क्लस्टर बुनते कल का भारत -भाग 12 (तिरुपुर का सूती क्लस्टर)

Sandeep Yash
Representative image: Silk weaving

Representative image: Silk weaving

नमस्कार , क्लस्टर पर चल रही लेखों की इस सीरीज के दो मुख्य मक़सद हैं -पहला, इसके माध्यम से देश के तमाम भागों में चल रहे MSME उद्योग और उनके उत्पादों से आपका परिचय कराना और दूसरा कहीं ये भी बताना की आप भी इनका भाग बन सकते है, रोज़गार सृजन कर सकते हैं,आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में अपनी उद्यमशीलता के मार्फ़त योगदान दे सकते हैं।  तो चलिए आज बात करते है तिरुपुर कॉटन क्लस्टर की। तमिलनाडु राज्य के कोयंबटूर शहर के पास बसी इस रिहाइश में देश का सबसे बड़ा सूती वस्त्र क्लस्टर है।

तिरुपुर क्लस्टर की जड़ें औपनिवेशिक काल में हैं। दक्षिण की कपास बेल्ट के बीच में बसा था ये इलाका निटवियर निर्माण उद्योग के लिए स्वाभाविक स्थान था। 1925 में यहाँ कॉटन या कपास बुनाई का पहला कारखाना खुला था। 1930 के दशक में आसपास के शहरों में बुनाई कारखानों में हुई लंबी हड़तालों का फायदा भी तिरपुर को मिला, उस दौर में यहाँ तमाम नयी निटवेयर यूनिट्स खुली थीं। इनमें सफ़ेद बनियान बना करती थीं। मान्यता थी कि यहां का पानी कपास की सफाई और धागों की सफेदी में वृद्धि करता है। 1940 के दशक में घरेलू मांग बढ़ने के साथ साथ ये क्लस्टर बढ़ता चला गया। फिर 1970 के दशक में एक इतालियन परिधान निर्माता सस्ते निटवेयर की खोज में तिरुपुर आया। इसके साथ सफर शुरू हुआ तिरुपुर क्लस्टर के निर्यात उत्पादों का। 1980 के दशक तक यहाँ से वस्त्र निर्यात में काफी बढ़ोतरी हो चली थी।

पुरुषों की बनियान से शुरू हुआ ये सफर टी-शर्ट, बच्चे के कपडे और पुरूषों की सूती शर्ट्स तक पहुंच चुका था। आइये देखते हैं कि एक महज़ कपडे का टुकड़ा यहाँ वस्त्र का आकार लेने तक कितने चरणों से गुज़रता है

पहला – कताई मिलें – यहाँ कपास से धागे बनते है
दूसरा – मशीनें बुन्याई कर इन धागों को कपड़ा रोल में बदल देती हैं
तीसरा – इस चरण में रंगाई और ब्लीचिंग कर पहले कपड़ों को सफ़ेद रंग दिया जाता है फिर दूसरे रंगों में ढाला जाता है
चौथा – कॉम्पैक्टिंग और कैलेंडरिंग प्रक्रिया – इस प्रक्रिया में कपड़े को सूखा कर सीधा किया जाता है, सिलवटें हटाई जाती हैं
पांचवां – हाथ या मशीन से कपड़ा तय डिज़ाइन में काटा जाता है
छठां – सिलाई कर कपड़ों को वस्त्र की शक्ल दी जाती है
सांतवां – फैब्रिक प्रिंटिंग – इस चरण में स्क्रीन प्रिंटिंग के माध्यम से डिज़ाइन प्रिंट की जाती है
आठवां –  आर्डर मुताबिक़ कपडे पर कढ़ाई की जाती है
नवां – लेबलिंग – तय ब्रांड के लेबल कपड़ों पर सिले जाते हैं
दसवां – जाँच प्रक्रिया – छेद, खरोंच, बदरंग, सिलाई की त्रुटियों को जांचा जाता है
ग्यारवां – आयरनिंग प्रक्रिया – कपड़ों को इस्त्री किया जाता है
बारवां – पैकिंग और शिपमेंट – कपड़ों को व्यवस्थित किया जाता है, हर पीस को पॉलिथीन कवर में डाल कर कार्डबोर्ड बॉक्स में पैक किया जाता है। फिर  कंटेनर और शिपमेंट में लोड कर दिया जाता है।

