गुजरात में पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन; विधानमंडलों को 21वीं सदी की चुनौती

Arvind Kumar Singh
78th Conference of Presiding Officers of Legislative Bodies in India. Photo-RSTV

78th Conference of Presiding Officers of Legislative Bodies in India.
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गुजरात की राजधानी गांधीनगर में भारत के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों और सचिवों के महाकुंभ में सहमति बनी कि बड़े राज्य विधानमंडलों में साल में  कमसे कम 60 दिन और छोटे राज्यों में 30 दिन का कामकाज होना ही चाहिए. तीन दिवसीय सम्मेलन में तय किया गया कि राज्यों के मुख्यमंत्रियो को पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की इस भावना से अवगत कराया जाएगा . इस प्रस्ताव को जमीन पर उतारने के लिए लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन मुख्यमंत्रियों को अलग से पत्र लिखेंगी. पीठासीन अधिकारियों के इस सम्मेलन में विधान मंडलों के 29 सभापतियों / अध्यक्षों तथा 26 उपाध्यक्षों के साथ 350 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

लोकसभा अध्यक्ष ने माना कि संसद और विधान मंडलों में बढते गतिरोध से यह धारणा मजबूत हो रही है कि सदनो में कोई कामकाज नहीं होता है. लोकतांत्रिक संस्थाऍ विश्वास खो रहीं हैं. इसकी बहाली बहुत ज़रूरी है. दुनिया हमारे लोकतंत्र की सराहना करती है लेकिन हकीकत यह है लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों का विश्वास घटता जा रहा है. इस पर गंभीरता से चिंतन की जरूरत है.

गिरती साख और छवि की बहाली के लिए सम्मेलन में चिंतन हुआ. सम्मेलन में उत्तरप्रदेश से लेकर गोवा और सिक्किम जैसे सभी प्रमुख राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए. सम्मेलन की सफलता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खास संदेश भी भेजा. सम्मेलन में पीठासीन अधिकारियों ने बेबाकी से स्वीकारा कि जनमानस में विधायिका की छवि धूमिल हो रही है. विश्वास बहाली के लिए विधायिका को कुछ ठोस पहल करने के साथ अनुशासन स्थापित करना होगा.

सम्मेलन में बेहतर विधायी कामों के लिए बिहार, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों के विधानमंडलों की लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सराहना की. लेकिन माना कि तकनीक और तमाम बदलावों से पारदर्शिता की चुनौतियां बढ़ी हैं. लोकतंत्र के प्रति आम लोगों में निराशा और अविश्वास दूर करने के लिए प्रभावी उपायों की जरूरत है.

आज सदनों में आरोप प्रत्यारोप, शोर शराबा, नारेबाजी, अध्यक्ष के आदेशों की अवहेलना, बात-बात पर अवरोध आम बन गया है. अध्यक्ष के आसन तक पहुंच जाना, बार-बार सदन की कार्रवाई स्थगित होना और कई अशोभनीय घटनाएं तक आज किसी से छिपी नहीं हैं. इनसे यह छवि बन रही है कि संसद और विधानसभाएं भारी धन व्यय करने के बाद भी कुछ काम नहीं करती.

वैसे तो सदन संचालन के लिए ठोस नियम और प्रक्रिया बनी हुई है. लेकिन इसकी अनदेखी होती है. पहले वाक आउट का हथियार कभी-कभार उपयोग में लाया जाता था. तब शासक दल किसी तरह मना कर विपक्षी दलों को सदन में वापस लाने की कोशिश करता था. लेकिन अब विपक्ष बात-बात पर वाक आउट भी करता है और शासक दल बिना विपक्ष के काम चलाने से गुरेज नहीं करता. यह बेहद चिंताजनक और गंभीर बात ही नहीं लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है.

समस्या की जड़ आखिर कहां है.  पीठासीन अधिकारी मानते हैं कि चूंकि सदनों में बैठकों की संख्या सीमित होती जा रही है इस नाते जनप्रतिनिधियों को  बात रखने का मौका  नहीं मिलता. साझा सरकारों वाले विधानमंडलों में तो विपक्ष से बचने के लिए सत्ता पक्ष बैठकें बुलाने से ही परहेज करता है.  बैठकें कम  बुलायी जाती हैं .  मिनटों में  विधेय़क पास हो जाते हैं. अगर साल  के लिए कमसे कम 60 बैठकें निश्चित कर दी जाएं तो एक हद तक समस्या पर काबू पाया जा सकता है. इससे  समस्याओं पर  चर्चा के लिए अधिक समय मिलेगा और जनता में सदनों की साख बढ़ेगी.

Lok Sabha Speaker Sumitra Majana speaking at the 78th Conference of Presiding Officers of Legislative Bodies in India. Photo-RSTV

Lok Sabha Speaker Sumitra Majana speaking at the 78th Conference of Presiding Officers of Legislative Bodies in India.
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गांधीनगर सम्मेलन में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने लोक सभा की आचार समिति को स्थायी समिति बनाने का ऐलान भी किया जो पहले तदर्थ समिति थी. बदलते माहौल में संसदीय गरिमा की बहाली के लिहाज से यह अहम कदम उठाया गया.

