क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 6 (उत्तर भारत)

Sandeep Yash
File photo: Small and medium enterprises in india

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नमस्कार, भारतीय क्लस्टर्स की श्रृंखला में आज बात करेंगे उत्तर भारत के 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बिखरे क्लस्टर्स की। यानी देश के सबसे बड़ा क्लस्टर समूह की। ये हैं  – उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, पंजाब,उत्तराँचल, जम्मू और कश्मीर और राजधानी दिल्ली

प्रदेश क्लस्टर कारीगर / स्वयं सहायता समूह उत्पाद
उत्तर प्रदेश 96 20256/1441 5145
राजस्थान 18 2485/192 813
हिमाचल प्रदेश 23 929/178 550
पंजाब 11 5892/256 432
उत्तराँचल 29 2488/202 901
हरियाणा 21 1586/139 764
जम्मू और कश्मीर 51 10933/877 1968
चंडीगढ़ NA NA NA
राजधानी दिल्ली 13 9364/416 602


अगर इन क्लस्टर्स के मशहूर उत्पादों की बात करें तो
दिल्ली – स्टेनलेस स्टील की कटलरी और बर्तन, केमिकल , बिजली के सामान, लेदर, प्लास्टिक और रबर के उत्पाद, पैकजिंग मटेरियल, फर्नीचर वगैरह
हरियाणा – साइंस के उपकरण, पॉवरलूम, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, रेडीमेड वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, मिक्सी -ग्राइंडर, कृषि उपकरण, प्लाईवुड, राइस मिल वगैरह
हिमाचल प्रदेश – खाद्य प्रसंस्करण , पत्थर खनन का काम, इंजीनियरिंग उपकरण वगैरह
जम्मू एवं कश्मीर – क्रिकेट के बैट, तेल और चावल की मिलें, टिम्बर /फर्नीचर का काम, स्टील रोलिंग  वगैरह
पंजाब – राइस मिल, सूत, पॉवरलूम, होज़री, खेल का सामान, रबर, लकड़ी और चमड़े का काम, मेडिकल और कृषि उपकरण, डीज़ल इंजन,साइकिल वगैरह
राजस्थान – संगमरमर के उत्पाद, नमकीन, केमिकल्स, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस, खाद्य प्रसंस्करण, चूने के उत्पाद, कीमती पत्थर के काम, वस्त्र वगैरह
उत्तर प्रदेश – फाउंड्री, लेदर, ग्लास, ब्रास, सिरेमिक उत्पाद, पॉवरलूम, इलेक्ट्रॉनिक एवं इंजीनियरिंग उपकरण, अत्तर, पैकजिंग मटेरियल, होज़री वगैरह
उत्तराँचल – सर्वे उपकरण, लघु वैक्यूम बल्ब, चावल की मिलें

चलिए चलते हैं मुरादाबाद के मशहूर ब्रास क्लस्टर में। मुरादाबाद जिला उत्तर प्रदेश का हिस्सा है। 19 वीं सदी की शुरुआत में मुरादाबाद में पीतल यानी ब्रास का उद्योग पनपा था जब यहाँ वाराणसी, आगरा, लखनऊ और कई अन्य स्थानों से आए कारीगरों ने पीतल के बर्तनों का काम शुरू किया था।  पीतल एक पीले रंग की धातु है जो सोने जैसी लगती है। यह धातु तांबा और जस्ता मिला कर बनायीं जाती है। आमतौर पर अनुपात 60:40 (तांबा: जस्ता) का रहता है। भारत से इस नायाब कला को ब्रिटिश शासक दुनिया के बाज़ारों में ले गए थे।

फिलहाल आज ये क्लस्टर भारत के लगभग 29% मेटलवर्क-कारीगरों का बसेरा है। यहाँ बने उत्पादों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है – पहली -जो सैंड कास्टिंग विधि से बनाये जाते हैं।  दूसरी -जिन्हें पीतल की चादरों से बनाया जाता है। मुरादाबाद में ब्रास की वस्तुएं कारखानों (निर्यातक इकाइयों), कार्यशालाओं (कारखानेदार इकाइयों) और घरेलु इकाईयों में बनायीं जाती है। पीतल पर बारीकी से उकेरे डिजाइन भारत की संस्कृति, विरासत, इतिहास और विविधता को प्रदर्शित करते हैं। इनमें हिंदू देवी-देवताओं से लेकर मुगल काल की चित्रकला शामिल है। 80 के दशक में यहाँ कारीगरों द्वारा पीतल के अलावा , तांबा, लोहा और एल्यूमीनियम पर भी काम शुरू किया गया। इस दौर में आयी तकनीक जैसे – इलेक्ट्रोप्लेटिंग, लैक्विरिंग, पाउडर कोटिंग उत्पादन को एक नए स्तर पर ले गयी। इस क्लस्टर को पंख लग गए।

