क्लस्टर बुनते कल का भारत -भाग 8 (बेलगाम का फाउंड्री क्लस्टर)

Sandeep Yash
File photo: Steel industry

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नमस्कार,  भारत में बरास्ते MSME क्लस्टर्स नयी अर्थव्यवस्था के पाए मजबूत करने के प्रयास जारी हैं।  पिछले लेखों में हमने चर्चा की हेंडीक्राफ्ट, हैंडलूम और  कृषि उत्पाद आधारित क्लस्टर्स की। आज कहानी आगे बढ़ाते हैं और अगले कुछ लेखों में जायज़ा लेते हैं औद्योगिक या इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स का। विकसित देशों में इन्हें इंडस्ट्रियल डिस्ट्रिक्स भी कहा जाता है। फिलहाल भारत में इनकी बात करें तो सरकार का ध्यान तीन बिंदुओं पर है – इन क्लस्टर्स को आधुनिक तकनीक से लैस करना, कम ब्याज पर पर्याप्त पूँजी सरलता से उपलब्ध कराना और बाज़ार ढूंढने में मदद करना।

ये लेख लिखते वक़्त एक ज़रूरी तथ्य सामने आया- अभी हाल में सरकार ने MSMEs की परिभाषा में बदलाव किये। इसके चलते देश की करीब 99% उद्योगिक इकाईयां MSME सेक्टर में आ गयी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक़ अब इस सेक्टर में निवेश और कारोबार का लक्षित विकास सीधे अर्थव्यवस्था की सेहत और मजबूती से जुड़ गया है। तो कहानी आगे बढ़ाते है और चलते हैं बेलगाम के फाउंड्री क्लस्टर में।

बेलगाम कर्नाटक राज्य के उत्तर में बसा एक जिला है जो अपने फाउंड्री उद्योग के लिए जाना जाता है। बेलगाम में फाउंड्री उद्योग की शुरआत 1940 के दशक में हुई जब स्थानीय कृषि उपकरणों को बनाने के लिए पहला कारखाना यहाँ लगाया गया था। मशीन टूल्स, डीजल तेल इंजन, इलेक्ट्रिक मोटर्स और पंप सेट की   कास्टिंग की मांग के चलते ये उद्योग 1950 और 1960 के बीच यहाँ तेजी से विकसित हुआ। इसको बल मिला पुणे के आसपास के पनपते ऑटोमोबाइल उद्योग और बैंगलोर में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों जैसे भेल और एचएमटी की स्थापना से।

पर पिछले चार दशकों से यहाँ की फाउंड्री इकाईयां बुनियादी सुविधाओं और उन्नत परीक्षण सुविधाओं के अभाव, प्रदूषण की समस्या और पुरानी तकनीक के चलते बढ़ नहीं पा रही थीं। फिर बेलगाम के उद्यमियों ने इसका भी हल ढूंढ निकाला।

2004 में सरकार की मदद से बेलगाम फाउंड्री क्लस्टर का गठन हुआ। इसका मक़सद ज़िले में मौजूद फाउंड्रीज को संगठित करना, उनके विकास के लिए विश्व स्तर के बुनियादी ढांचे को तैयार करना, उत्कृष्टता और दक्षता को प्रोत्साहन देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना। इस प्रोत्साहन का नतीजा ये रहा कि करीब डेढ़ दशक की कम वक़्त में ही बेलगाम फाउंड्री क्लस्टर कर्नाटक में नंबर 1 और भारत की कास्टिंग बिरादरी में पहले 10 उत्पादकों में अपना स्थान बना चुका है। इस क्लस्टर में छोटी, मध्यम और बड़ी -160 से अधिक फाउंड्रीज हैं जो उद्योगबाग औद्योगिक एस्टेट, बीईएमसी आईईएल एस्टेट और मैकचे औद्योगिक एस्टेट में काबिज़ हैं। अगर इन्हें उत्पादन क्षमता के आधार पर बाँटें तो


उत्पादन (टन प्रति माह)  फाउंड्रीज
600-700 10
300-400 20
100-150 60
100 से नीचे 70


