क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 13 (जोरहट का चाय क्लस्टर)

Sandeep Yash
File photo: Tea garden in Assam

File photo: Tea garden in Assam

नमस्कार, आज लेखन थोड़ा मुश्किल हो रहा है, बाहर बारिश हो रही है, पत्तियां, पेड़ सब नहा रहे हैं, मुस्कुरा रहें हैं – और कहीं बहुत पीछे हम भी बचपन दोबारा जी रहे हैं, भीग रहे हैं, हरी घास पर जमे मटमैले पानी में गोता लगा रहे हैं। तब किसे परवाह होती थी कि आसमां से बिजली भी गिरती है। निर्भय, बेलौस होता है बचपन। खैर, ऐसे मौसम में एक प्याला चाय की सख्त दरकार थी, मिली, फिर जाकर कलम चली – सोचा आज चाय पर ही बात चीत हो जाए।  हमारे देश में सबसे अच्छी चाय उत्तर पूर्व क्षेत्र की मानी जाती है। असम के जोरहट चाय क्लस्टर पर नज़र गयी और कहानी आगे बढ़ी।

पुराने दस्तावेज़ों के मुताबिक़ भारत में 750 ईसा पूर्व से चाय पीने का प्रचलन रहा है। 16 वीं शताब्दी में लहसुन और तेल के साथ चाय की पत्तियों को मिलाकर एक सब्जी बनाने का भी ज़िक्र मिलता है। हालांकि, देश में चाय की व्यावसायिक स्तर पर खेती का श्रेय अंग्रेजों को जाता है।  इन्हें चाय की आदत थी।  ये चाय चीन से खरीदी जाती थी। 1750 तक ये खरीद बढ़कर लाखों पाउंड की हो चुकी थी। इतिहासकार कहते हैं कि भले ही अंग्रेज इसे कुछ हद तक अफीम के व्यापार से संतुलित कर लेते थे पर उन्होंने पाया कि ये शौक निहायत महंगा और गैरव्यवहारिक है। इसी अहसास के चलते अंग्रेजों ने चीन में गुप्त रूप से चाय उत्पादन की प्रक्रिया को समझा, वहां से बीज लाये और दार्जीलिंग तथा असम में चाय की खेती शुरू की। बीच का सिलसिला कुछ ऐसा था।

–   1774 की शुरुआत में बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने चाय के पौधे के कुछ बीज, रोपण के लिए भूटान में  ब्रिटिश राजदूत जॉर्ज बोगल को भेजे।

– प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री सर जॉन बैंक्स का भी मानना था कि अंग्रेजों को भारत में चाय की खेती करनी चाहिए। बता दें कि इन्हें 1776 में चाय पर नोट्स बनाने का काम सौंपा गया था।

– ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना रेजिमेंट के कर्नल रॉबर्ट किड ने 1780 में कलकत्ता के वनस्पति उद्यान में चीनी बीजों को रोपने की कोशिश की थी। आज इस उद्यान को इंडियन बॉटनिकल गार्डन के नाम से जाना जाता है।

-1823 में, स्कॉटिश खोजकर्ता रॉबर्ट ब्रूस ने ब्रह्मपुत्र घाटी में एक देशी चाय की प्रजाति की खोज की थी। स्थानीय सिंघो जनजाति इसकी पत्तियों को उबाल कर पीती थी। ये महत्वपूर्ण सूचना असम के रईस मणिराम दीवान ने जुटाई थी। आगे चल कर मणिराम, असम में चाय की निजी खेती करने वाले पहले भारतीय बने।

–  पर इस देसी प्रजाति को पहचान देने से पहले ही रॉबर्ट ब्रूस की मृत्यु हो गई।  फिर उनके भाई चार्ल्स अलेक्जेंडर ब्रूस ने 1834 में कलकत्ता के बॉटनिकल गार्डन में इसके नमूने भेजे। गहन खोजबीन के बाद इसे चीनी चाय प्रजाति का करीबी सम्बन्धी पाया गया और Camellia sinensis var Assamica (Masters) Kitamura.का नाम दिया गया।

