क्लस्टर्स बुनते कल का भारत -भाग 7 (नीतिगत और कानूनी नज़रिये से)

Sandeep Yash
File photo of a factory working in a fabrication unit in Neemrana, Rajasthan. Photo: RSTV.

File photo of a factory working in a fabrication unit in Neemrana, Rajasthan. Photo: RSTV.

नमस्कार, भारत की अर्थव्यवस्था को MSME क्लस्टर विकास के माध्यम से कैसे उर्जित किया जा  सकता है, ये सीरीज उस पर प्रकाश डालती है। शोध और विशेषज्ञों के सहारे तय हुए अभी तक के सफर में तमाम दिलचस्प जानकारियां सामने आयीं। इस सीरीज के पिछले 6 लेखों में हमने चहु दिशाओं में मौजूद क्लस्टर्स को टटोला और पाया कि कैसे देश का ये सेक्टर हुनर, संघर्ष ,साहस और दृढ संकल्प का जीता जागता दस्तावेज़ है। आज सरकार ”मेक इन इंडिया” कार्यक्रम के तहत इसे इसे मजबूत बुनियादी अर्थव्यवस्था का अटूट अंग मान रही है। सरकारी आकड़ों के मुताबिक़

– चीन के बाद भारत का MSME बेस दुनिया में सबसे बड़ा है
– इस सेक्टर में पारंपरिक से लेकर हाई-टेक तक 6,000 से अधिक उत्पाद बनते हैं
– MSME मंत्रालय के 2017 -18 के आकड़ों के मुताबिक़ देश में लगभग 6 करोड़ सूक्ष्म, 33 लाख छोटी और करीब 5 हज़ार मध्यम इकाईयां हैं .
– देश में कुल एमएसएमई के 14.20 % हिस्सेदारी के साथ उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर, पश्चिम बंगाल 14% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर और तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र आठ% हिसेदारी के साथ तीसरे नंबर पर है
_ MSME सेक्टर का देश के निर्यात में 45% का योगदान हैं
–  केवल 33,000 MSME निर्यातक ही पंजीकृत हैं
– हाल के दौर में GSTN पर MSME पंजीकरण में बड़ा इजाफा हुआ है जो औपचारिक अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है
– ये सेक्टर देश भर में लगभग 11 करोड़ लोगों को रोजगार देता है
_ इस सेक्टर में ज़्यादातर उद्यम ग्रामीण इलाकों में हैं
– 2015 -16 के आकड़ों के मुताबिक़ इस सेक्टर का देश  की GDP में लगभग 29%  रहा

फिलहाल आपकी जानकारी के लिए MSME सेक्टर भारत में दो वर्गों में बंटा है – उत्पादन और सेवाएं। इसको बल देने के लिए कानूनी और नीतिगत ढांचे में समय और ज़रुरत के हिसाब से बदलाव किये जाते रहे हैं। तो आज चलते हैं पीछे, पलटते हैं कुछ पुराने पन्ने।

भारत में MSME सेक्टर की यात्रा को तीन भागों में बांटा जा सकता है

1948 – 1991 – इस दौर में MSME सेक्टर को सारे सरकारी नीतिगत संकल्पों में मान्यता मिली और इसे रोजगार सृजन, कौशल विकास, निजी क्षेत्र के संसाधनों का विकास और राष्ट्रीय आय के समान वितरण को सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया। इस दौर की कुछ और ख़ास बातें

– लघु उद्योग विकास संगठन (SIDO) की स्थापना 1954 में MSMEs के निरंतर और संगठित विकास के लिए की गई
– अगले दो बरसों में राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम, खादी और ग्रामोद्योग आयोग और कॉयर बोर्ड भी बनाये गए