मुरादाबाद को पीतल नगरी भी कहा जाता है। मुरादाबाद हस्तशिल्प निर्यात संघ के मुताबिक़ स्थानीय पीतल उद्योग का सालाना  कारोबार औसतन 15,000 करोड़ रुपये के आसपास है, जिसमें करीब 10,000 करोड़ रु तक का बड़ा हिस्सा निर्यात से आता है। इस समय जिले में करीब  5000 औद्योगिक इकाईयां हैं जो लगभग 10 लाख लोगों को रोजगार देती है। इनमें 600 निर्यातक इकाइयाँ भी हैं जिनसे लगभा 5 लाख कारीगर जुड़े हैं।  इस आर्ट मेटल वेअर क्लस्टर में बनी धार्मिक आकृतियां, मनुष्यों, पक्षियों और जानवरों की मूर्तियां, झूमर, लैंप शेड्स, विंड चाइम्स और यूटीलिटी वेयर जैसे कटलरी, जग, फूलदान, प्लांटर्स, फ़र्नीचर और ऐश ट्रे जैसी पीतल से बनी सजावटी वस्तुओं की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है।

अपने बारीक और उत्कृष्ट काम के लिए यहाँ के उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी और मध्य पूर्व एशियाई देशों के बाज़ारों में अपनी अलग पहचान रखते है। इस क्लस्टर में काम मुख्य रूप से तीन मौसमों – गर्मियों, बारिश और सर्दियों में होता है। प्रत्येक सीज़न में विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के अपने तय मानक होते हैं। जैसे गर्मियों में प्लांटर्स, बर्ड फीडर, बर्ड बाथिंग एक्सेसरीज की बिक्री ज़्यादा होती है।  वैसे ही बारिशों में कैंडल होल्डर, टी लाइट होल्डर, टेबल वेयर ज्यादा पसंद किए जाते हैं। सर्दियों में सजावटी वस्तुओं  जैसे – हिरण, क्रिसमस का सामान ज़्यादा बिकता है। इन तीन सत्रों के अलावा उद्यमियों को रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं के ऑर्डर भी मिलते हैं।

तो मोटे तौर पर अगर फायदे की बात करें तो ये क्लस्टर -निर्यात मुखी है, ये उत्तर प्रदेश जैसे हेंडीक्राफ्ट बाहुल्य राज्य की ब्रांड वैल्यू बढ़ाता है, अंतराष्ट्रीय बाज़ार में स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ाता है, अर्थव्यस्था को राजस्व देता है।  पर दूसरी तरफ, यहाँ सुधार की काफी गुंजाईश है मसलन – चीन जैसे देश बेहतर तकनीक और कम लागत के चलते बड़ी चुनौती हैं, मजदूरों के लिए पर्याप्त  सामाजिक और व्यावसायिक सुरक्षा की कमी है, कारीगरों का व्यवस्थागत तरीके से संचालन न होना, मार्केटिंग के मंचों की कमी होना, मजदूरों के एक बड़े तबके का बैंक अकाउंट न होना, कच्चे माल का सुलभ न हुआ, अंतराष्ट्रीय बाज़ार में कुल 2 % की भागीदारी होना (चीन का हिस्सा 30% है), एकीकृत हेंडीक्राफ्ट नीति का न होना, नए बाज़ारों की खोज न करना शामिल है।

फिलहाल रोजगार क्षमता, बाज़ार पर पकड़ और धनार्जन की प्रबल संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने 1999 -2002 की आद्योगिक नीति में पीतल नगरी को इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का दर्ज़ा दिया है और 2003 में यहाँ 421 एकड़ में SEZ बनाया गया है। सरकार इस कॉरिडोर को 24 घंटे बिजली देने के साथ साथ बुनियादी ढांचे के विकास की लक्षित व्यवस्था भी कर रही है। आज इस क्लस्टर की भारत से होने वाले कुल हैंडीक्राफ्ट निर्यात में 20% हिस्सेदारी है।

ऐसी ही अंतराष्ट्रीय पहचान और ब्रांडिंग पंजाब के लुधियाना जिले के ऊनी निटवेयर क्लस्टर की है। विशेषज्ञों के मुताबिक़ भारत का मेनचेस्टर कहे जाने वाले लुधियाना में निटवेयर उद्योग की शुरुआत 1902 के आस पास हुई थी। यहाँ पहली हस्त संचालित मशीने 1903 में आयात हुई थीं। इस उद्योग को बल मिला जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रक्षा बलों के लिए बुने हुए कपडे की ज़रुरत महसूस की गयी थी। पर इस क्लस्टर के विकास की गति आज़ादी से पहले तक काफी धीमी रही। फिर 1950 से 1980 के दशकों के मांग बढ़ी और यहाँ का निटवेयर उत्पादन कई गुना बढ़ा। पर 1980 के दशक और उसके बाद इस क्लस्टर का सही मायनो में बहुआयामी सफर शुरू हुआ।

