क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 10 (सूरत का डायमंड क्लस्टर)

Sandeep Yash
Representative: Diamond processing

Representative: Diamond processing

नमस्कार, RSTV की अखिल भारतीय क्लस्टर सीरीज में आज चर्चा करेंगे एक ऐसे समूह की जो मुद्दतों से सम्पन्नता और समृद्धि का द्योतक माना जाता रहा है। जी हाँ, हम आज बात कर रहे है diamond processing सेक्टर की जिसमे सूरत क्लस्टर अव्वल है, न सिर्फ देश में बल्कि साऱी दुनिया में। तो कहानी शुरू करते हैं, इतिहास के कुछ पन्ने खोलते हैं। आपकी जानकारी के लिए 1725 तक भारत दुनिया का अकेला क्षेत्र था जहाँ कच्चे हीरे का खनन होता था। ये सिलसिला टूटा जब ब्राज़ील में इसकी खानें मिली।

तो 16 शताब्दी से सूरत अंतराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र रहा है। अरब सागर किनारे बसे गुजरात राज्य के इस शहर के बाज़ार में मोती, मूंगा, माणिक, हीरे, सफेद नीलम और कीमती पत्थर, तांबा, हाथी दांत, आभूषण, अनाज, चीनी, अफीम, इंडिगो इत्र, तेल, साबुन, फर्नीचर, चिंट्ज़ और अर्ध-कीमती पत्थर आते और बिकते थे। यहाँ के बंदरगाह में ईरान, वर्तमान बांग्लादेश के चाका, कोंकण, मालाबार, श्रीलंका, बर्मा: पूर्वी अफ्रीका, अरब और फारस की खाड़ी के साथ-साथ यूरोप से भी जहाज़ तिजारत करने आते थे।

मध्य 20 वी सदी में यहाँ के gem & jewellery सेक्टर ने आकार लेना शुरू कर दिया था। सूरत में हीरा प्रसंस्करण उद्योग यानी diamond processing industry के इतिहास को पड़ोसी शहर नवसारी के साथ जोड़ा जा सकता है। 1938 में, नवसारी में ही देश का पहला हीरा तराशने का कारखाना 65 श्रमिकों के साथ शुरू किया गया था। आज़ादी के बाद ये सेक्टर तेज़ी से आगे बढ़ा।आपकी जानकारी के लिए भारत में कच्चे हीरे का खनन शताब्दियों से होता रहा है पर व्यवस्थित तौर पर इसके प्रसंस्करण, कटाई और चमकाने का काम 1962 के बाद में जाकर सूरत और नवसारी जैसे सेंटर्स पर शुरू हुआ था। 1970 के दशक की शुरुआत में सूरत में लगभग 100 G &J इकाइयाँ थीं जिनसे करीब 500 कारीगर जुड़े थे।

हीरा शुद्ध कार्बन होता है जिसे सँवारने का तरीका काफी दिलचसप है। देखते हैं एक कच्चे हीरे का ”A Diamond is forever” तक का सफर।

पहला कदम – कच्चे हीरे को आकार देने की योजना : इसका सटीक होना ज़रूरी है। यही तैयार हीरे का आखिरी मोल तय करती है।  इसी वजह से हीरे का आकार ऐसे चुना जाता है जिससे बर्बादी कम से कम हो और पत्थर का अधिकतर हिस्सा काम आये। आमतौर पर सटीक माप के लिए कच्चे हीरे को सरीन मशीन से मैप किया जाता है। फिर उससे मिले डेटा को एक कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर में फीड कर 3 डी मॉडल तैयार किया जाता है जो कटर (कारीगर) को सही योजना /आकार बनाने में मदद करता है।

दूसरा कदम – क्लीविंग प्रक्रिया : इसमें रफ डायमंड के टुकड़े किये जाते हैं। फिर कटर इन टुकड़ों पर काम करता है। इस स्टेज में टुकड़ों को आकार देने के लिए लेज़र और मशीनी आरी का भी इस्तेमाल होता है।