सबसे पहले 23-24 सितंबर 1992 को दिल्ली में  पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में संसद और विधानमंडलों में आचार समितियों के गठन की सिफारिश की गयी थी लेकिन भारत में पहली आचार समिति का गठन 4 मार्च 1997 को राज्यसभा में तत्कालीन सभापति के.आर.नारायण ने किया. वरिष्ठ सांसद और पूर्व गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण पहले अध्यक्ष बने. समिति ने काफी महत्वपूर्ण काम किया. वहीं  लोकसभा में आचार समिति का गठन 16 मई, 2000 को 13वीं लोकसभा के अध्यक्ष ने किया और इसके पहले अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बने.  समिति की सिफारिश पर कई सांसदो की सदस्यता तक चली गयी. लेकिन राज्यों में इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो पायी. बिहार विधान परिषद में 20 अगस्त, 2010 को नीतिश कुमार की अध्यक्षता में पहली आचार समिति गठित की. समिति ने 19 दिसंबर, 2014 को सदन में पहला प्रतिवेदन रखा जिसमें सदस्यों के विधान मंडल परिसर में प्रवेश से लेकर सदन के भीतर-बाहर, अध्ययन यात्रा और शिष्टमंडलों में वार्ता के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों का समावेश  है. सदन ने इसे स्वीकृति दे दी है.

लेकिन सदन संचालन की चुनौतियां अलग हैं. आज यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कई प्रांतों में शासक दल विपक्ष के प्रति अजीबोगरीब रवैया अपनाता है. विपक्ष की ओर से उठाए जानेवाले हर मुद्दे में शासकों को वैमनष्य का भाव ही नजर आता है. कुछ राज्यों में जवाबदेही कमजोर होने से नौकरशाही हावी  है.

इस स्थिति के लिए मीडिया का एक वर्ग और खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है. सार्थक वाद-विवाद को नकारते हुए अवरोधों को हवा देने से एक नयी धारणा पैदा हुई है. कई सदस्य मीडिया की निगाह में आने के लिए मर्यादित व्यवहार करते हैं. राजनीतिक दलों के नेता तथा सचेतक इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते थे लेकिन उलटे वे सदन का एजेंडा बाहर से तय कर देते हैं.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. और हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत संसद और विधान मंडल हैं. यहीं राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और प्रांतीय महत्व के तमाम सवालों पर चिंतन-मनन कर ठोस रणनीतियां बनायी जाती हैं. लेकिन आम धारणा है कि संसद और विधान सभाएं काम नहीं करतीं और वहां केवल हंगामा होता है. इसे   कैसे तोड़ा जाये, यह सबसे बड़ी चुनौती है. इस छवि को केवल सांसद और विधायक अपने आचरण से ही तोड़ सकते हैं.

सम्मेलन में  गुजरात विधान सभा  अध्यक्ष गणपतसिंह वसावा की राय थी कि बदलते समय में जनता की जन प्रतिनिधियों से अपेक्षाएं बढ़ रही हैं. और आधुनिक लोकतंत्र में हमारे कर्तव्यों के साथ भूमिका में भी काफी बदलाव आया है. हम अपने विधान सभा क्षेत्र के प्रतिनिधि सबसे पहले हैं इस नाते क्षेत्रीय समस्याओं का निदान हमारा प्राथमिक दायित्व है. इसके बाद राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में या सरकार और विधायिका के सदस्य के रूप में भी हमारी भूमिकाएं हैं जिनके बीच संतुलन रखना भी जरूरी है. इसी के साथ सदनों में स्तरीय चर्चा होनी भी जरूरी है क्योंकि इसे पूरा देश देखता है.

78th Conference of Presiding Officers of Legislative Bodies in India. Photo-RSTV

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राज्यसभा के उप सभापति प्रो. पी. जे. कुरियन ने काफी बेबाकी और तथ्यों के साथ कई ज्वलंत मसलों पर पीठासीन अधिकारियों का ध्यान खींचा. उनका कहना था कि इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में विधायी निकायों की औसतन 130 से ज्यादा बैठकें होती हैं. लेकिन हमारे संविधान में बैठकों की संख्या के बारे में कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए संविधान में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि संसद की कम से कम 120 बैठकें और विधानसभाओं की कम से कम 60 बैठकें हों. इसी तरह सदन के कामकाज को बाधित करने वाले सदस्यों के वेतन और भत्ते में कटौती जैसे प्रावधान भी होने चाहिए. क्योंकि ऐसे व्यवधानों के कारण संसद अपने कर्तव्य का पालन करने में विफल हो रही है.

हालांकि श्री कुरियन ने माना कि भारत संसदीय लोकतंत्र के लिहाज से दुनिया में सबसे आगे है लेकिन लगातार व्यवधान के कारण प्रायः ठीक से काम नहीं हो पाता और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पाती. इसी तरह संसद और विधान मंडलों में बेहतरीन वाद-विवाद या भाषणों की मीडिया अनदेखी करता है. इससे  तैयारी करके सदन में आने वाले सदस्य हताश होते हैं. उनकी जगह मीडिया उन सदस्यों की गतिविधियों को ज्यादा कवरेज देता है जो गतिरोध पैदा करते हैं .

वास्तविकता यह है कि आज  संसदीय संस्थाओं पर कई तरफ से हमले हो रहे हैं. उनको बदनाम करने की कोशिशें हो रही है. इस नाते संसद की गरिमा  बचाने के लिए नए प्रयासों की जरूरत है और इसमें सभी दलों को मिल कर राह निकालनी होगी.