तो आधिकारिक तौर पर भारत में चाय का जन्म असम में हुआ।  शुरूआती दौर में में अँगरेज़ यहाँ की चाय को सम्मान की नज़रों से नहीं देखते थे पर फिर जब  ये पाया गया कि चीनी प्रजाति असम की उमस भरी गर्मी में परवान नहीं चढ़ रहीतो उनके पास असमिया प्रजाति को प्रोत्साहित करने के अलावा कोई और चारा न था। 1838 में असम चाय के 12 डिब्बों की पहली खेप टेस्ट के तौर पर लंदन गयी थी। फरवरी 1839 में लंदन में पहली जॉइंट स्टॉक टी कंपनी – असम कंपनी बनायीं गयी।  इसके बाद जॉर्ज विलियम्सन और जोरहट टी कंपनी बनी।

आज लगभग दो शताब्दियों बाद असम चाय के काले दानो से नामालूम कितने घरों की दिनचर्या शुरू होती है। असम में …

– दुनिया की सबसे बड़ी चाय बागान श्रृंखला है
– असम – श्रीलंका या केन्या जैसे देशों से भी ज़्यादा काली चाय का उत्पादन करता है
– 780 टी एस्टेट्स टी बोर्ड के साथ रजिस्टर्ड हैं, साथ ही यहाँ लगभग 1 लाख छोटे चाय बागान हैं
– 684654 स्थायी एवं अस्थायी श्रमिक इन टी एस्टेट्स से जुड़े थे (PIB -2015 data)
– राज्य में 527 एस्टेट्स फैक्ट्रीज, 197 बीएलएफ, 1 कॉप, 1 इंस्टेंट टी फैक्ट्री है
– औसत उत्पादन लगभग 630 मिलियन किलोग्राम है
– असम के 27 जिलों में फैले, लगभग 50,000 छोटे उत्पादक हैं
– असम में देश की 51% और दुनिया की 1/6 चाय पैदा होती है
– गुवाहाटी का टी- ऑक्शन सेंटर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सेंटर है
– असम में करीब 304,400 हेक्टेयर भूमि पर चाय बागान है (Tea Board Report -2013)

चलिए अब असम के जोरहट चाय क्लस्टर से रूबरू होते हैं। ये क्लस्टर जोरहट और गोलाघाट ज़िले में फैला है। चाय एक  मौसमी उत्पाद है। चाय की पत्तियों की plucking और processing के लिए पीक सीज़न वसंत (मार्च-अप्रैल) से शरद ऋतु के अंत तक (अक्टूबर-नवंबर) है। सर्दियों में जब उत्पादन बंद रहता है तब बागानों को काटा -छाटा जाता है। चाय कारखानों की मरम्मत और रखरखाव पर ज़ोर होता है।  TERI की रिपोर्ट के मुताबिक़

इस क्लस्टर में
– 150 MSME यूनिट्स हैं
– ब्लैक टी की कई किस्में बनती हैं खासकर CTC चाय
– सालाना औसत उत्पादन और कारोबार – करीब 100,000 टन (95% CTC Tea)
– ईधन – विद्युत्,  कोयला , नेचुरल गैस

यहाँ की MSME यूनिट्स को तीन भागों में बांटा जा सकता है
पहला – प्लांटेशन के आधार पर – यहाँ कई बागानों के पास चाय  प्रसंस्करण के अपने कारखाने हैं। कई कारखाने (BLTF) सीधे चाय बागानों से कच्चा माल खरीद कर पीने लायक चाय बनाते हैं। कच्चा माल मतलब चाय के पौधे के सबसे ऊपर से तोड़ी गयी दो कोमल हरी पत्तियां और कली होती है

दूसरा – उत्पादन के आधार पर –  मुख्यतः  CTC या orthodox tea

तीसरा – उत्पादन क्षमता के आधार पर –  a. 5 लाख किलो से कम सालाना उत्पादन वाली छोटी फैक्ट्रीज  b. 5-15 लाख किलो सालाना उत्पादन वाली मीडियम इंडस्ट्री   c. 15 लाख किलो से ज़्यादा का सालाना उत्पादन करने वाली बड़ी फैक्ट्रीज .