तीसरा कदम – स्पिनिंग एक्सल मशीन में लगे दो इंडस्ट्रियल डायमंड या लेज़र के माध्यम से रफ डायमंड को गोलाकार बनाना। जान लीजिये हीरा दुनिया में पाया जाने वाला सबसे मजबूत खनिज है जिसे गढ़ना एक मुश्किल काम है। फिलहाल इस प्रक्रिया को brutting कहते हैं

चौथा कदम – स्पिनिंग व्हील से गोलाकार हो चुके हीरे को पॉलिश करना, आयाम देना : इससे हीरा बहुआयामी, चिकना और चमकदार होता है। इसमें दो चरण और होते हैं
1. Blocking – एक सिंगल कट डायमंड बनाने के लिए 8 क्राउन, 1 कुलेट और 1 टेबल फ़ैसेट बनाये जाते है
2. Brillianteering – इस चरण में  Brillianteer (विशेषज्ञ) कुल 57 आयाम बनाता है। ये बहुत बारीक और जिम्मेदारी का काम  है क्यूंकि इसी स्तर पर हीरे की चमक और धमक – दोनों तय होती है।

पांचवां कदम –  पॉलिशड डायमंड का निरीक्षण /क्वॉलिटी कण्ट्रोल : इस अंतिम चरण में विशेषज्ञ ये सुनिश्चित करते हैं कि तैयार डायमंड तयशुदा मानकों के अनुरूप है या नहीं। अगर ज़रुरत हुई तो इसे दोबारा पॉलिशिंग के लिए भेजा जाता है।

गुजरात सरकार की जेम एंड ज्वेलरी सेक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक़ आज सूरत क्षेत्र में करीब 10 हज़ार diamond processing units हैं। इनमें हीरे की 12 में से 10 किस्मों पर काम होता है। इन इकाइयों से लगभग 7 लाख लोग सीधे जुड़े हुए हैं। प्रत्येक इकाई की प्रसंस्करण क्षमता 4 से 400 कैरेट तक होती है पर इनकी उत्पादन क्षमता हीरे की किस्म, आकार और कारीगरों के कौशल पर निर्भर करती है। यहाँ ज़्यादातर छोटी इकाईयां हैं जिनमें औसतन 30 कारीगर काम करते हैं और इनकी कैपेसिटी 4 कैरट तक प्रसंस्करण की होती है। 1990 के दशक के बाद से यहाँ की ज़्यादातर यूनिट्स में आधुनिक तकनीक का चलन बढ़ा है।

फिलहाल आज सूरत डायमंड उद्योग क्लस्टर का सालाना कारोबार लगभग 1 ख़रब रूपए का है। देश के 90% डायमंड्स यहीं छांटे और सँवारे जाते हैं। सूरत क्लस्टर लगभग 30 हज़ार करोड़ रुपये कीमत के कच्चे हीरे का सालाना आयात करता है जो ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन यूनियन के देशों से आते हैं।  परिष्कृत हीरों के सबसे बड़े बाजार अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व एशिया के देश हैं। पर इस बरस कोविद आपदा के चलते आयत और निर्यात-दोनों की गति कुछ धीमी पड़ी है। विशेषज्ञों के अनुंसार ये बाजार दिसंबर, 2020 के बाद फिर रफ़्तार पकड़ेंगे।

आपकी जानकारी के लिए शुरुआत में सूरत क्लस्टर को व्यापार बढ़ाने के लिए मुंबई पर निर्भर रहना पड़ता था। फिर इस समस्या को दूर करने की नियत से सरकार ने कई ज़रूरी कदम उठाये – जैसे

