कोरोना से जंग: अब पिछड़े प्रदेशों की बारी 

Sandeep Yash
File photo: Migrants during Coronavirus outbreak

File photo: Migrants during Coronavirus outbreak

कोरोना वायरस से जंग जारी है।  प्राण बचाने हैं और जेब भी। इस दौरान प्रवासी श्रमिकों का देश के कई इलाकों से बड़ी संख्या में हुआ औचक पलायन भी अपने पीछे कई चुनौतियाँ छोड़ गया है। जानकार इसे एक मौके के रूप में देखने पर बल दे रहे हैं।  सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, तिरुवनंतपुरम में प्रोफेसर और प्रवासी श्रमिकों के मुद्दे पर पकड़ रखने वाले प्रोफेसर एस इरुद्या राजन इसे एक नया नजरिया देते हैं।  इनके मुताबिक़ 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट का सबक यह था कि “नौकरियां मायने रखती हैं” और कोरोनॉयरस ने श्रमिकों को ये सिखाया कि दूरियां भी मायने रखती है। राजन कहते हैं कि इस महामारी के दौरान घर गए तमाम प्रवासी श्रमिक शायद वापस न लौटें। और इसका सीधा असर गुरुग्राम, सूरत और तिरुप्पुर जैसे औद्योगिक केंद्रों के साथ साथ मंदी से बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही छोटी और मध्यम आकार की इकाइयों पर पड़ सकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के मुताबिक़ करीब 90 लाख लोग देश के भीतर काम की तलाश में हर बरस पलायन करते हैं। इनका पलायन सबसे बड़ी संख्या में यूपी, बिहार, बंगाल और असम से होता है और इनके पहले ठिकाने दिल्ली और मुंबई होते हैं। कुछ बरसों से केरल जैसे दक्षिणी राज्य भी प्रवासी श्रमिकों का बड़ा केंद्र बन गए हैं। आम तौर पर ये तबका निर्माण क्षेत्र,कृषि क्षेत्र, टेक्सटाइल सेक्टर और डेरी से रोज़ी कमाता है। पर महामारी से डरा मजदूर आज अपने गाँव से निकलना नहीं चाहता, अगर निकले तो दूर नहीं जाना चाहता। इससे न सिर्फ तमाम औद्योगिक केंद्र संकट में आ गए हैं बल्कि खेतों में तैयार खड़ी फसल भी खलिहान तक नहीं पहुंच पा रही है।

और फिर, इतिहास दोहरा भी सकता है। तो क्या वक़्त आन पड़ा है ऐसे मॉडल का जो इस समस्या का दूरगामी निदान दे सके। वैसे एक ज़माने से पश्चिम भारत और ख़ास तौर पर पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्य रोज़ी देने का काम करते आ रहे हैं। यहीं ये रोज़ी मिलती थी उत्तर और पूर्व भारत से आते श्रमिकों को। पर अब बात हो रही है ऐसी व्यवस्था की जहाँ उद्योग ही ऐसे क्षेत्रों में लगाए जाएँ श्रमिक बहुसंख्यक हों और कच्चा माल आस-पास। विशेषज्ञ भी इस व्यवस्था के फायदे देखते हुए इसे विकल्प के तौर पर टटोल रहे हैं।  इसके चलते


1 , किसी भी आपदा, महामारी या आपातकालीन स्थिति में श्रमिकों के थोक पलायन से बचा जा सकता है
2 . ऐसे उद्योगों को उत्पादकता चक्र के टूटने से बचाया जा सकता है
3.  कच्चे माल की स्थानीय उपलब्धता के चलते उत्पादों की लागत भी कम हो सकती है
4 . ऐसे उद्योग श्रम स्थिरता, उपलब्धता के चलते दीर्घकालीन विकास योजना पर काम कर सकते हैं
5.  इन उद्योगों में बड़ी सख्या में अकुशल श्रमिकों को रोजगार मिल सकता है
ध्यान से देखें तो इस महामारी ने समस्या और सुनहरे मौके दोनों दिए हैं। प्रवासी श्रमिक पिछड़े राज्यों से आते हैं, इस कदम से लम्बे समय से चले आ रहे उद्यौगिकीकरण में क्षेत्रीय असंतुलन को भी सुलझाया जा सकता है। आपकी जानकारी के लिए स्वतंत्रता के बाद देश में अमूमन आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र वजूद में आये।

