क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 11 (भुबनेश्वर का सी-फ़ूड क्लस्टर)

Sandeep Yash
Representative Image: Sea food processing

Representative Image: Sea food processing

नमस्कार, हमारी क्लस्टर सीरीज जारी है। आज बात होगी ओडिसा के भुबनेश्वर Sea food processing क्लस्टर की। पर फिल्म से पहले उसकी भूमिका देखते हैं

– तटीय भारत क्षेत्र में मछली- एक ज़माने से खाने की थाली का एहम हिस्सा रही है।
– भारत में संगठित मछली उद्योग 20 वीं शताब्दी की शुरुआत से फलने-फूलने लगा था।
-1950 के दशक तक मत्स्य विभाग की स्थापना ओडिशा सहित कई तटीय राज्यों में हो गयी थी। इसका मक़सद घरेलू मांग को पूरा करना और मत्स्य क्षेत्र
को एक मजबूत व्यापार विकल्प के रूप में स्थापित करना था।
–  इसी दशक के अंत तक हुए तकनीकी विकास ने aquaculture और sea food processsing उद्योग की शक्ल बदल डाली। उसे रफ़्तार दी।

तो जनाब, इस क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के तेज़ विकास के पीछे तीन बड़ी वजह रही है
पहली – राष्ट्रीय स्तर पर मत्स्य पालन में वृद्धि और पकड़ का बेहतर उपयोग
दूसरी –  विकसित देशों के साथ उच्च मूल्य उत्पाद और विकासशील देशों के साथ कम मूल्य के मछली व्यापार को प्रोत्साहन

एक सुनियोजित व्यवस्था के चलते प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की स्थापना लैंडिंग सेंटर्स यानी तटीय क्षेत्र में की गयी जिससे पकड़ी गयी मछलियों को तत्काल संरक्षित किया जा सके। नतीजतन आज लगभग 95% समुद्री खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ 9 राज्यों के 20 बड़े क्लस्टर्स में चल रही हैं।

तो चलिए लौटते है ओडिसा की ओर। इस राज्य के पास 480 किलोमीटर लम्बा समुद्र तट है और समुद्री मछली पकड़ने का पुराना इतिहास भी। 1949 में कटक ज़िले में एक “Pond Culture Division” की स्थापना की गई थी। वर्तमान में ओडिसा में संसाधित (processed) होने वाली प्रमुख प्रजातियों में टाइगर प्रॉन और ब्राउन झींगा शामिल हैं। अकेले भुवनेश्वर में लगभग 39 कोल्ड स्टोरेज हैं और यह देश के महत्वपूर्ण समुद्री खाद्य प्रसंस्करण केन्द्रों में से एक है।

IPICOL के आकड़ों के मुताबिक इस क्लस्टर में
– 43 रजिस्टर्ड निर्यातक हैं जिनमें से 26 सक्रिय हैं।
– क्लस्टर में 21 प्रसंस्करण संयंत्र हैं। इनमें से 16 सक्रिय हैं
– लगभग 10 मर्चेंट एक्सपोर्ट मौजूद हैं, जो अपने कारोबार के लिए दूसरे एक्सपोर्टर्स की प्रोसेसिंग फैसिलिटीज का इस्तेमाल करते हैं।
– पटिया और मणेश्वर औद्योगिक क्षेत्र में 12 प्रसंस्करण संयंत्र लगे हैं जबकि पारादीप में इनकी संख्या 3 हैं

और ज़ाहिर है कि मछली ही यहाँ कच्चा माल होती है। Shrimp यानी झींगा मछली इस क्लस्टर का प्रमुख उत्पाद है।  यहाँ की यूनिट्स में उत्पादन, सीजन पर निर्भर करता है। सीजन यानी वो महीने जब मछली समुद्र में पकड़ी जाती है। यहाँ ये काम मई से दिसंबर के बीच में होता है। इस पीरियड में उत्पादन सालाना औसत का लगभग 160% होता है। जनवरी से अप्रैल तक ऑफ सीजन होता है जब उत्पादन 25% तक ही रह जाता है।

इस क्लस्टर में मुख्यतः ready -to cook उत्पाद बनते है। इसके अलावा यहाँ कुछ यूनिट्स ready to eat वैरायटी भी बनती हैं।उत्पादन के लिहाज से यहाँ की यूनिट्स को तीन वर्गों में बांटा जाता है