चलिए अब देखते हैं TERI की रिपोर्ट स्थानीय यूनिट्स की उत्पादन क्षमता और संचालन के बारे में क्या कहती है

यूनिट्स  संचालन के आधार पर वितरण औसत उत्पादन क्षमता (TPA)
सिलाई और परिष्करण 15% NA
रंगाई 18% 4500
संकुचन 8% 2500
बुनाई 23% 2500
कढ़ाई 31% NA
ब्लीचिंग 5% 750


जान लीजिये देश के कुल सूती वस्त्र निर्यात में तिरुपुर क्लस्टर का करीब 50% योगदान है। इसके अलावा घरेलु बाजार में भी इस क्लस्टर का खासा दखल है। यहाँ एक दिलचस्प बात आपको बताते हैं। इस क्लस्टर का इंजन निर्यातक ही चलाते है पर इनका अपना कोई ब्रांड नहीं होता है। ये तबका विकसित देशों के ब्रांड मार्केटर्स से आर्डर लाता है। यहाँ की स्थानीय यूनिट्स को डिज़ाइन, फैब्रिक और धागा तक मुहैया कराता है। यूनिट्स को भुगतान चरणों के हिसाब से होता है। फिर तैयार माल तय शर्तों के मुताबिक़ ग्राहक /इम्पॉर्टिंग फर्म को भेज दिया जाता है। आज ये क्लस्टर करीब 6 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और लगभग 10 लोगों को अप्रत्यक्ष रोज़गार देता है। यहाँ के सूती वस्त्र उत्पाद अपनी अच्छी क्वालिटी के चलते देश – दुनिया के तमाम जाने माने ब्रांड्स  का आधार बन चुके हैं। इस बात की प्रबल सम्भावना रहती है की जिस विदेशी टीशर्ट ब्रांड को आप शान से पहन रहे हैं उसके धागों में अपने तिरुपुर के कारीगर का पसीना लगा हो।  फिलहाल यहाँ के उत्पाद
– 10% डिपार्टमेंटल स्टोर्स को
– 60 % आयातकों को
– 10 % कैटेलॉग स्टोर्स को
– 5% रिटेलर्स को
– 5% कंस्यूमर ब्रांड्स को जाते हैं

फिलहाल 80 का दशक खत्म होते होते यहाँ के निटवेअर उद्योग में बदलाव भी आये हैं।  पहले जहाँ वसंत और गर्मियों के मौसम के लिए कपडे बना करते थे,  वहीँ अब इस रेंज में सर्दियों के कपड़ों ने भी जगह बना ली है। पोलर फ्लीस और ब्लेंडेड फैब्रिक्स का चलन बढ़ा है। आज इस क्लस्टर में ऊनी कपड़ों की कुल उत्पादन में करीब 20% हिस्सेदारी हैं। विकसित देशों में बढ़ती मांग के कारण इसमें लगातार इजाफा हो रहा है। इसमें बाहरी कपड़ों, यानी कार्डिगन, जर्सी, पुलओवर, महिलाओं के ब्लाउज, कपड़े, स्कर्ट, पतलून, नाइटवियर और स्पोर्ट्सवियर का निर्माण और निर्यात शामिल है। बच्चों और महिलाओं के कपड़ों का सेगमेंट कुल कारोबार का 70% हिस्सा है।  समुद्र पार -अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तिरुपुर के प्रमुख निर्यात बाजार हैं।

कच्चे माल की बात करें तो – यहाँ विभिन्न मोटाई के सूती धागे – कोयम्बटूर, सलेम, इरोड, और पास की कताई मिलों से आते हैं। बटन, ज़िप, लेस और सिलाई धागे स्थानीय स्टोर्स से ही मिल जाते हैं।  इसी तरह डाइज और रसायन जो मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र में बनते हैं, स्थानीय बिक्री डिपो और डीलरों के माध्यम से उपलब्ध हैं।

