साथ साथ नीचे दी गयी कोई एक दवा दी जा रही है

1 प्रायोगिक एंटीवायरल यौगिक जिसे रेमेड्सविर कहा जाता है
2 मलेरिया की दवाएं क्लोरोक्वीन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन
3 दो एचआईवी दवाओं, लोपिनवीर और रटनवीर का संयोजन
4 रोपोनवीर प्लस इंटरफेरॉन बीटा -1 ए के साथ लोपिनवीर

ये ट्रायल कैसे किये जा रहे हैं

1. सदस्य देशों के अस्पतालों में भर्ती COVID-19 के रोगी ही इस अध्ययन में शामिल हो सकते हैं।
2. रोगियों को लिखित देना पड़ता है कि वो अध्ययन में शामिल होने के संभावित जोखिमों और लाभों और सहमति को समझते हैं।
3. प्रत्येक रोगी के लिए जिम्मेदार चिकित्सा दल जांच कर तय करता है कि इन उपचारों से रोगी को नुक्सान तो नहीं होगा।
4. जांचो के बाद रोगी का संक्षिप्त विवरण और किसी भी अन्य स्थिति को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किया जाता है।
5. फिर अध्ययन के विकल्पों में से एक को आवंटित किया जाता है।

आपको यहाँ बता दें कि दिए गए 4 अध्ययन उपचारों को शामिल किया जा भी सकता है और नहीं भी। न तो रोगी और न ही चिकित्सा कर्मचारी यह चुनते हैं कि रोगी को अध्ययन के कौन से विकल्प मिलेंगे, क्योंकि ये सारा काम कंप्यूटर करता है। परीक्षण के लिए जानकारी भी अनियमित व्यवस्था के तहत तभी इकट्ठी की जाती है जब मरीज़ या तो अस्पताल से छुट्टी पाता है या फिर तब जब उसकी मृत्यु हो जाती है। इस जानकारी के अंतरिम परीक्षण विश्लेषण (Interim trial analysis ) की निगरानी एक वैश्विक डेटा और सुरक्षा निगरानी समिति द्वारा की जाती है, जो विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र समूह है।

जैसा कि आपको बताया कि भारत भी इस महाप्रयोग का हिस्सा है और इस ट्रायल में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन नाम की दवा भी शामिल जिसकी 70 % फ़ीसदी वैश्विक आपूर्ति भारत करता है। इसी बरस मार्च में फ्रांस के एइक्स-मार्सेली यूनिवर्सिटी के रिसर्चर डीडियर राओल्ट ने कुल 36 COVID-19 के मरीजों पर इस दवा का ट्रायल शुरू किया.था। शुरुआती ट्रायल के बाद ही उत्साहजनक नतीजे सामने आये थे। पर अभी तक इसे COVID-19 के लिए एक सिद्ध उपचार की मान्यता नहीं मिली है।

हालांकि, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR ) ने सिर्फ निवारक आधार पर स्वास्थ्यकर्मियों और संक्रमितों के परिवारों के लिए इसके उपयोग की सिफारिश की है। लेकिन यह केवल डाक्टरों के पर्चे के आधार पर ही उपलब्ध होगी है। इस दवा का उपयोग भारत में मलेरिया के इलाज के लिए किया जाता है और इसके निर्यात पर 25 मार्च को सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को आपूर्ति के लिए अनुरोध करने के बाद ये प्रतिबंध 7 अप्रैल को मंगलवार को हटा दिया गया। और अमेरिका, जिसने बुधवार तक COVID 19 मामलों से जुड़े 430,000 से अधिक संक्रमण और 14,000 से अधिक मौतें दर्ज की हैं, भारत से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की 29 मिलियन खुराक खरीदी हैं। .

तो जनाब जब तक इस महामारी का निर्णायक उपचार नहीं मिलता तब तक Solidarity Clinical Trial जारी है, इससे जुड़े वैज्ञानिको का प्रयास तर्क संगत निवारण पर केंद्रित है। WHO, आर एंड डी ब्लूप्रिंट वैज्ञानिक सलाहकार समूह के अध्यक्ष डॉ जेरेमी फारर के मुताबिक़ ”केवल एक ही रास्ता है दुनिया को इस महामारी से बाहर निकालने का -और वो है विज्ञान। हमें इस वाचाल वायरस के प्रसार का पता लगाने और इसे सीमित करने के लिए इसे समझना होगा, इससे बचाव के लिए टीके बनाने होंगे, इसके सामाजिक निहितार्थों और प्रभावों को देखना होगा, इसलिए ये निहायत ज़रूरी है है कि अलग अलग देशों में चल रहे वैश्विक अनुसंधान प्रयास तेजी से और मजबूती से हों’.

WHO के इस Solidarity Clinical Trial के नतीजों का सारी दुनिया मं बड़ी बेताबी से इंतज़ार हो रहा है। जानकारों के मुताबिक़ ये जंग समय के साथ है जिसके आगे मानव को निकलना ही होगा। अस्तित्व जो दांव पर है।