क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 4 (पश्चिम भारत)

Sandeep Yash
MSMEs

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नमस्कार, क्लस्टर्स की वर्तमान सीरीज में हम आज देखेंगे की कैसे पश्चिमी भारत के क्लस्टर्स स्थानीय आर्थिक और सामाजिक विकास में एहम भूमिका निभा रहे है। वैसे इन क्लस्टर्स से आखिर फायदे हैं क्या।

– प्रौद्योगिकी, कौशल और गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच सुनिश्चित कर MSME सेक्टर का विकास करना
– स्वयं सहायता समूहों के मार्फ़त MSMEs की क्षमता में विस्तार करना
– MSME सेक्टर में बुनियादी ढांचे का विकास कर सुविधाओं का विस्तार करना
– परीक्षण, प्रशिक्षण, कच्चे माल भण्डारण, अपशिष्ट उपचार, उच्च उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए कॉमन फैसिलिटी सेंटर्स बनाना
– इस सेक्टर में पर्यावरण हितैषी तकनीक को बढ़ावा दे उपभोक्ताओं, समाज और देश के उच्च हितों की रक्षा करना

तो चलिए पुरसाहाल लेते हैं महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा में चल रहे क्लस्टर्स का।

प्रदेश क्लस्टर कारीगर / स्वयं सहायता समूह उत्पाद
       
महाराष्ट्र 18 2142/152 886
गुजरात 121 35183/2326 6054
गोवा  1 223/13 19
दामन  0 0 0


इनमें हाथ के काम वाले टेक्सटाइल उत्पाद, बांस और बम्बू के उत्पाद, घास और फाइबर से बनी वस्तुएं, ब्रास और ताम्बे की वस्तुएं, टेराकोटा और कागज़ के उत्पाद काफी मशहूर हैं। और पिछले कुछ बरसों में इन क्लस्टर्स की फेहरिस्त में कृषि उत्पाद एवं उपकरण, होज़री, पैकजिंग मटेरियल, सी फ़ूड, काजू,खाद्य एवं फल प्रसंस्करण, डिब्बाबंद और प्रसंस्कृत मछली, दाल,तेल और चावल मिल वगैरह आ जुड़े हैं। चलिए परिचय लेते हैं महाराष्ट्र के अंगूर क्लस्टर का।

उससे पहले आपकी जानकारी के लिए – क्या आपको पता है कि वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक उत्पादन में भारत की सब्ज़ी उत्पादन में 11 % और फल उत्पादन में 15%  हिस्सेदारी है। पर इसके निर्यात पक्ष की बात करें तो हमारा हिस्सा सब्ज़ी में कुल 1.7% और फलों में ये महज़ 0.5 % है। विशेषज्ञ इस दशा के लिए इस वजहों को ज़िम्मेदार मानते हैं

– अंतर्राष्ट्रीय परिवहन लागत का अन्य देशों की तुलना में 20-30 गुना अधिक होना। मसलन एक मेट्रिक टन अंगूर भारत से हॉलैंड भेजने में करीब 60 हज़ार रुपये लगते हैं जो चिली जैसे देशों की तुलना में तिगुना है

– बुनियादी ढांचे और भडारण के अभाव के चलते हमारे निर्यातक देश की सीमा से 1400 किलोमीटर के दायरे में ही अपनी सेवाएं नहीं दे पाते है.

–  खाद्य और कृषि संगठन(FAO) के आकड़ों के मुताबिक़ भारत में अपर्याप्त संसाधनों के चलते हॉर्टिकल्चर सेक्टर का करीब 40 % सालाना उत्पाद नष्ट हो जाता है।

– हमारे तमाम छोटे उत्पादक वैश्विक निर्यात बाजारों के खाद्य सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते

तो इस पृष्ठभूमि में देखते हैं कि हमारे महाराष्ट्र राज्य का अंगूर क्लस्टर कैसा काम कर रहा है – आपकी जानकारी के लिए, परंपरागत रूप से भारत में अंगूर की  बड़े पैमाने पर खपत घरेलू बाजार में ही होती है। पर फिर भी इसका निर्यात तेजी से बढ़ रहा है।

