गाँधी जी और शाकाहार

Sandeep Yash

Mahatma Gandhiआज 2 अक्टूबर को देश महात्मा गाँधी की 151वीं जयंती मना रहा है। गांधी जी ने अपने अहिंसा के संदेश से दुनिया को जीता था।  इनका मानना था कि इंसान को वो बदलाव पहले खुद में करने चाहिए जिनकी उम्मीद उसे दुनिया से रहती है।  और उनका एक और संकल्प था – मांस, दूध या दूध से बने पदार्थों का सेवन से परहेज करना। तो आज दुनिया गाँधी जी को शाकाहार का सबल प्रतीक मानती है और आपकी जानकारी के लिए शाकाहार इनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा मुद्दा भी रहा।  तो चलिए गाँधी जी और शाकाहार से जुडी कुछ ज़रूरी जानकारी आपसे साझा करते हैं

गाँधी जी एक वैष्णव परिवार से ताल्लुक रखते थे , शुद्ध शाकाहार इस परिवार की परंपरा का अटूट हिस्सा था

गाँधी जी बचपन में कुछ कमज़ोर थे और अँधेरे से डरा करते थे । 10 वीं क्लास की बात है जब इनके बचपन के दोस्त शेख मेहताब ने इन्हें भरमाया की इसका इलाज मांसाहार में है।  मेहताब ने उदाहरण देते हुए कहा था कि अँगरेज़ मांसाहार से बल प्राप्त करते है और इसलिए भारतीयों पर राज करते हैं।  मेहताब की सलाह पर गाँधी जी ने कुछ दिन मांस खाया पर तजुर्बा कड़वा रहा। माता को दिया वचन तोड़ने का एहसास भी इन्हें सालता रहा जिसे ये ताउम्र नहीं भूले।

वहीँ अपनी मां के प्रति अगाध प्रेम और उनकी उपवास रखने की क्षमताओं ने गाँधी जी को इस बात का अहसास कराया कि शाकाहार और उपवास के जरिए नैतिक ताकत हासिल की जा सकती है।

फिर गाँधी जी कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए।  जाने से पहले माताजी जी ने एक जैन संत को बुला कर इन्हें मांस, स्त्री और मदिरा न छूने की शपथ दिलाई थी। उस ठन्डे देश ने शाकाहारी गाँधी जी का कठिन इम्तेहान लिया था जहाँ कई दिन इन्हें भूखे भी रहना पड़ा था।

इंग्लैंड प्रवास के दौरान इन्होने ”Salt’s Plea for Vegetarianism” पुस्तक पढ़ी थी।  इसे पढ़ने के बाद गांधी जी ने शाकाहार को एक बौद्धिक विकल्प बनाने के साथ इसके प्रसार को अपना मिशन बनाया था। यह शाकाहार की दिशा में स्वतः उठा इनका पहला कदम था। जल्द सभी पशु उत्पाद जैसे अंडे और दूध भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गए थे।

इंग्लैंड प्रवास के दौरान ही इनकी माता जी की मृत्यु हो गयी थी। भारत वापस लौटे गाँधी जी के लिए शाकाहार अब माँ की स्मृति का अमिट हिस्सा बन चुका था। अब भले ही इनके माता-पिता जीवित नहीं थे पर इरादे के पक्के गाँधी जी के लिए पशु उत्पाद अब विकल्प नहीं रह गए थे।

साउथ अफ्रीका में लिया ब्रह्मचर्य का व्रत इन्हें शाकाहार के और करीब लाया था। 1912 में टॉलस्टॉय फार्म में आत्मसंयम को उर्जित करने के लिए गाँधी जी और इनके मित्र कालेनबाक ने दूध पीना तक छोड़ दिया थे। ”English as A Guide to Health” पुस्तक में गाँधी जी ने लिखा है बचपन में मां के दूध के अलावा, इंसान को इसकी कोई ज़रुरत नहीं है।

