क्या कहते हैं ये हमले?

Police investigate at the location where 19 killed in knife rampage at Japan care home Photo-PTI/AP

Police investigate at the location where 19 killed in knife rampage at Japan care home
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जापान के सागामिहारा शहर में एक विकलांग रिहाइशी केंद्र में खून-खराब मचाने के बाद हमलावर ने कहा कि वह नहीं चाहता कि विकलांग लोग दुनिया में रहें. बताया जाता है कि उएमात्सु नामक ये व्यक्ति पहले इसी विकलांग केंद्र में कर्मचारी था. इस केंद्र में 18 से 70 वर्ष तक के विकलांग मौजूद हैं. उएमात्सु ने चाकू और दूसरे तेज धार के हथियारों से हमला किया, जिसमें 9 महिलाएं और 10 पुरुष मारे गए. 26 लोग घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत चिंताजनक है.

इस घटना को दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान में हुआ सबसे बड़ा खूनखराबा बताया गया है. जापान में आम तौर पर इस तरह के वारदात नहीं होते. 2001 और 2008 में वहां छुरेबाजी की दो घटनाएं जरूर हुई थीं, जिनमें क्रमश: सात और आठ लोग मारे गए थे. बहरहाल, ताजा घटना उस वक्त हुई है, जब यूरोप और अमेरिका में हिंसक हमले रोजमर्रा की खबर बने हुए हैँ. सिर्फ गुजरे हफ्ते पर ध्यान दें, जर्मनी में ऐसी तीन और अमेरिका मं एक घटना हुई. जर्मनी में वुर्ज़बर्ग शहर के पास 19 जुलाई को एक चलती ट्रेन में 17 साल के एक युवक ने कुल्हाड़ी और चाकू से चार लोगों को घायल कर दिया. उसे अफगान मूल का बताया गया. 24 जुलाई को म्यूनिख में 18 साल के एक नौजवान ने खुद को गोली मारने से पहले नौ लोगों की हत्या कर दी. फिर 25 जुलाई को जर्मनी का आंसबाख़ शहर सुर्खियों में आया, जब एक 27 वर्षीय सीरियाई मूल के शख़्स ने वहां आत्मघाती हमले में खुद को विस्फोटकों से उड़ा लिया. उसी दिन अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में एक नाइट क्लब में फायरिंग की घटना में दो लोग मारे गए और 17 जख्मी हुए.

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पिछले कुछ महीनों पर गौर करें तो फ्रांस से लेकर बेल्जियम और जर्मनी से लेकर अमेरिका में कई सामूहिक हत्याकांड को लगभग बेखौफ होकर अंजाम दिया गया है. इन घटनाओं के लिए कोई एक संगठन दोषी नहीं है. इनके पीछे मकसद भी अलग-अलग रहे हैँ. कई घटनाएं असंतुष्ट या मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्तियों की करतूत रही हैं. इसके बावजूद यह सवाल प्रासंगिक है कि विकसित समाजों में आखिर इस हद तक असंतोष क्यों फैला हुआ है? इन घटनाओं ने विकसित समाजों की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के दोषमुक्त होने की धारणा तोड़ दी है. बल्कि अब यह मानना अधिक तार्किक लगता है कि वहां शांति इसलिए रहती थी, क्योंकि वहां लोगों में संतोष का स्तर ऊंचा था. इसलिए कि वे अपनी जिंदगी के प्रति आशावान रहते थे. एक वाक्य में कहें तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद वहां तेजी से हुए विकास ने सुख और समृद्धि का जो स्वपनिल संचार रचा, उसमें उनका भरोसा बना रहता था.

गुजरे वर्षों में अनेक जनमत सर्वेक्षणों से यह बात सामने आती रही कि विकसित देशों में लोगों का यह यकीन कमजोर पड़ रहा है कि वे समाज सही दिशा में हैँ. आर्थिक मंदी ने माली बेहतरी के भरोसे को कमजोर किया. मंदी से निपटने के लिए अपनाई गई किफायत की नीतियों ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी की मुश्किल बनाई. इन्हीं परिस्थितियों में ऐसे नेता उभरे हैं, जो उन तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को हवा दे रहे हैं, जिन्हें आधुनिक दौर में असभ्यता की निशानी माना जाता था. डोनाल्ड ट्रंप, मेरी ली पां, नॉबर्ट हॉफर, नाइजल फराज, ग्रीस का गोल्डेन डॉन आंदोलन आदि जैसे अनेक नाम आज अपने-अपने समाजों में नस्लीय, विदेशी विरोधी, उग्र-राष्ट्रवादी, स्त्री-विरोधी भावनाओं का खुलेआम इजहार कर रहे हैं. वे तमाम प्रगतिशील, सभ्य एवं आधुनिक मूल्यों को चुनौती दे रहे हैं. इस रूप में वे मानवीय विवेक के लिए चुनौती बन गए हैँ.

जापान में हमलावर ने विकलांगों को निशाना बनाया. अतीत में विकलांगों को लेकर विभिन्न समाजों में कई तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित थे. उनकी शारीरिक कमजोरी को पूर्व जन्म के पाप का परिणाम माना जाता था. उनकी छाया पड़ने को अशुभ समझा जाता था. क्या हमलावर ऐसी किसी सोच से ग्रस्त था? अथवा, विकलांग केंद्र में काम करते समय अपने कुछ बुरे अनुभवों के आधार पर उसने विकलांगों के प्रति दुर्भावना पाल ली? इन प्रश्नों के उत्तर फिलहाल मालूम नहीं हैं. मगर यह अनुमान लगाने का आधार मौजूद है कि उसने यह कारनामा किया तो संभवतः इसीलिए कि मौजूदा माहौल उसे अपने अनुकूल महसूस हुआ. जब दुनिया में विवेकहीन बातें मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा बनी हुई हैं, तो असंतुष्ट, अस्थिर या कुंठाग्रस्त लोगों के लिए यह माहौल अपने माफिक लगना अस्वाभाविक नहीं है.