–    सूरत डायमंड ट्रेडिंग एक्सचेंज : इसकी स्थापना 1994 में हीरे के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए की गयी।
–    डायमंड इंडस्ट्रियल पार्क -: इसकी शुरुआत एक को-आपरेटिव के तौर पर की गयी थी पर बाद में इसने एक कंपनी का रूप ले लिया। इस पार्क में 1 हज़ार फर्मो के लिए समान व्यावसायिक सुविधाएं उपलब्ध है। ये पार्क कुल 270 एकर क्षेत्र में बना है। इसमें 100 एकर का EPZ भी शामिल है।
–   1966 में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए The Gem & Jewellery Export Promotion Council (GJEPC) बनाया गया। इसका काम- व्यापार को प्रोत्साहित करना, सरकार को सलाह देना, भारत में  Kimberly Process Certification Scheme की नोडल एजेंसी के तौर पर काम करना, ट्रेनिंग एवं शोध की ज़िम्मेदारी संभालना और मीडिया के लिए सूचना स्त्रोत के तौर पर काम करना है
–   Surat Diamonds Cutters Association : यह एसोसिएशन व्यापार, वाणिज्य और निवेश से जुड़े मामलों में सरकार से उद्योग की ओर से पैरवी करता है।
–   Diamond Development Board (DDB) : गुजरात सरकार द्वारा शुरू किये गए इस बोर्ड का मक़सद कपडा मिलों से निकाले गए कर्मचारियों को हीरे की कटाई का प्रशिक्षण देना है ताकि वो इस पेशे को अपना पर रोज़ी कमा सकें।

फिलहाल कोविद महामारी के कड़वे दौर के बाद आज इस क्लस्टर में ज़िन्दगी पटरी पर लौट रही है। Surat Hira Bourse ने जून के आखिरी हफ्ते में 10 शिपमेंट का निर्यात किया है। Surat SEZ की 8 इकाईयों में भी काम शुरू हो चूका है। GJEPC के चेयरमैन प्रमोद अग्रवाल कहते हैं कि इस सेक्टर में आज 1 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का बैकलॉग है जिसकी जल्द डिलीवरी ज़रूरी है वर्ना ये बिज़नेस चीन या थाईलैंड के पास जा सकता है। यहाँ महामारी से पैदा हुए हालात के चलते कच्चे हीरे के आयत पर अस्थायी तौर पर रोक लगी है जिससे पुरानी इन्वेंटरी खपा कर व्यापार संतुलन बनाये रखा जाए।

फिलहाल, वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक़ जेम एंड ज्वेलरी निर्यात में हीरे की लगभग 80 %  हिस्सेदारी है और डायमंड पॉलिशिंग में 95% विश्व बाजार हमारा है यानी हर 15 में से 14 हीरे भारत में ही वजूद अख्तियार करते हैं। Polished diamonds के निर्यात में भी भारत का 75% हिस्सा है।  विशेषज्ञ इस सेक्टर की सेहत बनाये रखने के हामी है।  IBEF रिपोर्ट (2020) के मुताबिक़

–  ये सेक्टर बड़े स्तर पर निवेश आकर्षित कर रहा है और सरकार ने इसमें आटोमेटिक रूट से 100% विदेशी निवेश की अनुमति दे रखी है।
–  2019 में सरकार ने Gem and Jewellery Domestic Council बना कर इस पूरे उद्योग को एक छतरी के नीचे ला खड़ा किया है।
–  सरकार, अगले 5 बरसों में इस सेक्टर का निर्यात लक्ष्य 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़ा कर 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर रख रही है।
– केंद्रीय बजट 2019-20 में  जॉब वर्क के माध्यम से सेवाओं के लिए GST दर 18% से घटाकर 5 % कर दी गयी है
– प्रोविशनल आकड़ों के मुताबिक़ 2020 में भारत, अमेरिका को अब तक 18. 66 अरब डॉलर के cut and polished डायमंड निर्यात कर चुका है
– 2019-2023 तक G &J बाजार आकार 103.06 बिलियन डॉलर तक बढ़ जाएगा, ऐसा ये रिपोर्ट कहती है
– इस सेक्टर का भारत की GDP में करीब 7% का योगदान है

DPIIT के मुताबिक़ इस सेक्टर में अप्रैल 2000 -मार्च 2020 के बीच 1.17 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया। इसके अलावा ये सेक्टर देश के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है। सूरत डायमंड क्लस्टर मॉडल इसका ठोस सबूत है।

जाते जाते – अगले लेख में चर्चा करेंगे भुबनेश्वर सी -फ़ूड प्रोसेसिंग क्लस्टर की।

यहां पढ़ें: क्लस्टर बुनते कल का भारत -भाग 8 (बेलगाम का फाउंड्री क्लस्टर) https://bit.ly/30vNzRE