– Category A (Small) –     उत्पादन क्षमता – 50 टन / माह,    रोज़गार क्षमता –  लगभग 100,          सालाना कारोबार -लगभग 25 करोड़ रू /वर्ष
– Category B (Medium) – उत्पादन क्षमता – 150 टन /माह,   रोज़गार क्षमता –लगभग 200,         सालाना कारोबार – लगभग 70 करोड़ रू /वर्ष
– Category C (Large)    – उत्पादन क्षमता – 750 टन / माह,  रोज़गार क्षमता – लगभग 500,           सालाना कारोबार – लगभग 200 करोड़ रू /वर्ष

यहाँ की ज़्यादातर यूनिट्स पहली केटेगरी में आती है। इस क्लस्टर का प्रति दिन औसत उत्पाद 110 टन है जिसमें टाइगर प्रॉन और वाइट लेग झींगा का 90% हिस्सा है। बाकी 10 % में दूसरी प्रजातियां आती हैं। Falcon Marine, Magnum Sea Foods, Surya Udyog और Teekay Marines.इस क्लस्टर के कुछ बड़े नाम हैं।  तो चलिए अब देखते हैं कि यहाँ कच्चा माल कितने चरणों से गुज़र कर मुकम्मल होता है। आपकी जानकारी के लिए इस उद्योग में सारा काम वातानुकूलित परिवेश में होता है

पहले – कच्चे माल की आवक – आये माल को फैक्ट्री के गेट पर ही कुशल कर्मियों द्वारा चेक किया जाता है। इसके तहत मछली की बास, रंग, बनावट, सफाई,
प्रजातियों की एकरूपता और ताज़गी वगैरह आंकी जाती है। फिर चुने हुए माल की एक विशेष वाशिंग टेबल पर धुलाई की जाती है। धुलाई के बाद इसे फ्लैक आइस के कंटेनर्स में सहेज दिया जाता है। इस कंटेनर का तापमान 0°C से +4°C.के बीच रखा जाता है।

दूसरा – झींगा को साफ़ करना – इसमें beheading, gutting, skinning और trimming शामिल है। ये काम एक स्टील टेबल पर फ्लैक आइस के बीच में ही   किया जाता है। 1 टन मछली के लिए औसतन 2 टन फ्लैक आइस का इस्तेमाल होता है। इस ज़रुरत को पूरा करने के लिए हर यूनिट में आइस प्लांट्स लगाए गए हैं।  बहरहाल, मछली को फिर पानी से धोकर फ्लैक आइस के कंटेनर्स में स्टोर कर दिया जाता है।  इस पूरे प्रोसेस में 1 टन मछली को साफ़ करने के लिए लगभग 5 टन पानी का इस्तेमाल होता है।

तीसरा – ग्रेडिंग – इस चरण में  झींगा मछली के आकार और जाति के हिसाब से ग्रेडिंग या वर्गीकरण किया जाता है।  A केटेगरी की यूनिट्स में ये काम हाथों से होता है जबकि B और C यूनिट्स में यही काम ग्रेडिंग मशीन करती हैं। जान लीजिये झींगा का आकार ही उसकी कीमत तय करता है।

चौथा – फ्रीजिंग – ग्रेडिंग के बाद चुना हुआ माल इस स्टेज पर आता है। फिर बाज़ार की मांग के मुताबिक़ झींगा को थोक में या फिर अलहदा फ्रीज किया जाता है। यूरोप के बाजार के लिए बने उत्पाद को IQF मशीन में -40* में सहेज दिया जाता है। यूरोप को निर्यात करने वाली इकाइयां में 2 से 3 IQF मशीन होती हैं।

पांचवां – लेबलिंग और पैकिंग – फ्रीजर में झींगा की सतह अत्यधिक सूख सकती है। इससे बचाव  ग्लेज़िंग की जाती है। ग्लेज़िंग जमी हुई झींगा पर बर्फ की सुरक्षात्मक कोटिंग होती है। ग्लेज़िंग के बाद उत्पादों को डिब्बाबंद कर लेबल लगाए जाते हैं।

छठवां – कोल्ड स्टोरेज – पैकिंग के बाद उत्पाद को डिस्पैच होने तक कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है। यहाँ अधिकांश कोल्ड स्टोरेज अमोनिया बेस्ड हैं जिनमे तापमान को  -18* या उससे नीचे रखा जा सकता है।

सातवां – डिस्पैच – कोल्ड स्टोरेज से उत्पाद  first-in-first-out के हिसाब से बाहर भेजे जाते हैं। यहाँ रखे उत्पाद 10 महीने तक सुरक्षित रहते हैं। हालांकि इन्हें आम तौर पर तीन महीने के भीतर ही डिस्पैच कर दिया जाता है। इस क्लस्टर में Category A यूनिट्स की कुल भंडारण क्षमता लगभग 150 टन है; Category B यूनिट्स की 450 टन और Category C यूनिट्स की 750 टन है।