– 1971 में भारतीय अंगूर की वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी कुल 0.1 प्रतिशत थी।
– FAO  के मुताबिक़ 2005 तक इसका योगदान मात्रा में बढ़ कर 1.5 प्रतिशत और मूल्य में 1.2% हो गया था।

इसमें महाराष्ट्र राज्य ने महत्वपूर्ण और केंद्रीय भूमिका निभाई है। 1987/88 में इस राज्य में भारत के कुल अंगूर उत्पादन की 19.6 प्रतिशत पैदावार हुई थी। ये आंकड़ा 2002 में बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया। और 2005 में भारत से हुए निर्यात में राज्य के सबसे बड़े अंगूर उत्पादन क्षेत्र नासिक का 80 % हिस्सा था। एक नज़र डालते हैं इस क्लस्टर के विकास क्रम पर

– 1961 में राज्य भर के 25 अंगूर उत्पादकों ने महाराष्ट्र राज्य अंगूर उत्पादक संघ (MRDBS) बनाया था। इसका उद्देश्य खेती के तरीकों में सुधार करना था।
– 1970 के दशक तक ये एसोसिएशन देश -विदेश के वैज्ञानिकों से तकनीकी सलाह ले रहा था।
– इस दौरान एक बड़ा सुधार खेती प्रक्रिया में गिबरेलिक एसिड के इस्तेमाल से हुआ जिसे पैदावार में काफी वृद्धि हुई। पर ये एसिड स्थानीय रूप से उपलब्ध नहीं था। तो एसोसिएशन ने सरकार से अनुरोध कर आयात शुल्क घटा कर सदस्यों को इस रसायन की आपूर्ति कम लागत पर की। उन्नत खेती के तरीकों ने उत्पादन बढ़ाने में मदद की।
–  1985 में अंगूरों की कीमतों में गिरावट आई थी। इसकी प्रतिक्रिया में MRDBS ने सहकारी समितियों के गठन को बढ़ावा दिया जिससे मार्केटिंग तंत्र को बल मिल सके।
– इसी दौर में अंगूर किसानो ने अहमदाबाद, दिल्ली और कोलकाता जैसे देसी बाज़ारों के साथ साथ पश्चिम एशिया और यूरोप के बाज़ारों को खंगाला। इस कवायद में विदेशी बाज़ारों में संभावना नज़र आयी।
– महाराष्ट्र के अंगूर क्लस्टर को National Horticulture Board (NHB) और Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) से काफी सहारा मिला। इनकी स्थापना केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए की थी।
– 1991 तक ये साफ़ हो गया था की अंगूर कि किस्मो में सुधार कर और बेहतर value chain बनाकर निर्यात बाज़ार में भागीदारी काफी बढ़ाई जा सकती है। इन लक्ष्यों के चलते MahaGrapes नाम की संस्था का जन्म हुआ। ये PPP  मॉडल पर आधारित थी।

फिलहाल 1986 में एक किसान प्रयोग के तौर पर कुछ बक्से अंगूर इंग्लैंड ले गया था जहाँ इनको अच्छा भाव मिला और लगे हाथ नया बाज़ार मिला जो फिर बढ़ता गया। पर असल कामयाबी तब मिली जब सभी भागीदार एक साथ लक्ष्य की तरफ बढे। ये तजुर्बा बताता है कैसे क्लस्टर मॉडल सामूहिक लाभ हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। मसलन अगर MRDBS की बात करें तो इस संगठन से सदस्यों को तीन बड़े लाभ मिले – जैसे

– किसान कम लागत में गिब्रैलिक एसिड का निर्यात कर सके जिससे उच्च गुणवत्ता वाली अंगूर की फसले पैदा हुईं

– एक किसान के लिए बाज़ार का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल होता है। MRDBS इस बाबत अपने सदस्यों के लिए टूर्स प्रायोजित करता है। साथ ही APEDA जैसी राष्ट्रीय एजेंसियां भी बाजार अनुसंधान में किसानों की सक्रिय रूप से मदद कर रही हैं।