इस दौर में MSMEs को पोसने के लिए तमाम कदम उठाये गए जैसे –  उत्पाद आरक्षण (2002 में 799 आइटम इस लिस्ट में थे), बैंक क्रेडिट कार्यक्रम में प्राथमिकता, उत्पाद शुल्क में छूट, सरकारी खरीद कार्यक्रम के तहत प्राथमिकता, बुनियादी ढांचा विकास तथा उद्यमशीलता और कौशल विकास के लिए संस्थान की स्थापना वगैरह।  साथ ही MSME- Development Institute जिसे पहले SISI के रूप में जाना जाता था, को पूरे भारत में स्थापित किया गया था। MSMEs को कौशल-प्रशिक्षण और ज़रूरी तकनीकी सेवा देने के जर्मन और डेनिश सहायता से टूल रूम बनाये गए थे।  और राज्य स्तर पर, सारे देश में जिला उद्योग केंद्र (DIC) स्थापित किए गए थे।

1991-1999:- ये उदारीकरण का दौर था। इस दौर में लघु, सूक्ष्म और ग्रामीण उद्यमों के लिए नई नीति तैयार की गयी।  इसका लक्ष्य सुरक्षा के पारम्परिक नज़रिये को तजना था। MSMEs को उर्जित कर उन्हें विदेशी प्रतिस्पर्धा और खुले बाजार का सामना करने लायक बनाना था। तो किये गए उपायों में आधारभूत संरचना, प्रौद्योगिकी और गुणवत्ता में सुधार, quality certification और नए टूल रूम के लिए परीक्षण केंद्र स्थापित करना शामिल था।  वित्त और तकनीकी सेवाओं में तेजी लाने के लिए SIDBI और Technology Development and Modernization Fund  बनाया गया। इसके साथ ही एक Delayed Payment Act भी बनाया गया जिससे MSMEs को भुगतान में होती देरी को खत्म किया जा सके।  विलंबित भुगतान अधिनियम को एमएसई और औद्योगिक आधारभूत संरचना को बकाया भुगतान की सुविधा प्रदान करने के लिए लागू किया गया था। लघु उद्योगों के विकास के लिए Industrial Infrastructure.Development के तहत mini industrial estates बनाये गए।

1999 के बाद: इस दौर में 1999 से (MSME) एमएसएमई मंत्रालय वजूद में आया,  इसे पहले लघु उद्योग और कृषि मंत्रालय के रूप में जाना जाता था।  इस बार लक्ष्य विकास और प्रोत्साहन था। अगस्त 2000 में घोषित हुए नए नीति पैकेज के तहत -. क्रेडिट, इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रौद्योगिकी और मार्केटिंग से जुडी समस्याओं का समाधान ढूंढना, तकनीकी विकास के लिए क्रेडिट लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी देना, पहली पीढ़ी के उद्यमियों  के लिए बगैर कोलेटेरल के एक क्रेडिट गारंटी योजना शुरू करना। केंद्रीय उत्पाद शुल्क के भुगतान से राहत के लिए छूट की सीमा को बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये करना, एमएसई के लिए विकास सहायता योजना शुरू करना शामिल था

साथ ही हितधारकों के साथ परामर्श कर इस सेक्टर में उत्पादन के लिए आरक्षित उत्पादों की सूची को हर बरस धीरे-धीरे कम करने का फैसला लिया गया।
और फिर 2006 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम अधिनियम (Micro, Small and Medium Enterprises Act.) पारित हुआ। इसकी मांग और ज़रुरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। मार्च, 2007 में सूक्ष्म और छोटे उद्यमों के विकास के लिए एक तीसरे पैकेज की घोषणा की गयी। इसके तहत ऐसे प्रस्तावों / योजनाओं की बात की गयी जो तेजी से बदलते आर्थिक परिवेश में इस सेक्टर को प्रतिस्पर्धात्मक बनाये रखते।

आपकी जानकारी के लिए 2006 तक अगर IDRA Act के कुछ प्रावधानों को छोड़ दें तो इस सेक्टर को नियंत्रित करने वाला कोई विशेष अधिनियम नहीं था। इसके वृद्धि, विकास और प्रतिस्पर्धा को एक ऐसे  व्यापक केंद्रीय कानून की ज़रुरत थी जो वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में इसे प्रासंगिक बनाये रखे।  इन्हीं सन्दर्भों  से ज़मीन तैयार हुई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 की।भारत सरकार ने 2005 में संसद में एक विधेयक पेश किया जिसे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास विधेयक, 2005 के रूप में जाना जाता है।  यह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया था और 16 जून, 2006 को भारत के राष्ट्रपति की सहमति के बाद कानून बन गया। आइये इसकी विशेषताओं को देखते है।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006  (MSMED ACT. 2006)

