ग्लासगो में दिल्ली को दोहराना है चुनौती

Anugrah Mishra

cwg_glasgow2दिल्ली में वर्ष 2010 में आयोजित 19वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए जब 101 पदक अपनी झोली में डाले तो खेलों की शुरुआत से पहले उठे तमाम विवाद उन पदकों के तले कहीं दब गए.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत से पहले निश्चित समयावधि का पालन नहीं किया गया और बाद में खेलों में घोटाले और भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए. लेकिन जब पोडिअम पर खड़े भारतीय निशानेबाज विजय कुमार के हाथों में स्वर्ण पदक और कानों में राष्ट्रगान गूंजा तो लगा कि हमारा देश भी खेलों में दुनिया के बाकी देशों का मुकाबला कर पाने में सक्षम है.

इस बार भी विजय कुमार उसी तिरंगे तले अपने प्रतिद्वंदियों से दो-दो हाथ करने उतरेंगे. मंच होगा स्कॉटलैंड का ग्लासगो. ग्लासगो में 23 जुलाई से 3 अगस्त तक 20वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है.

भारत के सामने जहां पिछले प्रदर्शन की सीख होगी वहीं उसे दोहराने का दबाव भी. दूसरी तरफ खिलाड़ियों को घरेलू हालात की भी कमी जरूर खलेगी.

ग्सासगो में शुरु होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के 224 एथलीट, 14 खेलों की करीब 250 स्पर्धाओं में पदक के लिए जद्दोजेहद करेंगे. भारत की ओर से लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले निशानेबाज विजय कुमार दल के ध्वजवाहक होगें.

2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के 495 एथलीटों ने हिस्सा लिया था. जिसमें भारत ने 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य पदक समेत कुल 101 पदक जीते थे. ग्लासगो में 71 देशों के साढ़े चार हज़ार खिलाड़ी पदक जीतने के लिए ज़ोर आज़माईश करेंगे.

भारत को मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी, बैडमिंटन और हॉकी खिलाड़ियों से खासी उम्मीदें हैं. 2010 के लंदन ओलंपिक में भी भारत ने अपना सबसे बढ़िया प्रदर्शन करते हुए छह पदक हासिल किया था जिसमें सभी पदक इन्हीं खेलों में से हासिल हुए थे.

पिछले दो राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को निशानेबाजी में ही 30 पदक हासिल हुए हैं जिनमें मेलबर्न खेलों के 16 और दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के 14 पदक शामिल हैं.

बैडमिंटन में स्टार शटलर साइना नेहवाल के खेलों में शामिल नहीं होने से भारत की उम्मीदों को करारा झटका जरूर लगा है. लेकिन फिर भी पी वी सिंधु, ज्वाला गुट्टा, अश्विनी पोनप्पा ऐसे नाम हैं जो देश की उम्मीदों पर ख़रा उतरने के लिए तैयार हैं.

कुश्ती में भारत के पास कुछ बड़े नाम जरूर हैं. ओलंपिक खेलों में दो-दो पदक जीतने वाले सुशील कुमार और लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त अपने दांव से पदक को पटखनी देने के लिए कमर कस चुके हैं.

मुक्केबाजी में बॉक्सर से एक्टर बने विजेंदर से देश को काफी उम्मीदें हैं, साथ में विजेंदर पर लंदन ओलंपिक के कड़वे अनुभव से उबरने की भी चुनौती भी होगी. वहीं महिला मुक्केबाजी में मैरीकॉम अपने बेहतरीन प्रदर्शन को लगातार जारी रखना चाहेंगी.

फील्ड खेलों में भारत के लिए 52 साल बाद डिस्कस थ्रो में कृष्णा पूनिया दिल्ली राष्ट्रमंडल में स्वर्ण पदक जीता था. इससे पहले 1958 के कार्डिफ राष्ट्रमंडल में मिल्खा सिंह ने ये कारनामा किया था. पूनिया के अलावा विकास गोड़ा से भी देश को पदक की उम्मीद है.

देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी में पुरुष हॉकी टीम के लिए ग्लासगो राष्ट्रमंडल नई शुरुआत साबित हो सकता है. विश्व कप के निराशाजनक प्रदर्शन से पार पाकर यहां बेहतरीन प्रदर्शन करना हॉकी टीम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा. हॉकी टीम को दिल्ली राष्ट्रमंडल में रजत पदक भले ही मिला हो लेकिन फाइनल मुकाबले में ऑस्ट्रलिया से मिली 0-8 की करारी हार को टीम भुला ही देना चाहेगी.

फीफा के फुटबाल फीवर के बाद अब दुनिया भर की नज़रे ग्लोसगो राष्ट्रमंडल खेलों पर टिकी हैं. जहां हर दिन खिलाड़ियों और उनके देश के लिए निर्णायक भूमिका अदा करेगा.