क्लस्टर्स बुनते कल का भारत -भाग 3 (उत्तर पूर्व भारत )

Sandeep Yash
MSMEs

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नमस्कार, क्लस्टर सीरीज में आज बात करेंगे उत्तर पूर्व या पूर्वोत्तर भारत की। इस क्षेत्र  में अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा राज्य आते हैं। ये आठ पूर्वोत्तर राज्य कुल 263179 Km2 क्षेत्र को कवर करते हैं जो कि भारत के कुल क्षेत्रफल का 8% है। आज़ादी के वक़्त इस क्षेत्र की गिनती देश के सबसे विकसित इलाकों में होती थी पर आज यहाँ तमाम चुनौतियाँ है जैसे – प्रति व्यक्ति कम आय, पूंजी की कमी, बुनियादी ढांचागत सुविधाएं का अभाव, संचार माध्यमों का सीमित होना और सबसे बड़ी बात भौगोलिक कारणों के चलते देश की मुख्यधारा से दूर होना। इन वजहों से पूर्वोत्तर क्षेत्र की क्षमता का पूरा दोहन नहीं किया जा सका। पर आज की तर्रीख में यहाँ उभरते छोटे जैसे सेक्टर्स,  हुनरमंद पर बेरोजगार आबादी के लिए संतुलित विकास की उम्मीद जगा रहे हैं। भारत सरकार तमाम योजनाओं के मार्फ़त क्षेत्र के आर्थिक विकास में प्रबल दखल दे रही है।

आपकी जानकारी के लिए, सीमित औद्योगीकरण के चलते इस क्षेत्र में काम काज- मुद्दतों से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, चाय, कोयला, जूट, वन उत्पाद, कुछ खनिज आधारित उद्योग और छोटे घरेलू उद्योग जैसे हथकरघा और हस्तशिल्प के आसपास ही केंद्रित रहा है। फिर विशेषज्ञों की राय, स्थानीय संसाधनों एवं श्रमबल की उपलब्धता और सरकारी पहल के चलते क्लस्टर्स विकास मॉडल का इस क्षेत्र में अवतरण हुआ। आज इनकी तस्वीर कुछ ऐसी है।

पूर्वोत्तर राज्यों में क्लस्टर्स

प्रदेश                              क्लस्टर        कारीगर / स्वयं सहायता समूह    उत्पाद

अरुणाचल प्रदेश                6                        1141 /65                      216
असम                              46                      14914 /946                 2365
मणिपुर                            32                      9107 /580                   1330
मेघालय                            4                       648/ 45                         36
मिजोरम                           2                        435 /33                         22
नगालैंड                           6                        2409 / 132                    474
सिक्किम                         2                         531 /32                          52
त्रिपुरा                            17                        6270 /514                      860

आप देख सकते हैं कि प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर ये क्षेत्र मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज, ट्रेड और एक्सपोर्ट्स सेक्टर में विपुल संभावनाएं लिए हुए हैं। पर Entrepreneurship Development Institute of India की फील्ड रिपोर्ट के मुताबिक़ इन संभावनाओं को सच्चाई में बदलने के लिए कुछ चुने हुए बिंदुओं पर काम करना होगा, जैसे –

-कठिन भौगोलिक क्षेत्र, परिवहन, बाजार, बिजली और पूँजी की किल्लत का मुद्दा
– मानव संसाधन उत्तर पूर्व की सबसे बड़ी पूँजी है। यहां साक्षरता की दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं।  इसका कौशल स्तर बढ़ाने की ज़रुरत है
– हथकरघा और बांस से जुड़े पारंपरिक उत्पाद बनाने की प्रक्रिया को आधुनिक बनाना
– स्थानीय कारीगरों में तकनीकी जागरूकता लाना और उसे हासिल करने में मदद करना

उत्तर पूर्वी कौंसिल की विज़न 2020 रिपोर्ट कहती है स्थानीय हथकरघा, हस्तशिल्प और सेरीकल्चर जैसे स्थानीय संसाधनों का विकास क्लस्टर मॉडल के माध्यम से होना चाहिए। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवाहन ने इस तथ्य को बल दिया है। आपकी जानकारी के लिए पूर्वोत्तर भारत का हस्तशिल्प सारे देश में मशहूर है जो केन और बांस, लकड़ी, टेराकोटा, कपडा, धातु और पीतल जैसे संसाधनों से उपजता है। इसमें केन और बांस सभी पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते है। पूर्वोत्तर भारत में चल रही हस्तशिल्प इकाइयां देश की कुल संख्या का लगभग 20 प्रतिशत है। ये देश के कुल 22 % हस्तशिल्प कारीगरों को रोजगार देती हैं। नकदी की बात करें तो इनकी हिस्सेदारी भारत में उत्पादित हस्तशिल्प उत्पादों के कुल मूल्य का लगभग 80 प्रतिशत है। यहाँ मणिपुर में सबसे अधिक शिल्प इकाइयाँ हैं जिसके बाद त्रिपुरा है, लेकिन उत्पादन के मूल्य (value of production) के मामले में नगालैंड सबसे आगे है, इसके बाद असम का नंबर आता है।