किसी भी औद्योगिक क्लस्टर की तरह तिरुपुर की यूनिट्स भी संचालन के लिए ऊर्जा पर निर्भर हैं। यहाँ ऊर्जा के प्रमुख ऊर्जा स्रोत – बिजली, जलाऊ लकड़ी, भट्ठी का तेल, एचएसडी, नारियल की भूसी और एलपीजी हैं। ऊर्जा स्रोतों का उपयोग यूनिट्स के संचालन, कार्यरत उपकरणों और उत्पादन के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। इस क्लस्टर में बड़ी संख्या में टेक्सटाइल यूनिट्स इलेक्ट्रिकल और थर्मल दोनों तरह की ऊर्जा का इस्तेमाल करती हैं। कंप्यूटर डिज़ाइन,  सिलाई और फिनिशिंग यूनिट्स इसका अपवाद हैं। यहां ईंधन यानी फ्यूल का उपयोग मुख्य रूप से बॉयलर, फ्लुइड हीटर, हीट सेटिंग, स्टेंटर्स और स्टोव में किया जाता है। जबकि बिजली का इस्तेमाल ब्लोअर, पंप, एयर कम्प्रेसर, मशीन ड्राइव वगैरह में होता है। फिलहाल यहाँ ऊर्जा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल डाइंग यानी रंगाई इकाइयों में होता है, कुल ऊर्जा खपत का 87% फ़ीसदी तक।

आज MSME मंत्रालय के मुताबिक यहाँ

– गारमेंट निर्यात की 800 यूनिट्स है
– 1200 मर्चेंट एक्सपोर्टर्स है
– घरेलु बाजार के लिए परिधान निर्माण की 1800 यूनिट्स हैं
– कपडा बुनाई की 700 यूनिट्स हैं
– 425 रंगाई यूनिट्स हैं
– 3085 सहायक, परिष्करण और एम्ब्रायडरी यूनिट्स हैं
– 23 व्यापार एवं उद्योग संघ और 38 बैंक है

कारोबार के बात करें तो Tirupur Exporters Association के अध्यक्ष राजा षणमुगम के मुताबिक़ 2019 में इस क्लस्टर ने
– 50,000 करोड़ रू का सालाना कारोबार किया जिसमे 24000 करोड़ रुपये घरेलु बाज़ार से आये
–  निर्यात 8.3% की दर से बढ़ा और कुल कारोबार 26000 करोड़ रू का रहा
– राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात विकास दर 4.7 % रही

फिलहाल, इस क्लस्टर ने 2022 तक 100, 000 करोड़ रू का बिज़नेस टारगेट रखा है। इसमें घरेलु बाज़ार और निर्यात दोनों शामिल है।

जाते जाते – भारत के क्लस्टर मैप पर तिरुपुर महत्वपूर्ण स्थान रखता है – इसका लघु उद्योग चरित्र बनाये रखने के लिए सरकार समय समय पर कदम उठाती रहती हैं। यहां बड़ी इकाईया लगभग ना के बराबर है। सरकारी प्राथमिकता की बात करें तो – स्थानीय इकाईयों को सरल ब्याज पर क़र्ज़ मुहैय्या कराना, इन्हें आधुनिक तकनीक से लैस करना और कौशल विकास करना सबसे ज़रूरी है। इस काम में Small Industries Development Bank of India (SIDBI, Tiruppur), District Industries Centre (DIC, Tiruppur District), Apparel Export promotion Council (AEPC, Tiruppur), Textiles Committee (Tiruppur) और Micro Small and Medium Enterprise Development Institute (MSME-DI, Coimbatore) एहम भूमिका अदा कर रही है।
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यहाँ पढ़ें: क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 11 (भुबनेश्वर का सी-फ़ूड क्लस्टर) https://bit.ly/32C67Ta


अगले लेख में चर्चा करेंगे जोरहट, असम के चाय क्लस्टर की