क्लस्टर बुनते कल का भारत – भाग 1

Sandeep Yash
File photo: Small and medium enterprises in india

File photo: Small and medium enterprises in india

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ICC, कोलकाता के 95 वे प्लेनरी सेशन को सम्बोधित किया। इस सम्बोधन में उन्होंने आने वाले कल की दशा और दिशा की तरफ बड़ा इशारा करते कहा  –
”हर विपदा में अवसर छिपे होते हैं”
”कोरोना वायरस जनित संकट ने भारत को आत्मनिर्भर बनने का मौका दिया है”  .

उन्होंने कहा की वक़्त आ गया है जब देश के हर गांव और ज़िले को आत्मनिर्भर बनना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए उन्हें कहा कि इसका सबसे सरल तरीका है कि भारतीय अपने उत्पादों का उपयोग बढ़ाएं और अन्य देशों के बाज़ारों में भारतीय उत्पादों की हनक बनायें। इसके लिए उन्होंने क्लस्टर आधारित विकास मॉडल पर ख़ास ज़ोर दिया। वर्तमान हालात में जब बड़ी संख्या में श्रमिक घर लौटे हों,तो इस मॉडल की प्रासंगिकता बढ़ जाती है क्यूंकि  स्थानीय श्रम, कौशल और संसाधन क्लस्टर मॉडल की बुनियादी संरचना का हिस्सा हैं। जान लीजिये कि प्रधानमंत्री इस क्षेत्र से 5 ख़राब डॉलर अर्थव्ययस्था के लक्ष्य (2025) में कम से कम 50 % तक योगदान देख रहे हैं। चलिए, इस मॉडल की परतें खोलते हैं।

UNIDO की परिभाषा के मुताबिक़ क्लस्टर एक क्षेत्रीय और भौगोलिक बुनावट है जहाँ एक जैसे हालात में समान उत्पाद और सेवाओं की उत्पत्ति होती है। एक क्लस्टर में चल रही यूनिट्स – बाजारों, तकनीकों, श्रम कौशल और क्रेता-विक्रेता तंत्र को साझा करती है। हालांकि भारत में क्लस्टर्स का इतिहास मुद्दतों पुराना है, पर इसे कुछ दशक पहले ही औपचारिक जामा पहनाया गया है।

भारत में क्लस्टर्स का विकास
– विशेषज्ञों के मुताबिक़ 1991 में आयी उदारीकरण नीति से MSME सेक्टर को खासा नुक्सान हुआ था क्यूंकि प्रतिस्पर्धा से जूझने के लिए तब न तो इस क्षेत्र के पास  ज़रूरी आकार था, न तकनीक और न ही ज़रूरी सरकारी सहयोग। उदारीकरण से पहले इस सेक्टर की वार्षिक विकास दर 91.06 % थी -उदारीकरण के बाद ये घट कर महज़ 16.81% रह गयी थी। इस सेक्टर को संजीवनी को सख्त ज़रुरत थी। तो इसकी विराट संभावनाओं को देखते हुए 1995 में आबिद हुसैन कमेटी बनायीं गयी, 1997 में आयी इस कमेटी की रिपोर्ट ने छोटे उद्योगों के विकास के लिए क्लस्टर मॉडल की वकालत की थी। इसकी ज़मीन पहली से ही देश भर में फैले छोटे उद्योगों ने तैयार कर रखी थी।

– 1996 : उद्योग मंत्रालय ने UNIDO को SSI समूहों की मैपिंग करने, चुने हुए समूहों में पायलट परियोजनाओं को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय क्लस्टर विकास कार्यक्रम तैयार करने का अनुरोध किया था।

–  1998 :UPTECH (scheme for technology up-gradation and management) लांच की गयी। 2003 में इस योजना को SICDP (Small Industry Cluster Development Programme) का नाम दे दिया गया।

–  2001-02 : संभावित हस्तशिल्प समूहों के विकास के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर स्वास्थ्य विकास योजना (BAHVY) बनी

–   2005 में Foundation for MSME Clusters (FMC) बनी

– 2006-07 : सरकार ने क्लस्टर विकास मॉडल के मार्फ़त औद्योगिक शहरों को उर्जित करने और नई औद्योगिक टाउनशिप बनाने की बात कही।

– 2007: Small Industries Cluster Development Programme (SICDP) का नाम बदलकर Micro and Small Enterprises Cluster Development Programme (MSE-CDP) कर दिया गया। इस बार लक्ष्यों का फलक फैलाते हुए प्रौद्योगिकी, कौशल और गुणवत्ता में सुधार, बाजार और पूँजी को MSMEs की स्थिरता और विकास दर से जोड़ा गया।

