क्लस्टर्स बुनते कल का भारत -भाग 4 (दक्षिण भारत)

Sandeep Yash
MSMEs

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नमस्कार, क्लस्टर्स की इस अखिल भारतीय सीरीज में आज चलते हैं दक्षिण भारत। वैसे अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि बावजूद इसके कि ये क्लस्टर्स भारत के आर्थिक अतीत और वर्तमान की समृद्ध टेपेस्ट्री बुनते आये हैं, इनके बारे में कम मालुमात है। इनके योगदान, प्रासंगिक नीतियों और पहल को लेकर मीडिया में बहुत कम प्रकाश डाला गया है। भारत में क्लस्टर सदियों से अस्तित्व में हैं और जैसा क़ि आप जानते हैं क़ि भारत में आज करीब 6400 क्लसटर्स है जिन्हे औद्योगिक, हथकरघा और हस्तकला समूहों में बांटा गया है। ये गाँवों, कस्बे या समूहों में पाए जाते हैं। अक्सर एक ख़ास क्लस्टर में निर्माता/कारीगर एक पारंपरिक समुदाय से आते हैं जो पीढ़ियों से किसी एक वस्तु बनाते हुए उसमें महारथ हासिल करते हैं। मसलन आज जब हम दक्षिण भारत की बात कर रहे हैं तो ज़ेहन में कांजीवरम के उम्दा रेशम की तस्वीर उभरती है। तमिलनाडु के कांचीपुरम कस्बे में बनती कांजीवरम सिल्क साड़ियों का इतिहास 400 बरस से ज़्यादा पुराना है।  उस पर चर्चा करेंगे पर पहले देखते हैं दक्षिण भारत में क्लस्टर्स की आज की स्थिति

प्रदेश क्लस्टर कारीगर / स्वयं सहायता समूह उत्पाद
आंध्र प्रदेश 29 18405/741 2060
 तेलंगाना 55 1.2 lakh 10
केरल 11 10979 / 5253 605
तमिलनाडु 14 4042/175 744
कर्नाटक 19 12218/ 1081 1168
 

 

आपकी जानकारी के लिए, हमारे देश में फैले इन क्लस्टर्स में लगभग 25 श्रेणी के तहत सैकड़ों सामान बनते है। दक्षिण भारत के  क्लस्टर्स की बात करें तो यहाँ अमूमन जंगली घास, पत्ती, फाइबर, जूट के उत्पाद, पीतल के उत्पाद, ज़रदोज़ी और जामदानी का काम, चांदी की वस्तुएं, लकड़ी पर बनी पेंटिंग्स और बेंत तथा बांस के उत्पाद, मोती के आभूषण, हाथ से बने कपास और रेशम उत्पाद बहुतायत में हैं।

हैंडलूम की बात करें तो कांचीपुरम के सिल्क क्लस्टर की ख्याति दूर दूर तक है। चलिए कुछ पन्ने पलटते हैं – जानते हैं कि आखिर क्यों यहाँ का सिल्क इतना ख़ास बन गया। कांचीपुरम को सिल्क सिटी भी कहा जाता है- इसका पुराना नाम तोण्डैमण्डलम था और यहां बुनकरी का सदियों पुराना लिपिबद्ध इतिहास रहा है। इसे गुज़रे तमाम दौरों में राज सत्ता का समर्थन मिलता रहा और ये बढ़ता रहा। कांचीपुरम सिल्क क्लस्टर का ज़िक्र सबसे पहले 1 B.C. — 6 AD में संगम साहित्य में मिलता है। पर 20 वीं शताब्दी में कहीं जा कर इसने औपचारिक शक्ल ली

– 19 अप्रैल 1942:  तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में पहली बार सिल्क वीवर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी बनी

-1953 : जाने माने बुनकर श्रीपार्थसारथी की सक्रिय भागीदारी के चलते कांचीपुरम सिल्क वीवर्स यूनियन की स्थापना

12 नवम्बर, 1955 :106 मास्टर बुनकरों के साथ कांचीपुरम सिल्क हैंडलूम वीवर्स मार्केटिंग सोसाइटी की स्थापना। इसका लक्ष्य स्थानीय क्लस्टर के उत्पादों का विपणन और उत्पादन को गति देना था

1956 : 30 स्थानीय व्यापारियों  ने मिल कर कांचीपुरम सिल्क एंड जरी टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन की स्थापना की

1958 :  भारत सरकार द्वारा बुनकर सेवा केंद्र की स्थापना हुई। इसका लक्ष्य  इकाइयों को डिजाइन, रंगाई और बुनाई का प्रशिक्षण देना था

– 25 जुलाई 1976 :कांचीपुरम को Intensive Handloom Development project के लिए चुना गया