–  अपने स्वयं के अनुसंधान और दूसरे संस्थानों के समन्वय से MRDBS, महाराष्ट्र के क्लस्टर सदस्यों को value chain के अलहदा चरणों से जुडी जानकारी देता है।

1991 से MahaGrapes ने MRDBS की भूमिका को बल दिया है। इस संस्था का बुनियादी लक्ष्य उत्पादकों तक पहुंच कर अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाले अंगूर का पता लगाना; आकर्षक विदेशी बाजारों की पहचान करना; और आधुनिक तकनीक युक्त भंडारण मुहैया कराना है। ऐसा पहले नहीं था पर आज महाराष्ट्र अंगूर क्लस्टर के उत्पाद इसी ब्रांड के तहत मार्किट में आते हैं और आज अंतराष्ट्रीय बाज़ार में खासी साख बना चुके हैं। MahaGrape अपने सदस्यों के लिए ज्ञानाधार भी है। ये संस्था अंतराष्ट्रीय पेचीदे कानून और उनमें होते बदलावों से उन्हें रूबरू रखता है। इसमें यूरोप के GLOBALGAP जैसे कठिन मानक भी शामिल हैं।

MRDBS ने इस सेक्टर के विकास के लिए देश के कई प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि परिषद (ICAR) के साथ भी तालमेल बिठा रखा है। ये संस्थान महाराष्ट्र के अंगूर क्लस्टर को ज्ञान और अनुसंधान से पोस्ते हैं।  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर रिसर्च, (IIHR) पुणे इसका एक अच्छा उदाहरण है। ICAR और राज्य कृषि विश्वविद्यालय ने भी फसल और कटाई से जुडी तकनीक विकसित कर क्लस्टर विकास में सार्थक भूमिका निभाई है। इस फेहरिस्त में National Institute of Grapes भी एक नाम है। ये  संस्थान अंगूर के बागानों में शोध कर किसानो और निर्यातकों के बीच पुल का काम करता है।  इस सेक्टर के विकास के लिए MIDC, NHB, APFPEDA, जैसी एजेंसियां भी कार्यरत हैं।

आज इस क्लस्टर में 5979 विनयार्डस या अंगूर के बागान हैं जहाँ 4 किस्मे – थॉमसन, सोनाका, ब्लैक और फ्लेम उगाई जाती हैं। ये सारी किस्मे बीज रहित हैं। यहाँ 15 कोआपरेटिव सोसाइटीज हैं जिनमें 2500 सदस्य हैं। 2003 में इस क्लस्टर से 516. 53 मेट्रिक टन अंगूर इंग्लैंड, श्रीलंका, यूरोप और खाड़ी के देशों में भेजे गए थे। आज यहाँ से 100 -120 कंटनेर नियमित तौर पर विदेश जाते हैं। अब अंगूर के साथ साथ यहाँ से अल्फांसो आम और अनार का भी निर्यात होता है। फिलहाल संघर्ष और सफलता की इस कहानी को गति देने के लिए सरकार ने नासिक, सांगली, शोलापुर, सतारा और अहमदनगर में Agri- Export Zones स्थापित किये हैं। निर्यात के अलावा इस क्लस्टर में किशमिश का भी भारी मात्रा में उत्पादन होता है।

इसके अलावा पश्चिमी भारत का काजू क्लस्टर अपने बेहतर उत्पाद के लिए मशहूर है।  ये क्लस्टर कर्नाटक के चार ज़िलों – उडुपी, शिमोगा, चिकमगलूर और दक्षिण कन्नड़ में केंद्रित है। साथ ही अहमदाबाद का कॉटन क्लस्टर उत्पादन में देश में अव्वल स्थान पर है।

बताने को तो बहुत कुछ है पर वो फिर कभी।  इस लेख को यहीं विराम देते हैं।  अगली बार चर्चा करेंगे उत्तर भारत के क्लस्टर्स की।