पर सबसे ज़रूरी सुधार इस क्षेत्र में MSMEd Act 2006 द्वारा हुआ।  ये एक्ट इसी बरस 16 जून को लागु हुआ था। ये अकेला अधिनियम था जिसने इस क्षेत्र में पसरे तमाम कानूनों को एक छत्री के नीचे ला खड़ा किया। ऐसे कानून की लम्बे समय से ज़रुरत महसूस की जा रही थी। इसका मक़सद छोटे उद्योगों को एक मुकम्मल कानूनी ढांचा प्रदान करना था जैसा कि आबिद हुसैन समिति और एस पी गुप्ता के स्टडी ग्रुप ने अपनी सिफारिशों में कहा था। इस अधिनियम ने तेज़ी से बढ़ते MSME क्षेत्र में उत्पाद और सेवाएं -दोनों की ज़रूरतों और चिंताओं को मंच दिया। और छोटे से मध्यम केटेगरी के तरफ अग्रसर उद्योगों को नीतिगत सहयोग दिया। इस अधिनियम में 2015 में संशोधन प्रस्तावित किया गया और MSMEs का वर्गीकरण “investment in plant and machinery or equipment के स्थान पर “annual turnover” कर दिया गया। फरवरी 2018 को इस संशोधन को यूनियन कैबिनेट की मंज़ूरी मिल गई।

भारत में क्लस्टर्स को मोटे तौर पर तीन वर्गों में बांटा गया है – SME clusters, handicraft clusters और handloom clusters. रिपोर्ट्स के अनुसार इस वक़्त देश में करीब 6400 क्लस्टर हैं। कुल 5847 समूहों को मैप किया गया है – इनमें से 2443 MSME क्लस्टर हैं, 540 हथकरघा क्लस्टर और 2864 हस्तकला क्लस्टर हैं। ये क्लस्टर manufacturing, trading और सर्विसेज के माध्यम से अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। इनमे से कुछ क्लस्टर्स इतने बड़े हैं कि अपने उत्पाद का 90% बाजार तक संचालित करते हैं। उदाहरण के तौर पर लुधियाना का कपडा सिलाई क्लस्टर, सूरत और मुंबई का जेम एंड ज्वेलरी निर्यात क्षेत्र, चेन्नई, आगरा और कोलकाता का चमड़ा एवं चमड़ा उत्पाद, तिरुपुर का कॉटन होज़री क्लस्टर, भागलपुर का हैंडलूम क्लस्टर वगैरह

विशेषज्ञों के मुताबिक़ एक क्लस्टर के जन्म और दूरगामी विकास में ज्ञान सृजन, मजबूत कौशल आधार, नेटवर्क और परस्पर संबंध, इनोवेशन, मजबूत R&D, उद्यमशीलता की भावना, सहज वित्त पोषण और अच्छे बुनियादी ढाँचा की एहम भूमिका होती है। सचेत वर्तमान सरकार इस क्षेत्र के लक्षित विकास के लिए लगातार कदम उठा रही है। केंद्रीय MSME मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक़ सरकार ने 2016 से 2019 के बीच 35 क्लस्टर्स की स्थापना की है।  इनमे से 17 क्लस्टर्स अकेले 2019 में वजूद में आये हैं।  इनमें  …

महाराष्ट्र  -8
तमिलनाडु – 12
केरल – 2
उत्तर प्रदेश –  1
आंध्र प्रदेश – 1
पश्चिम बंगाल – 4
हरियाणा -1
ओडिशा – 1
कर्नाटक – 5

इनमें कपड़ा, वस्त्र, चीनी मिट्टी की वस्तुएं ,इलेक्ट्रॉनिक्स, छपाई और पैकेजिंग, ऑटो, इंजीनियरिंग, सोने के आभूषण, चावल जैसे समूह शामिल है। इससे पहले
सरकार ने साल 2019 और 2020 में ऐसे 50 क्लस्टर्स को मंज़ूरी दी है जो सौर चरखा द्वारा संचालित होंगे। इससे बुनकरों और कारीगरों को बड़ी मदद मिलेगी। साथ ही MSME मंत्रालय ने Whatsaap और CII के साथ मिल कर TechSaksham नामका प्रोजेक्ट भी लांच किया है जो प्रौद्योगिकी अपनाने में छोटे व्यवसायों की मदद करेगा।

Cluster Development Programme (MSE-CDP) के तहत सरकार अक्टूबर, 2019 तक 169 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं पूरी कर चुकी है। इसके साथ ही 75 कॉमन फैसिलिटी सेंटर्स भी विकसित किये गए हैं। क्लस्टर विकास योजना के लिए 2020 में करीब 128 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। बकौल वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, सरकार ने अगले पांच बरसों में इस क्षेत्र की मौजूदा जीडीपी हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है, इसके साथ ही मौजूदा 11 करोड़ में 5 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां पैदा करना लक्षित हैं।

तो ये रहा भारत में क्लस्टर विकास मॉडल की भूमिका पर संछिप्त लेख और कैसे हमारे छोटे उद्योग आने वाले कल की ठोस इबारत लिख रहे हैं। अगले अंक से हम ये सीरीज आगे बढ़ाएंगे और नज़र डालेंगे पूर्व और उत्तर -पूर्व क्षेत्र के क्लस्टर्स पर।