क्यों छूटते हैं दुष्कर्म के अपराधी ?

Justice for Jisha

A women group demanding justice for the brutal rape and murder of Jisha in Kerala. Photo: PTI

साल 2012 के आखिरी दो हफ्ते भारत के लिए बाकी दुनिया से काफी अलग थे. पूरी दुनिया जहां नए साल के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थी, वहीं भारत में एक नई  लड़ाई लड़ी जा रही थी. ये थी  बेटियों को दरिंदगी से बचाने की, उन्हें सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का हक दिलाने की और बलात्कार के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाने की. इसका केंद्र राजधानी दिल्ली का इंडिया गेट था लेकिन गुस्से और दुख में पूरा देश डूबा था. जस्टिस फॉर निर्भया ऐसा आंदोलन बना, जिसने हजारों की संख्या में युवाओं को जोड़ा और उन्हें सड़क पर उतरने को मजबूर किया. सरकारें जागीं, बलात्कार के खिलाफ सख्त कानून अमल में आया, गुनहगारों को फांसी की सजा सुनाई गई और निर्भया फंड जैसे नए कदम अस्तित्व में आए लेकिन क्या वास्तव में हालात बदले हैं?

सवाल का जवाब है, नहीं. यही वजह है कि निर्भया की सामूहिक बलात्कार और हत्या के पूरे 40 महीने बाद केरल के एर्नाकुलम में 30 साल की लॉ छात्रा जीशा वैसी ही दरिंदगी झेलने को मजबूर हुई. यानी जस्टिस फॉर निर्भया के सवा तीन साल बाद हम जस्टिस फॉर जीशा तक पहुंचे हैं. बेटियों का नाम बदल रहा है, लेकिन बाक़ी सब जस का तस है.

आज सोशल मीडिया पर जीशा के लिए न्याय माँगा जा रहा है. केरल में हुए चुनाव का यह एक बड़ा मुद्दा बना लेकिन अगर देखा जाए तो केरल में ये रेप का पहला केस नहीं है. राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि  कुछ साल में यहां रेप के मामले तेज़ी से बढे हैं.

केरल पुलिस के मुताबिक 2008 में रेप के 568 मामले दर्ज़ हुए थे. पिछले साल  2015 में  संख्या बढ़कर 1263 हो गई. ये आंकड़े भयावह इसलिए भी हैं क्योंकि पचहत्तर फ़ीसदी आरोपी सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी हो जाते हैं. ध्यान देने वाली बात ये है कि केरल में पिछले साल इसी अवधि में दूसरे  अपराधों पर काफी हद तक अंकुश लगा. 2008 में यहां हत्या के 362 मामले दर्ज हुए थे जो कि 2015 में घटकर 318 हो गए. इसी तरह अपहरण के मामले 253 से 262, डकैती के 91 से 94 और लूट के मामले 816 से 766 हो गए हैं. यहां तक कि महिलाओं के खिलाफ दूसरे अपराध जैसे दहेज हत्याएं भी 31 से घटकर 7 और घरेलू हिंसा 4138 से घटकर 3664 रह गई. सवाल  लाजिमी हैं कि अगर दूसरे अपराधों पर अंकुश लग सकता है तो दुष्कर्म पर क्यों नहीं?

दरअसल  केरल को लेकर कभी उस तरह से चर्चा नहीं होती जैसे  दिल्ली-मुंबई  या फिर यूपी-एमपी जैसे प्रदेशों में इस तरह की वारदातों को लेकर होती हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडों में  यही राज्य  टॉप पर होते हैं. 2014 में देश भर में दुष्कर्म के कुल 37413 मामले हुए. इनमें सबसे ऊपर मध्यप्रदेश (5076), राजस्थान (3769), उत्तरप्रदेश (3467), महाराष्ट्र (3438) जैसे राज्य ही थे. महानगरों की बात हो तो दिल्ली (1813), मुंबई (607), चेन्नई (65), बैंगलोर (104) और कोलकाता (36)  सबसे आगे थे.

jisha rape and murder protest

School students hold a protest demanding justice for Jisha in Kozhikode, Kerala. Photo: PTI

केरल की तरह पूरे देश में भी रेप के मामलों में सजा की दर तकरीबन 25 फीसदी ही है. मुंबई की एक लीगल फर्म के मुताबिक एफआईआर में देरी, लापरवाही से जांच, आरोपियों के वकील का पीड़िता के प्रति आक्रामक रुख और अदालतों में संवेदनशीलता की कमी इसका बड़ा कारण है. सजा की दर का कम  इसलिए भी  है क्योंकि  ज्यादातर पीड़िताएं  ज्यादती चुपचाप सह जाती हैं. समाज के तानों की परवाह अगर पीड़िता न  करे तो भी उसे पुलिस और कानून से न्याय  की उम्मीद कम रहती है. 2012 में हुई एक  स्टडी के मुताबिक भारत में पति द्वारा जबरन सेक्स के सिर्फ 0.6 फीसदी यानी 167 में से एक केस ही रजिस्टर्ड होता है.

पिछले दिनों महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा था कि सरकार मैरिटल रेप यानी पत्नी के साथ बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने पर विचार कर रही है. ऐसा कब तक हो पाएगा कहना मुश्किल है.

वैसे केरल में इस तरह के मामले  बढ़ने के पीछे एक  अलग तर्क भी दिया जाता है. राज्य में साक्षरता दर करीब 95 फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत से 20 फीसदी ज्यादा है. इसी को आधार बनाकर कहा जाता है कि महिलाएं यहां दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा जागरूक हैं. वे अपने खिलाफ होने वाले अपराधों को  सहने की बजाय पुलिस तक पहुंचती हैं.

राज्य की पुलिस का बर्ताव भी जनता के प्रति दूसरे राज्यों की पुलिस से काफी अलग है. पुलिस यहां अत्याधुनिक तकनीक से लैस है और थाने पहुंचे फरियादी को टरकाने की बजाय उसकी रिपोर्ट लिखने में तत्परता दिखाती है. शायद यही वजह है कि राज्य में  हर तरह के अपराधों पर अंकुश लगा है लेकिन  महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों में खुलकर सामने आने से ये मामले ज़्यादा दर्ज़ होते हैं.