TERI की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यहाँ
– प्रति दिन कास्टिंग का उत्पादन लगभग 1,250 टन है
– सालाना उत्पादन लगभग 0.36 मिलियन टन है
– ये क्लस्टर करीब 7,500 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है
– इसका अनुमानित सालाना टर्नओवर लगभग 2000 करोड़ रू है

आज के दौर में बेलगाम क्लस्टर में ज़्यादातर इकाईयां कास्ट आयरन कास्टिंग बनाती हैं पर इधर SG आयरन कास्टिंग का हिस्सा बढ़ा है। लगभग 30 इकाईयां स्टील कास्टिंग बनाती हैं। उद्योग के आधार पर अगर इस क्लस्टर को बाटें तो

उद्योग कास्टिंग
मोटर वाहन / तेल इंजन 31%
पंप्स / वाल्व 21%
इलेक्ट्रिक मोटर्स 10%
ट्रैक्टर / कृषि उपकरण 7%
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग 5%
अन्य 26%


यहाँ उत्पादन प्रक्रिया (production process) के 7 चरण हैं जिनमें – mould sand preparation, charge preparation, melting, pouring, knockout
और finishing शामिल हैं। कोयला और विद्युत् यहाँ ऊर्जा के मुख्य स्त्रोत हैं और कपोला सबसे ज़्यादा इस्तेमाल में होने वाली भट्टी (furnace) है। यहां हर चार फाउंड्री में से तीन कपोला का उपयोग करते हैं। अधिकांश कपोला पारंपरिक डिजाइनों पर आधारित हैं जिनमें एश कोक का इस्तेमाल होता है। पर अब धीरे धीरे बिजली की भट्टियों का चलन बढ़ रहा है। साथ ही ये देश का अकेला ऐसा क्लस्टर है जहाँ हर महीने 10,000 टन थर्मल सैंड, ग्रीन सैंड, CO2 / सिलिकेट सैंड और नो-बेक सैंड (रेत) को परिष्कृत करने की भी सुविधा है।

तो देश में बढ़ते औद्योगीकरण के चलते ऐसी फाउंड्रीज की भूमिका और बाज़ार -दोनों बढ़ रहे हैं। बीते बरसों में दुनिया के कई देशों ने फाउंड्री ऑपरेशन बंद कर दिया है, इसके चलते ऐसे क्लस्टर के सामने अंतराष्ट्रीय बाजार में भी जगह बनाने के सुनहरे मौके सामने आये हैं। और पिछले कुछ बरसों से बेलगाम क्लस्टर का औसत सालाना निर्यात भी 350 करोड़ रू तक हो गया है। इतना ही नहीं, आज बेलगाम की करीब 20% फाउंड्री यूनिट्स को ISO 9000 certification और export casting की मान्यता मिली है।

तो जनाब आज देश में 5 फाउंड्री क्लस्टर्स और लगभग 5000 फाउंड्री यूनिट्स हैं। इनमें से करीब 95% MSME सेक्टर में आती हैं। इनका सालाना उत्पादन करीब 75 लाख टन हैं। और इनसे करीब 5 लाख लोगों को सीधे रोजगार मिलता है। उत्पादन के लिहाज से भारत (करीब 13 %) दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। हमारा सालाना निर्यात लगभग 3.5 बिलियन डॉलर है। The Institute of Indian Foundrymen के अध्यक्ष संजय श्रॉफ साफ़ कहते हैं की अगर सरकार इस सेक्टर के तकनीकी और कौशल विकास को प्राथमिकता दे तो अगले एक दशक में ही ये आकड़ा बढ़ कर 15 बिलियन डॉलर तक हो सकता है और भारत वैश्विक बाजार के 10% हिस्से पर काबिज़ हो सकता है।

फिलहाल विशेषज्ञ ”आत्मनिर्भर भारत” कार्यक्रम में इस सेक्टर की प्रबल भूमिका देख रहे हैं।

चलते चलते – अगले लेख में चर्चा करेंगे खुर्जा के पॉटरी क्लस्टर की।

यहाँ पढ़ें:  क्लस्टर्स बुनते कल का भारत -भाग 7 (नीतिगत और कानूनी नज़रिये से) https://bit.ly/3jiu1ZM