मुंबई-पुणे औद्योगिक क्षेत्र।
हुगली औद्योगिक क्षेत्र।
बेंगलुरु-तमिलनाडु औद्योगिक क्षेत्र।
गुजरात औद्योगिक क्षेत्र।
छोटा नागपुर औद्योगिक क्षेत्र।
विशाखापट्टनम-गुंटूर औद्योगिक क्षेत्र।
गुड़गांव-दिल्ली-मेरठ औद्योगिक क्षेत्र।

इनमें से मात्र एक – छोटा नागपुर औद्योगिक क्षेत्र ही श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र में कहा जा सकता है। साफ़ है कि इन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की खासी गुंजाईश है। तो सवाल ये है कि ऐसे इलाकों में कौन से श्रम प्रधान उद्योग लगाए जा सकते हैं। अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा के मुताबिक़ शुरुआत

खाद्य प्रसंस्करण
चमड़ा और जूता उद्योग
लकड़ी के उत्पाद और फर्नीचर
परिधान और वस्त्र

से की जा सकती है।

2011 -12 के आकड़ों के मुताबिक़ ये उत्पाद समूह भारत में विनिर्माण क्षेत्र  (manufacturing sector) में 50% रोज़गार के लिए जिम्मेदार था। और ये  रोज़गार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को मिला था। पर ऐसा भी नहीं है की अतीत में प्रयास नहीं हुए, समय- समय पर सरकार और वित्त आयोग योजनाएं और सहूलियतें लाते रहे है। पर नतीजे मिले-जुले रहे।  तो आज ज़रुरत है तो इन पर पुनः फोकस करने की। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ श्रमिक बाहुल्य क्षेत्रों का उद्योगों के माध्यम से विकास करने के लिए मोटे तौर पर तीन मुद्दों पर ध्यान देना होगा .

1. संसाधन का वितरण क्षेत्र के पिछड़ेपन के आधार पर हो  – 2015 तक भारत में संसाधनों का वितरण गाडगिल फॉर्मूले के आधार पर होता रहा है जो पिछड़े और स्पेशल कैटगोरी राज्यों की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं था। इसलिए, पिछड़े राज्य विशेष परियोजनों के लिए आवंटित केंद्रीय सहायता को बढ़ाने की मांग होती आ रही है।

2 . पहाड़ी क्षेत्रों, आदिवासी क्षेत्रों, सूखा प्रभावित क्षेत्रों को उद्योगों के माध्यम से विकसित करने के लिए विशिष्ट योजनाओं को पूर्ण केंद्रीय सहायता के साथ डिजाइन और लागु किया जाए।

3  पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगिक पिछड़ेपन की समस्या से लड़ने के लिए और यहाँ निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा कई प्रोत्साहन प्रदान किए गए हैं। इनमें – आयकर रियायत, टैक्स हॉलिडे, केंद्रीय निवेश सब्सिडी योजना, परिवहन सब्सिडी योजना, पिछड़े क्षेत्र में नई वित्तीय संस्था को बढ़ावा देना और प्रमुख वित्तीय संस्थानों से रियायती वित्त  उपलब्ध कराना शामिल है

तो जनाब, पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगिक विकास की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। पर केंद्र सरकार ऐसे क्षेत्रों में औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के इरादे से विभिन्न योजनाओं को शुरू कर इन प्रयासों में अपना योगदान देती है।  फिलहाल इस मौके को विकास के प्रभावी मॉडल में बदलने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को एक निश्चित समय सीमा के अंदर योजनाए बनानी होगी, मूलभूत ढांचे को विकसित करना होगा हो, ITI , NSDC जैसे प्रशिक्षण केंद्र खोल कर लक्षित तबके का कौशल विकास करना होगा, सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों को निवेश और पहल करनी होगी ताकि निजी क्षेत्र का योगदान भी सुनिचित किया जा से।  रिज़र्व बैंक को पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन साफ़ कहते हैं कि भारत को 8 प्रतिशत की वार्षिक जीडीपी विकास दर पर वापस लाने के लिए श्रमिक आधारित उद्योगों को तवज्जो देनी पड़ेगी। कह सकते हों कि अगर बदलाव प्रकृति का नियम है तो अब पिछड़े प्रदेशों की बारी है विकास का साक्षी बनने के लिए।