जोरहट क्लस्टर में तीनो तरह की यूनिट्स हैं।
– 43% मीडियम यूनिट्स
– 27% छोटी यूनिट्स
– 30% बड़ी यूनिट्स है

और चूंकि चाय की पत्ती का मिज़ाज मौसम से जुड़ा होता है, इससे उत्पादन में काफी उठक पटक होती है -मसलन एक यूनिट जिसकी सालाना उत्पादन क्षमता अगर 10 लाख किलो है, तो वो पीक सीजन में 10 हज़ार किलो प्रति दिन भी बना सकती है। और ऑफ सीजन में यही क्षमता घट कर 1 हज़ार किलो प्रति दिन भी हो सकती है। आपकी जानकारी के लिए पीक सीजन में यहाँ 24 घंटे काम चलता है क्यूंकि हरी पत्तियों को स्टोर नहीं किया जा सकता है।

तो अब एक नज़र डालते है चाय बगान से हमारे प्याले तक के सफर पर

– चाय बगानो से तोड़ी गयी पत्तियां ट्रकों द्वारा फैक्ट्री में लायी जाती हैं
– इन्हें तमाम सपाट ट्रे में फैला कर गर्म हवा द्वारा सुखाया जाता है
– हरी पत्तियों में 80% नमी होती है, सुखाने के दौरान ये लगभग 20% तक कम हो जाती है
– फिर ये पत्तियाँ बरास्ते कन्वेयर बेल्ट्स, रोलिंग यूनिट्स तक पहुँचाती हैं। यहाँ इन्हें कुचला जाता है जिससे एन्ज़इम्स बाहर आते हैं
– अगले चरण में इन्हें नमी भरे ड्रम्स में भर कर धीमी गति से घुमाया जाता है ताकि fermentation की प्रक्रिया को बल मिल सके
–  Fermentation से गुज़र कर चाय की पत्ती लाल /भूरे रंग की हो जाती है, organic acids और दूसरे अवांछनीय तत्व हाशिये पर चले जाते हैं
–  इससे वांछित रंग, गंध और स्वाद हासिल होता है, इस चरण तक पत्तियों में 65% नमी बचती है
–  Fermentation के बाद साफ, गर्म हवा से पत्तियों को सुखाया जाता है ताकि नमी को 3% तक लाया जा सके
–  पत्तियों को सुखाने की प्रक्रिया ही चाय की गुणवत्ता, विशिष्टता और बाजार में मोल तय करती है

इसी मूल प्रक्रिया में कुछ फेरबदल के साथ यहाँ ब्लैक टी, टी -डस्ट, ग्रीन टी और आर्गेनिक टी का उत्पादन होता है। इस क्लस्टर से चाय अमरीका, कनाडा, यूरोप, मद्य -पूर्व एशिया, इंग्लैंड, रूस, न्यूज़ीलैंड जापान, चीन, अफ्रीका जैसे बाज़ारों में बड़ी तादाद में जाती है -पी और सराही जाती है। दुनिया में बड़ी साख है यहाँ की चाय की।

वैसे हमारा चाय उद्योग मुद्दतों से भारत को विश्व में एक अनूठी पहचान देता आ रहा है पर वक़्त के साथ साथ यहाँ कई समस्याएं भी उभरी हैं जैसे – पैदावार में गिरावट, चाय की झाड़ियों का बुढ़ाना, बरसों तक नए पौधों का न रोपा जाना, ख़राब बागान प्रबंधन, गिरती गुणवत्ता, तय समय पर पेमेंट न होना, बढ़ता क़र्ज़ और स्वामित्व विवाद।  निदान के तौर पर सरकार ने 2016 से कई ज़रूरी कदम उठाये है – टी बोर्ड ने छोटे उत्पादकों को बागानों के नवीनीकरण और मशीनीकरण के लिए मदद का बीड़ा उठाया है, उत्पाद संगठनों को विस्तार और नए कारखानों के लिए वित्तीय सहायता देना, मिनी कारखानों की स्थापना करना, कार्यशाला / प्रशिक्षण आयोजित करना, बागानों में जैविक खेती को बढ़ावा देना इसमें शामिल है। असम को इन कामो के लिए 2016 -17 से 2019 -20 के बीच 1765 करोड़ रू की सहायता राशि दी गयी है। आपकी जानकारी के लिए Tea Board की स्थापना section 4, Tea Act, 1953 के तहत की गयी थी। टी बोर्ड में एक अध्यक्ष और 31 सदस्य होते हैं जो भारत सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। इनमें प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों के प्रतिनिधि, सांसद,और चाय उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

