क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 14 (पानीपत का टेक्सटाइल क्लस्टर)

Sandeep Yash
Representative image: Handloom industry

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नमस्कार, क्लस्टर सीरीज का हमारा आज पड़ाव पानीपत, हरियाणा में है। पानीपत को टेक्सटाइल सिटी भी कहा जाता है।  ये क्लस्टर अपने टेक्सटाइल उत्पादों  के लिए मशहूर है।  देखते हैं इस उद्योग के बीज यहाँ कैसे पड़े।  कहानी भारत-पाक विभाजन से शुरू होती है। पाकिस्तान का हिस्सा बने हैदराबाद, झांग और मुल्तान से 1947 में उजड़ कर आये बुनकर समाज को पंजाब सरकार यहाँ बसाया था। और फिर समय गंवाए बगैर इन बुनकरों ने करघे लगाकर  अपने पुश्तैनी शिल्प को तराशना शुरू कर दिया था। आगाज़, खेस और दरी से हुआ जो मोटे सूत से बुने गए थे।  इन उत्पादों को असम, बिहार और बंगाल के बाज़ारों में अच्छे दाम मिले थे। आने वाले दशकों में इस क्लस्टर में हाथ द्वारा बुनी कारपेट्स, टेबल मैट्स, परदे, बेड कवर भी बनने लगे।  ये सराहे गए और निर्यात भी हुए।

1984 से यहाँ ऊनी कम्बल बनने शुरू हुए। इनको अंजाम दिया इस क्लस्टर में लगी लगभग 400 हैंडलूम यूनिट्स ने, इनमें 100 फिनिशिंग यूनिट्स थी। इस  उद्योग लगभग 25000 श्रमिकों को रोज़गार मिला।  यहाँ का औसत सालाना कारोबार करीब 250 करोड़ रू था और यहाँ बने 70% कम्बल सरकार और सेना को जाते थे।  सन 2000 के दशक में यहाँ कारोबार बढ़ कर 1000 करोड़ रू तक पहुंच गया था पर फिर इनपुट लागत में इजाफे और चीन से आते सस्ते कम्बलों ने इस उद्योग ख़ासा नुक्सान पहुंचाया।  नतीजतन स्थानीय यूनिट्स सन 2013 से रजाइयां भी बनाने लगीं, इन रजाईयों को ओढ़ा – बिछाया-दोनों जा सकता था। कम कीमत के चलते ये देश में काफी लोकप्रिय हुई । चलिए अब इस टेक्सटाइल क्लस्टर की व्यापकता देखते हैं।

इस क्लस्टर की गतिविधियों को तीन स्थानीय सेक्टर मिल कर अंजाम देते हैं –

• निर्माता निर्यातक (Manufacturer Exporter)  – ये अलहदा किस्मों के कपडे बनाते है। मैनुफक्चरर्स को भी ज़रुरत हो तो काम देते हैं
• मर्चेंट एक्सपोर्टर (Merchant Exporter) – ये तबका पूरी तरह से वस्तुओं की आउटसोर्सिंग पर निर्भर रहता है।
• निर्माता (Manufacturers) –  ये ग्रुप, निर्यातकों से आर्डर लेता है।  फिर कच्चा माल लेकर उसे तय शक्ल देता है, अपना मेहनताना लेता है

TERI (2016) की रिपोर्ट के मुताबिक़ यहाँ इकाईयों की तस्वीर ऐसी थी 


 केटेगरी माइक्रो लघु मध्यम टोटल
होम फर्निशिंग 1500 350 65 1,915
फर्श कवर 185 100 45 330
डाइंग और मुद्रण 175 200 25 500
यार्न प्रसंस्करण / करघे 250 75 25 350
टोटल 2110 725 260 3095


यहाँ की लगभग 65% इकाइयाँ माइक्रो श्रेणी में आती हैं। अगर काम के आधार पर देखें तो
– 62% इकाईयां होम फर्निशिंग
– 11% इकाईयां फ्लोर कवरिंग
– 16% इकाईयां रंगाई और मुद्रण
– 11% इकाईयां यार्न प्रसंस्करण / करघे से जुडी थीं