आपकी जानकारी के लिए तमिलनाडु का तिरुपुर क्लस्टर कॉटन निटवेयर में अव्वल है पर ऐक्रेलिक और ऊनी निटवेयर में लुधियाना सबसे आगे है।आज इस क्लस्टर में करीब 14000 इकाईयां हैं जिनमे – 1400 मध्यम, 2800 छोटी और 9800 सूक्ष्म इकाइयां हैं। इनमें छोटी इकाइयां रिहायशी इलाकों में और मध्यम इकाईयां शहर के बाहरी इलाकों में काम कर रही हैं। इसके अलावा कुछ बड़ी इकाईयां सरकार द्वारा स्थापित 11 इंडस्ट्रियल एस्टेट्स में हैं। यहाँ कपडा बनाने में कई तरह के यार्न या धागे का इस्तेमाल  होता है। इनमें सूती, ऊन, एक्रिलिक, पॉलिएस्टर, नायलॉन और विस्कोस शामिल हैं। अधिकांश कच्चा माल स्थानीय रूप से उपलब्ध है। हालांकि, भारतीय ऊन की खराब गुणवत्ता के कारण आमतौर पर शुद्ध ऊन ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड या दक्षिण अफ्रीका से आयात किया जाता है। लेकिन ऐक्रेलिक यार्न का उपयोग यहाँ सबसे ज़्यादा है। 2005-06 में यहाँ 3100 करोड़ का उत्पादन हुआ जिसमे से 1000 करोड़ रुपये मूल्य के निटवेयर का निर्यात किया गया।

सरकारी मुताबिक़ ये क्लस्टर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 8 -10 लाख लोगों को रोजगार देता है। प्रत्यक्ष रोजगार में कुशल, अर्ध- कुशल और अकुशल श्रमिक शामिल हैं। अप्रत्यक्ष गतिविधयों में सिलाई, कढ़ाई, पैकिंग, खुदरा बिक्री और विपणन वगरैह आते हैं। इस क्लस्टर के होजरी उत्पादों का बाजार तीन भागों में बंटा है: –

-घरेलू बाजार – दिल्ली, अहमदाबाद, मुंबई, लखनऊ और कानपुर

– रक्षा बलों, पुलिस और सरकारी खरीद –

– वैश्विक बाजार –  मध्य पूर्व एशिया के देश, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका और उत्तरी अमेरिका, तिब्बत और नेपाल

आज इस क्लस्टर से सालाना करीब अठारह से बीस हजार करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है। यहाँ लगभग 100 घरेलु ब्रांड्स हैं।

पर समय के साथ ये क्लस्टर कुछ समस्याओं का सामना भी कर रहा है जैसे कि पुरानी पड़ चुकी तकनीक, बिजली और पूंजी की लागत में बढ़ोतरी, क्रेडिट तक सीमित पहुंच, खंडित होती इकाइयां, तटस्थत सूत नीति का न होना वगैरह।  इन समस्याओं को दूर करने और सहायता प्रदान करने के लिए सरकार कई योजनाओ पर काम कर रही है।

इनमें एकीकृत वस्त्र पार्क (SITP) योजना शामिल है जो कपड़ा इकाइयों की स्थापना के लिए विश्व स्तरीय बुनियादी सुविधाएं प्रदान करती है। साथ ही सरकार ने लुधियाना क्लस्टर के बुनाई और होज़री क्षेत्र के विकास के लिए एक अलग योजना शुरू की है जो उत्पादन में बढ़ावा देने में मदद करेगी।  पॉवरटेक्स स्कीम के तहत 2019 में सरकार ने इस सेक्टर के विकास को गति देने के लिए –

– बुनाई और होज़री उद्योग में सार्वजनिक निजी भागीदारी (PPP) मॉडल तर्ज़ पर नए सेवा केंद्रों का निर्माण करना

– मौजूदा रिसर्च लूम सर्विस सेंटर (PSCs) का आधुनिकीकरण

-ग्रुप वर्क शेड योजना

यार्न बैंक योजना

सामान्य सुविधा केंद्र

प्रधान  मंत्री क्रेडिट योजना

सौर ऊर्जा योजना

क्लस्टर्स के विकास के आईटी, जागरूकता  अभियान, बाजार विकास और प्रचार वगैरह की शुरुआत की है

साथ ही यहाँ अंतराष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शनी केंद्र का निर्माण भी शामिल है जिससे स्थानीय व्यापार को बल मिलेगा। आज इस क्लस्टर में देश के 95 % ऊनी होज़री का उत्पादन होता है। इसे काम को स्थानीय उद्यमियों की तीसरी पीढ़ियां आगे बढ़ा रही है। बताना तो बहुत कुछ है पर सीमित समय के चलते ये फिर कभी।

चलते चलते – अगले लेख में चर्चा करेंगे इस सेक्टर को प्रभावित करती प्रमुख नीतियों और कानूनों की।