-1 जून 1978: कांचीपुरम में जिला उद्योग केंद्र की स्थापना की गई

– 10 जनवरी, 1985 : स्थानीय महिलाओं ने अन्नई कस्तूरीबाई महिला सिल्क वीवर कोऑपरेटिव सोसाइटी बनायीं

– 8 फरवरी 2003 : Loom World बनाया गया। इसका मक़सद सभी रिटेल आउटलेट को एक छत के नीचे लाना था

-2006 :  कांचीपुरम सिल्क को ‘‘Geographical Indications’ का रजिस्ट्रेशन मिलता है

-मई 2007:  कांचीपुरम को भारत सरकार Handloom Export processing Zone बनाने के लिए चुनती है

आज सरकार यहाँ तकनीकी मदद और विकास के लिए अन्ना सिल्क एक्सचेंज, TANSILK, सेंट्रल सिल्क बोर्ड, बुनकर सेवा केंद्र, सेरीकल्चर विभाग, हथकरघा विभाग जैसी तमाम योजनाएं चला रही है – इनमें Intensive Handloom Development Project, Textile Centre Infrastructure Development Scheme, और Scheme for Integrated Textile Parks वगैरह शामिल है। आपकी जानकारी के लिए इस नगर की 75% आबादी सिल्क साड़ी बुनाई पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है। शहर में लगभग साठ हज़ार रेशम बुनकर हैं, उनमें से पचास हज़ार बुनकर सहकारी समितियों के तहत काम करते हैं। यहाँ एक साड़ी को पूरा करने में कारीगर को 15-20 दिनों की मेहनत लगती है। आज कांचीपुरम में करीब 60,000 करघे चलते हैं और लगभग 200 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता है। वैश्वीकरण के इस युग में कांचीपुरम की साड़ियां सात समुन्दर पार बाज़ारों में अपनी श्रेष्ठता का लोहा मनवा चुकी है। विदेश के बाज़ारों में कांजीवरम सिल्क से बनी साड़ियां 7 हज़ार रुपयों से लेकर 2 लाख रुपये तक बिकती है।

साथ ही आधुनिकीकरण के चलते आज यहां पावर लूम ने हथकरघों को पीछे छोड़ दिया है। काम को आसान और तेज बना दिया है। आज उत्पादन और विपणन में ICT (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) को अपनाने से मांग और आपूर्ति दोनों में इजाफा हुआ। Computer Aided Design (CAD) /Computer AidedMotif (CAM) ने नयी और आधुनिक डिजाइनों को जन्म दिया है। इन साड़ियों की अनोखी बुनावट, मौलिकता और अद्वितीय डिज़ाइन आज चैनल, अलेक्जेंडेन मैक क्वीन और लुई वुइटन जैसे अंतराष्ट्रीय डिजाइनरों को प्रेरित कर रही है। तो ये केस स्टडी एक नमूना है जो बताता है कि हमारे पारम्परिक हुनर और तकनीक का मिलन कैसे समृद्धि ,रोजगार और स्वावलम्बन के तमाम दरवाज़े खोल सकता है।

इसी तरह आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले का नरसापुर क्लस्टर है जो अपनी पारम्परिक टेक्सटाइल्स के लिए मशहूर है। यहाँ करीब 10 हज़ार कारीगर और 150 स्वयं सहायता समूह काम कर रहे है। लगातार विकास की ओर अग्रसर इस क्लस्टर ने आंध्र प्रदेश हथकरघा की कम से कम छह किस्मो को जन्म दिया है। ये सारी किस्में अपने उस गाँव के नाम से जानी जाती हैं जहाँ इनका जन्म हुआ। इन सभी की अपनी ख़ास शैली है पर सबसे मशहूर जामदानी है जो अपनी भव्यता और निर्मलता के प्रसिद्ध है। इसे दक्कनी जामदानी भी कहा जाता है

साउथ के क्लस्टर्स में तमाम जाने माने उत्पाद हैं जैसे – चंदनपेट (हैदराबाद ) के मशहूर मोती और उनसे बने गहने, पोचमपल्ली इकत की साड़ियां, बंजारा की कढ़ाई और सूती दरियां, कुन्नूर की फर्नीशिंग्स, कुथमपुल्ली की साड़ियां,  कोल्लम के नारिएल उत्पाद, कोयम्बटूर के संगीत वाद्य, मैसूर के चन्दन उत्पाद, उडुपी और बीदरी  का धातु का काम वगैरह। जनाब हम गिनाते जायेंगे पर फेहरिस्त छोटी नहीं होगी।

तो जाते जाते – “धन केवल मौद्रिक अर्थव्यवस्था द्वारा ही नहीं बनाया जाता है, इसमें प्राकृतिक और जीवंत तंत्र की साँसें भी शामिल हैं।

फिलहाल अगले लेख में चर्चा करेंगे पश्चिम भारत के क्लसटर्स की।