विशेषताएं

– MSME मंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय बोर्ड की स्थापना। बोर्ड का लक्ष्य –  MSMEs के प्रचार और विकास को प्रभावित करने वजहों की जांच करना, केंद्र सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा करना, इस सेक्टर के विकास को सुविधाजनक बनाने और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के संबंध में सिफारिश करना शामिल है।

– इस एक्ट ने उद्यम के सिद्धांत को पहली बार मान्यता दी, उसे कानूनी जामा पहनाया। इसमें विनिर्माण (manufacturing) और सेवा दोनों शामिल हैं। इस एक्ट ने पहली बार मध्यम उद्यमों को भी परिभाषित किया और इन उद्यमों के तीन स्तरों यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम को सांचे में ढाला।

– ये सेक्टर मूलतः राज्य सरकारों के कार्यक्षेत्र में आता है पर इस एक्ट ने केंद्र सरकार को MSMEs की प्रतिस्पर्धा को विकसित करने, आगे बढ़ाने के लिए दिशानिर्देश जारी करने का भी अधिकार दिया।

– इसके अलावा – इन उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने और विकास के लिए चुनींदा फंड्स की स्थापना, सूक्ष्म और लघु उद्यमों के उत्पादों और सेवाओं को सरकारी खरीद में वरीयता तथा सभी तीन श्रेणियों के व्यवसायों को बंद करने की प्रक्रिया का सरलीकरण इस एक्ट का हिस्सा रहा। 2006 एक्ट में इन तीनो श्रेणियों के वर्गीकरण का आधार प्लांट और मशीनरी में निवेश रहा।

अप्रैल, 2016 में The Micro, Small and Medium Enterprises (Amendment) Bill, 2015 के माध्यम से सरकार ने 2006 एक्ट में संशोधन किये। प्लांट और मशीनरी में निवेश सीमा बढ़ाई गयी।

फिलहाल 1 जून, 2020 को जारी सरकारी गज़ट के मुताबिक़  MSMEs की नवीनतम वर्गीकरण कुछ ऐसा है

सूक्ष्म उद्यम –   वार्षिक कारोबार 5 करोड़ रु से अधिक नहीं, प्लांट और मशीनरी में निवेश रू 1 करोड़ से अधिक नहीं
लघु उद्यम –     वार्षिक कारोबार 50 करोड़ रू से ज़्यादा नहीं, प्लांट और मशीनरी में निवेश रू 10 करोड़ से अधिक नहीं
मध्यम उद्यम –  वार्षिक कारोबार 250 करोड़ रू से ज़्यादा नहीं, प्लांट और मशीनरी में निवेश 50 करोड़ रू से अधिक नहीं

तो जान लीजिये कि MSMEs न सिर्फ क्लस्टर्स की बुनियाद हैं बल्कि बड़े उद्योगों की पूरक भी हैं।  आज MSME क्लस्टर्स देश की अर्थव्यवस्था के तमाम आयामों की बढ़त में योगदान दे रहे हैं, अपने उत्पादों और सेवाओं की सतरंगी रेंज के माध्यम से घरेलू और वैश्विक बाजारों में मांग को पूरा कर रहे हैं। इस सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए सरकार जल्द एक ऐसी योजना कार्यान्वित करेगी जिसमे राज्यों को – Employment generation, enterprise creation, exports और ease of doing business के पैमाने पर आँका जायेगा।

चलते चलते – हमने अब तक के लेखों में एग्रो बेस्ड और हैंडलूम क्लस्टर्स पर तवज्जो दी। अगले लेख से हमारा फोकस देश के मुख्य इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स पर होगा।