शाकाहार के मार्ग पर चलते हुए गाँधी जी को तमाम इम्तेहान देने पड़े थे
– डरबन में सत्याग्रह के दौरान कस्तूरबा गंभीर रूप से बीमार पड़ी थीं और डॉक्टर ने उन्हें बीफ के अर्क की चाय धोखे से पिलाने की कोशिश थी।  गाँधी जी
इसका विरोध करते हुए उसे शाकाहार के सिद्धांत से रूबरू कराया था।  इस दौरान इन्हें बीमार कस्तूरबा का भरपूर समर्थन मिला था।
– प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, गाँधी जी लंदन में थे जब इन्हें प्लुरिसी बीमारी ने जकड लिया था।  फलाहार पर जी रहे गाँधी जी को जब डॉक्टरों ने दूध और अनाज लेने को कहा तो इन्होने मना कर दिया था। जब गोपाल कृष्ण गोखले ने आग्रह किया तो इन्होने इन पदार्थों को लेने की अपेक्षा मौत को श्रेयस्कर बताया था
– खेड़ा दौरे पर गए गाँधी जी dysentery का शिकार हो गए थे। हालत ज़्यादा बिगड़ी तो इन्हें माथेरन ले जाया गया।  यहाँ डॉक्टर ने साफ़ तौर पर इन्हें दूध पीने को कहा था। ज़िद पर अड़े गाँधी जी को जल्द रौलेट एक्ट के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई करनी थी। इसी मजबूरी के चलते इन्हे अंततः बकरी का दूध पीने पर राज़ी होना पड़ा था। ये सिलसिला फिर चलता रहा।

पर शाकाहार के हथियार से गाँधी जी ने पश्चिमी जगत का जो सबसे बड़ा मिथक तोडा – वो था मांसाहारियों का अधिक बलशाली होना। गाँधी जी ने ये साबित किया था कि मांसाहार आक्रामकता को जन्म देता है। आत्म नियंत्रण खत्म करता है।  इसका असल जवाब शाकाहार और अहिंसा के विचारों में निहित है जो आत्मसंयम को बल देता है. 15 अगस्त, 1947 को लम्बे संघर्ष के बाद इसी विचारधारा की जीत हुई थी।

जानकारों के मुगताबिक़ , ये शाकाहार का मार्ग था जो गाँधी जी को अहिंसा, त्याग और सत्याग्रह की ओर लाया।   बिना इन शस्त्रों के शायद गाँधी जी को कभी भी नैतिकता की अगम ताकत का एहसास नहीं होता और इतिहास की तस्वीर कुछ और होती।

गाँधी जी का आहार इनकी राजनीति से गहन रूप से जुड़ा था। अन्याय और असमानता के खिलाफ संघर्ष में परहेज भी एक मजबूत हथियार था।

गाँधी जी का नमक से गहरा नाता रहा । युवा गाँधी नमक के कायल थे, मध्य आयु में इसे खारिज कर दिया था और फिर वृद्धावस्था में संयम के साथ ग्रहण करने लगे थे।  और नमक ही सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रेरणा बना था।

इसी तरह गाँधी जी कच्चा अनाज और जंगली सब्ज़ी भी खाते थे क्यूंकि ये देश की गरीब ग्रामीण जनता का आहार था

पर सबसे बड़ी बात, आहार ने गाँधी जी और समाज के बीच पुल का काम किया था। ये इस सामाजिक प्रयोग का सबसे बड़ा सबक है।

शाकाहार पर आप अगर गाँधी जी के विचारों को मुकम्मल तौर पर जानना चाहते हैं तो इनकी पुस्तक  ” The Moral Basis of Vegetarianism” ज़रूर पढ़ें।  इस पुस्तक में इनके बरसों पुराने लेखो का अद्भुत संग्रह है

चलते चलते
गाँधी जी कहा करते थे कि ”सत्य के खोजकर्ता के रूप में, मुझे शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को स्वस्थ रखने के लिए उत्तम भोजन खोजना आवश्यक है”।
इसका उत्तर भी इन्होने दिया था – शाकाहार !!!!!