साथ ही District Green Leaf Price Monitoring Committee (DGLPMC) की स्थापना सभी चाय उत्पादक जिलों में की गयी है।  जिला कलेक्टर / उपायुक्त इसके मुखिया होते है। इस समिति का काम छोटे चाय उत्पादकों को औसत बिक्री मूल्य दिलाना होता है। इसका न्यूनतम बेंचमार्क हर महीने तय होता है। चाय बागान श्रमिकों के कल्याण के लिए Plantation Labour Act के प्रावधानों को को भी राज्य सरकार मजबूती से लागू कर रही है।  2019 में ”Act East Policy” के तहत असम के लिए पहली निर्यात नीति बनी है।  इससे चाय जैसे प्रमुख निर्यात को पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में बल मिलेगा।

अगर देश की बात करें तो आपकी जानकारी के लिए

– 1853 में भारत ने औपचारिक तौर पर पहली बार 183 टन चाय निर्यात की थी। 1870 में ये आकड़ा 6700 टन था और 1885 तक ये बढ़ कर 35,274 टन हो गया था
– 1947 से अब तक देश में चाय उत्पादन 250% से ज़्यादा बढ़ा है और चाय बागानों के क्षेत्र में 40% की वृद्धि हुई है।
– 2014-15 में भारत का कुल चाय उत्पादन 1,197.18 मिलियन किलोग्राम तक पहुंच गया था। इसमें उत्तर भारत की करीब 80% और दक्षिण भारत की 20%
हिस्सेदारी थी।
– चाय उत्पादन में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है पर कुल उत्पादन का 70% हिस्सा घरेलु बाजार में ही खप जाता है
–  केन्या, चीन और श्रीलंका के बाद भारत चाय का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक है
– और असम और दार्जीलिंग के कामयाबी के बाद चाय के बागान आज उत्तर में कुमाऊं, देहरादून, गढ़वाल, कांगड़ा घाटी और कुल्लू – और दक्षिण में
नीलगिरि क्षेत्र में देश -दुनिया के लिए चाय पैदा कर रहे हैं।   .

सनद रहे – DGCIS के मुताबिक़ 2019 में भारत ने लगभग 830 मिलियन डॉलर मूल्य की चाय निर्यात की थीं जबकि इसी बरस कुल उत्पादन करीब 1339 मिलियन Kg रहा।

तो चलते चलते – हिंदी के जाने माने कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय ने एक प्याला चाय में जीवन का दर्शन ही खोज निकला।  देखिये क्या कहते हैं मालवीय जी

एक चाय की चुस्की, एक कहकहा
अपना तो इतना सामान ही रहा
चुभन और दंशन पैने यथार्थ के
पग-पग पर घेर रहे प्रेत स्वार्थ के
भीतर ही भीतर मैं बहुत ही दहा
किंतु कभी भूले से कुछ नहीं कहा
एक अदद गंध एक टेक गीत की
बतरस भीगी संध्या बातचीत की
इन्हीं के भरोसे क्या-क्या नहीं सहा
एक चाय की चुस्की एक कहकहा

तो बरसात के इस मौसम में चाय का हर प्याला, दे दूर किसी को शाम का निवाला, हर प्याला है तिजारत, हर प्याला है बरकत, दे ताज़गी, बदले नजरिया सारा।

पिछला अंक यहाँ पढ़ें: क्लस्टर बुनते कल का भारत -भाग 12 (तिरुपुर का सूती क्लस्टर) https://bit.ly/3hykVXe

अगले लेख  में चर्चा करेंगे  पानीपत के कम्बल क्लस्टर की।