पूर्वोत्तर भारत के इन 8 राज्यों में 20,00,000 हैंडलूम इकाईयां हैं हैं जिनमें लगभग 80% कार्यरत हैं – असम में हथकरघा की संख्या सबसे अधिक है। पूर्वोत्तर में 60 प्रतिशत से अधिक परिवारों की रोजी सीधे हस्तशिल्प और हथकरघा से जुडी है। रिपोर्ट के मुताबिक़ इस क्षेत्र में पसरी बाजार और सप्लाई नेटवर्क की कमी को दूर करने के लिए North Eastern Handicrafts and Handloom Development Corporation (NEHHDC) की भूमिका बढ़ानी होगी जिसमें खरीद और विपणन शामिल है।

एक और दिलचस्प तथ्य आपसे साझा करते हैं – क्या आप जानते हैं की बांस या बम्बू का पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और व्यापार में कितना बड़ा योगदान है। बांस और केन जिन्हें स्थानीय अर्थव्यवस्था की ऱीढ़ माना जाता है, बड़ी मात्रा में क्लस्टर्स को कच्चा माल और किसान को नकदी मुहैय्या कराते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक़

– देश के 60% से अधिक और दुनिया के 20 % बांस संसाधन अकेले इस क्षेत्र में पाए जाते हैं
– चीन के बाद भारत में बांस की 136 प्रजातियां मिलती है – इनमें से 58 प्रजातियां पूर्वोत्तर में पाई जाती हैं
– UNIDO के मुताबिक़ पूर्वोत्तर क्षेत्र में बांस से जुड़ा व्यवसाय अगले 10 वर्षों में 5,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है
– अकेले मिजोरम की देश के बांस बाज़ार में 14 फीसदी हिस्सेदारी है। इस प्रदेश की आधी भूमि बांस या बम्बू के वन से ढकी है। इस फेहरिस्त में फिर असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर है
– बांस के स्टॉक के मामले में असम सबसे ऊपर है, उसके बाद मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश का नंबर आता है

बांस एक ऐसी वनस्पति है जिसके करीब 1,500 उपयोग रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। इस इलाके में बांस को गरीब आदमी का टिम्बर माना जाता है और इसके बिना किसी क्लस्टर की कल्पना नहीं की सकती। इन क्लस्टर्स में बांस के बने बर्तन, मछली पकड़ने के जाल, मर्तबान, गुलदस्ते और टोकरियां बनायीं जाती हैं.. फिलहाल, किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन (एनबीएम) पर ध्यान दे रही है। इसमें बांस विकास परिषद (एनईसीबीडीसी) पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए समन्वय एजेंसी के रूप में काम कर रही है।  अतः नयी योजनाओं में स्थानीय क्लस्टर्स को उन्नत तकनीक से लैस करना और श्रमबल को ट्रेनिंग देना शामिल है। इससे बांस की कोपलें, कैंडी, फैशन उद्योग के लिए बांस चारकोल फाइबर, विनिर्माण जैसे लैमिनेटेड ब्रांड, बांस के रेशे के उत्पादन, बांस के रेशे के फाइबर सीमेंट बोर्ड बनाने, बांस की फर्श बनाने, दवाएं, खाद्य पदार्थ, लकड़ी के विकल्प  जैसे उत्पादों को तैयार किया जा सकेगा।  जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिल सकती है।

साथ ही स्थानीय क्लस्टर्स को फायदा मिले, इसके लिए बांस के स्टॉक को वृक्ष की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है। इसके लिए भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 2 (7) में सरकार ने नवम्बर 2017 में संशोधन किया है। इसके अलावा स्फूर्ति (स्कीम ऑफ फंड फॉर रिजेनेरेशन ऑफ ट्रेडिशनल इंडस्ट्रीज) नाम की योजना MSME मंत्रालय द्वारा लागू की गयी है जिसका लक्ष्य परम्परागत उद्योगों और बांस की दस्तकारी करने वाले हस्तशिल्पियों को बढ़ावा देना है।  जान लीजिये, कि बावजूद इसके, देश में केन और बम्बू की मांग ज़्यादा और सप्लाई कम है।

इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में क्लस्टर्स के माध्यम से हैंडलूम, हेंडीक्राफ्ट के अलावा अब एग्रो प्रोसेसिंग, डेरी और मॉस उत्पादन उद्योग, रबर और मसाला उद्योग के विकास और निर्यात पर बल दिया जा रहा है। हाल के बरसों में अरुणाचल प्रदेश ने भारत सरकार की सहायता से बड़े पैमाने पर फलों की बागवानी शुरू की है। निर्यात के मोर्चे पर जाकर जानकार काफी संभावना देख रहे हैं – वर्तमान में देश की कुल निर्यात इकाइयों का लगभग 4.38 प्रतिशत यहाँ मौजूद हैं पर इनका योगदान केवल 0.23 प्रतिशत है।

तो जाते जाते –  हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों की 96 फ़ीसदी सीमायें पडोसी देशों से जुड़ती हैं। भारत की ”Look East” नीति के तहत बुनियादी ढांचे के निर्माण, सीमा पार से संपर्क और संचार लिंक बनाने में इन राज्यों की एहम भूमिका है। यही रास्ता पड़ोसी देशों के साथ भारत के व्यापार और आर्थिक सहयोग की बुनियाद है। विशेषज्ञ कहते हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों और इन क्लस्टर्स का विकास आत्मनिर्भर भारत और उसकी सुरक्षा से सीधा जुड़ा है।

अब चलते हैं, अगले लेख में दक्षिण भारत के क्लस्टर्स की बात करेंगे।