इस क्लस्टर में कच्चा माल स्पिनिंग मिल और पॉवरलूम उद्योग से आता है। स्थानीय इकाईयां कच्चे माल की क्वालिटी को लेकर सतर्क रहती हैं क्युकी इसका सीधा असर तैयार उत्पाद, साख और बाजार पर पड़ता है।  कुछ इकाईयों के पास पावर लूम, यार्न प्रोसेसिंग, डाइंग और प्रिंटिंग की सुविधा है। जबकि कुछ छोटी इकाईयां बड़े ब्रांड्स के लिए उत्पादन कर रही हैं।  चलिए इस क्लस्टर की उत्पादन प्रक्रिया समझते हैं

पहले – धागे की सफाई और ब्लीचिंग कर कच्चे माल को उत्पादन लायक बनाना
दूसरा – इस चरण में कपडे की ज़रुरत और सुविधानुसार रंगाई की जाती है
तीसरा –  फिर मुद्रण यानी कपड़ों पर प्रिंटिंग, जिसके बाद कपडे को 145* C में सूखा कर अगले चरण के लिए तैयार किया जाता है
चौथा –  प्रिटिंग के रंग पक्के करने के लिए फिर कपड़ों को स्टीम चैम्बर में डाला जाता है, इसके बाद इनकी गर्म पानी से धुलाई होती है
पांचवां – फैब्रिक ब्रशिंग – ये तरीका अक्सर पोलर ब्लैंकेट बनाने में इस्तेमाल होता है जहाँ धागे की उठान ज़रूरी होती है
छठवा – पॉलिशिंग – यही चरण तैयार उत्पाद की क्वालिटी तय करता है, यानी जो कमी देखती है उसे दूर किया जाता है

ऊर्जा की बात करें तो स्थानीय यूनिट्स मुख्यतः थर्मल ऊर्जा का इस्तेमाल करती हैं , इसके अलावा यहाँ कोयले और गोबर्धन या कंडी का भी प्रचलन है।  ऊर्जा की सबसे ज़्यादा खपत रंगाई, प्रिंटिंग और वस्त्र सुखाने वाली यूनिट्स में होती है।

फिलहाल  पिछले कुछ बरसों से पानीपत क्लस्टर 10 -15 % की विकास दर से बढ़ रहा है।  सूती कपड़े, बेड कवर, कालीन, बाथ मैट, आसन, पर्दे, टेरी टॉवल, फ्लोरिंग और फर्निशिंग फैब्रिक इसके मुख्य उत्पादन हैं।  यहाँ की 400 एक्सपोर्ट यूनिट्स स्थानीय उत्पाद  यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, अमेरिका, खाड़ी के देशों और जापान के बाज़ारों तक पंहुचा रही हैं।

आपको अब एक दिलचस्प तथ्य से रूबरू कराते हैं – 2015 में भारत दुनिया में  पुराने /पहने हुए कपड़ों वस्त्रों का सबसे बड़ा आयातक बनकर उभरा। यूएस, यूके और जर्मनी हमारे यहाँ ऐसे कपडे भेजने वाले तीन शीर्ष देश थे।  United Nations Comtrade data के आकड़ों के मुताबिक़ भारत ने 2017 में 186 मिलियन डालर के पुराने कपडे आयात किये थे।  हमारे यहाँ पुराने यानी discarded कपड़ों का बाज़ार काफी हद तक अफ्रीकी देशों में चैरिटी की रवायत बनाये रखने के लिए वजूद में आया था।

फिलहाल, आयात के बाद इन कपड़ों को छांट कर काट /चीर दिया जाता है।  फिर इनसे डोरमैट, कंबल और बेड लिनन बनाये जाते है। दूसरी ओर, ऐसे वस्त्र जो इस्तेमाल किये जा सकते हैं जिनमें coarse wool blankets शामिल हैं – इन्हें तंजानिया, केन्या जैसे अफ़्रीकी देशों में भेजा जाता है।  Coarse wool के कंबल रेलवे, सेना और आपदा राहत कार्यों में भी जाते हैं।  Recycled किए गए डोरमैट्स और फ्लोर मैट को अमरीका और इंग्लैंड  वापस भेज दिया जाता है जहां उनका बहुत बड़ा बाजार है। बची हुई कतरन को industrial wipes के रूप में ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया और जापान में बेचा जाता है। और ये सारी recycling पानीपत में होती है। 1980 के दशक में recycling इंडस्ट्री की शुरुआत यहाँ तब जब स्थानीय इकाईयां महंगाई के चलते virgin wool आयात करने में असमर्थ हो गयी थीं।