तकनीक इस क्लस्टर के विकास की बुनियाद में है। आप जानते हैं कि पकडे जाते ही मछली तेज़ी से ख़राब होना शुरू हो जाती है। इसे फ़ौरन फ्रीज़ करना ज़रूरी होता है। यहाँ इसके मद्देनज़र 3 फ्रीजिंग तकनीक का इस्तेमाल होता है – ब्लास्ट फ्रीजर, प्लेट फ्रीजर और IQF फ्रीजर।  लक्ष्य सिर्फ एक है – सही उत्पाद बाजार और ग्राहकों तक पहुंचना।  ऊर्जा की बात करें तो इस क्लस्टर में मुख्यतः बिजली का इस्तेमाल होता है, कुछ इकाईयां डीजल का भी इस्तेमाल करती है।

तो Seafood Exporters Association of India के अध्यक्ष कमलेश मिश्रा के मुताबिक़ ओडिसा का sea food export सेक्टर 2018 -2019 में वैश्विक मंदी के बावजूद 3000 करोड़ रू का आकड़ा पार कर चुका है। स्थानीय सरकार भी इस सेक्टर में उत्पादन और निर्यात को प्रोत्साहित कर रही है।  पिछले ही बरस ओडिसा में 107 खारे पानी के aquaculture क्लस्टर्स को मंज़ूरी मिली है। इनमें से 19 को प्रथम चरण में विकसित किया जा रहा है। साथ ही satellite imageries के माध्यम से 3000 हेक्टेयर ऐसी भूमि चिन्हित की गयी है जिस पर aquaculture शुरू किया जा सकता है। फिलहाल ओडिसा के sea food की पूर्वी यूरोप, जापान, चीन, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों और यूरोप के बाज़ारों पर अच्छी पकड़ है। सरकार अब नए बाज़ार तलाशने पर भी ध्यान दे रही है।

झींगा की प्रबल निर्यात क्षमताओं को देखते हुए केंद्र सरकार भी MPEDA जैसी एजेंसीज के माध्यम से देश के अन्य भागों में झींगा पालन की संभावनाएं तलाश रही है। मसलन देश में इस वक़्त करीब 4 मिलियन हेक्टेयर जलीय मुहाने हैं, इनमें 1.2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है जहाँ पानी खारा है और झींगा फार्मिंग के लिए उपयुक्त है। साथ ही उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में भी ऐसी 9 मिलियन हेक्टेयर भूमि को चिन्हित किया गया है जिसमे लवण की मात्रा ज़्यादा है। इस पर भी काम हो रहा है। आज देश में 39 Brackish water Fish Farmers Development Agencies (BFDAs) हैं जो तटीय मत्स्य उत्पादन और aquaculture के विकास में लगी हैं। .

FAO के आकड़े भी भारत के fisheries -aquaculure सेक्टर की जीवंतता का सबूत देते हैं

– सिर्फ 6 दशकों में, 1950 -51 से 2011 -12 के बीच इसने ग्यारह गुना प्रगति की है, 0.75 मिलियन टन से 8.3 मिलियन टन तक।
– आज इसकी सालाना विकास दर 4.5 % है।
– दुनिया भर की प्रजातियों में से 10% भारत में पायी जाती हैं
– ये सेक्टर करीब 1.5 करोड़ लोगों को रोजी देता है। 2012 -13 में इस सेक्टर ने देश के लिए 3. 51 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित की थी

जाते जाते – वाणिज्य मंत्रालय के 2019 के आकड़ों के मुताबिक़ भारत का sea food निर्यात में चौथा, aquaculture में दूसरा और मत्स्य उत्पादन में दूसरा स्थान रहा। हमारा कुल मरीन उत्पाद निर्यात 7 अरब डॉलर रहा।  तो आज ये सेक्टर देश को पोषण सुरक्षा, निर्यात को बढ़ावा और रोजगार सृजन के लिए मजबूत मंच दे रहा है। आपकी जानकारी के लिए

–   भारत की समुद्र तट सीमा लगभग 8129 किलोमीटर है
–   Exclusive economic zone – 2.02 million sq.km
–   Continental Shelf – 0.506 million sq.km

ये हमारी ताक़त हैं। उत्तर कोविड काल में ये सेक्टर हमारे युवा उद्यमियों को आमंत्रण और उज्जवल भविष्य -दोनों दे रहा है। देखिये, सोचिये और मन बनाइये।

अगले लेख में चर्चा होगी  तिरुपुर के सूती क्लस्टर की

यहां पढ़ें: क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 10 (सूरत का डायमंड क्लस्टर)

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