इस ट्रेंड को बल मिला 1990 के दशक में जब औद्योगिक मंदी ने इटली के एक छोटे से कस्बे प्रातो की हज़ार बरस पुराने वस्त्र उद्योग /परंपरा को मेट दिया।
पानीपत मिल मालिकों ने इन मशीनों को खरीदा जो recycled ऊन से धागे बना सकती थीं। ये कदम सुपर हिट साबित हुआ, पानीपत टेक्सटाइल उद्योग का   सालाना राजस्व 300 मिलियन डॉलर तक बढ़ गया। रीसाइक्लिंग उद्योग ने खूब रोज़गार पैदा किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 2010 के दौरान स्थानीय …

– बाथरूम मैट उद्योग लगभग 2000 करोड़ रू का बन गया था
– recycled कंबल का सालाना कारोबार लगभग 700-1000 करोड़ रू हो था
– सन 2000 में पानीपत क्लस्टर में 400 से अधिक मिलें थीं जो इस प्रक्रिया को पूरा करने लायक थीं
– पानीपत के कंबल उद्योग की global relief blanket market में 90%  हिस्सेदारी थी

हालांकि बीते दशक में इस ट्रेंड में कमी आयी है, राजस्व और इस काम से जुडी इकाईयां – दोनों कम हुए हैं।  पर पानीपत टेक्सटाइल क्लस्टर पुराने कपड़ों की Recycling का सबसे बड़ा अंतराष्ट्रीय केंद्र आज भी है।

अगर समस्याओं की बात करें तो स्थानीय उद्योग मंडल के मुताबिक़ –
– कुशल /अकुशल श्रमिकों की कमी का असर सीधे उत्पादन पर पड़ता है, इसके मुताबिक़ स्थानीय उद्योग को मनरेगा से जोड़ना अच्छा होगा
– आधारभूत सुविधाओं का अभाव – बिजली, पानी, सीवेज और सड़क जैसी सुविधाओं में सुधार की काफी गुंजाईश रहती है
– वित्त जुटाना – यहाँ ज़्यादातर छोटी इकाईयां हैं जिन्हें वित्त की ऑक्सीजन समय से नहीं मिल पाती है
– एक्साइज और टैक्सेशन तंत्र को सरल बनाना

इस क्लस्टर के योगदान और प्रबल संभावनाओं को देखते हुए कई सरकारी एजेंसियां इन समस्यायों के निराकरण पर काम कर रही है।  इनमें वीवर्स ट्रेनिंग सेंटर पानीपत, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन इकोलॉजी एन.दिल्ली, एमएसएमई-डीआई, करनाल, एनएसआईसी लिमिटेड, पानीपत, डीआईसी, पानीपत, BIS चंडीगढ़, SIDBI कुंडली और HSPCB, पंचकुला प्रमुख हैं।

पिछले ही बरस इस क्लस्टर की लम्बे समय से चली आ रही मांग पूरी हुई।  यहाँ Exihibition Centre बनाने का काम शुरू हो चुका है।  इसे बनाने में 43 करोड़ रू की लागत आएगी।

फिलहाल आज जुलाई, 2020 में ये लेख लिखते वक़्त (सरकारी आकड़ों के मुताबिक़) इस क्लस्टर में टेक्सटाइल यूनिट्स की संख्या बढ़ कर करीब 3500 हो चुकी है और सालाना कारोबार लगभग 7000 करोड़ रू है।  उत्तर कोवीड काल में पारम्परिक सोच से इतर आप अपने सतरंगी MSME सेक्टर की मेधा, संभावना और उद्यम पर भी नज़र डालें।  आपका हुनर, श्रम, लगन और बेचैनी अगर इससे जा जुडी तो – सर्वकल्याण होगा, जान लीजिये।

जाते जाते – आपसे कहने को अभी बहुत कुछ है पर इस सीरीज को यहीं विराम देते है, अगले लेख से दूसरे रंगो से राब्ता जोड़ेंगे। बने रहिएगा।