गढ़ना है नया दौर

Sandeep Yash
Prime Minister Narendra Modi (Twitter Photo)

Prime Minister Narendra Modi (Twitter Photo)

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में LinkedIn पर एक पोस्ट लिखी है। ये ऑनलाइन वेबसाइट, शिक्षित युवा वर्ग से जुडी हुई है जहाँ कौशल, व्यवसाय और नौकरियों से जुडी सूचनाएँ आपको मिल जाएँगी। इसी वर्ग से प्रधानमत्री ने मन की बात की और कहा कि वो अपनी ऊर्जा और मेधा आने वाले स्वस्थ और समृद्ध भारत के निर्माण में लगाए। इस सन्निकट भविष्य को उन्होंने AEIOU, यानी अंग्रेजी के vowels के माध्यम से समझाया। यानी ये पांच अक्षर जिन्हें हम प्राइमरी में पढ़ कर आये थे अब किसी भी नए बिज़नेस मॉडल की सूरत, सीरत और प्रारब्ध गढ़ेंगे। जानकारी के लिए

A – Adaptability: यानी ऐसा सरल व्यापार और जीवनशैली जो कठिन वक़्त के सांचे में आसानी से ढल जाए , गतिशील रहे, जान माल की हानि से बचाये। उदाहरण के लिए इस महामारी के दौरान डिजिटल लेन देन और टेलीमेडिसिन का तेज़ी से बढ़ा दायरा।

E – Efficiency: यानी ऐसे मॉडल का विकास जहाँ उत्पादकता और दक्षता हमारी मौजूदगी से ज़्यादा मायने रखती हो। और जहाँ कार्य एक सुनिश्चित समयावधि में ख़त्म हो।

I – Inclusivity: यानी ऐसे किफायती बिज़नेस मॉडल और तकनीक का विकास जिनकी तवज्जो गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण सुरक्षा पर हो। और जिनमें भारत वैश्विक स्तर पर नेतृत्व दे सके

O – Opportunity: यानी हर विपदा अपने साथ नए मौके ज़रूर लाती है। ये महामारी भिन्न नहीं है। और वक़्त है इन मौकों को पहचानने का है। अपने कौशल, अपनी क्षमताओं का विकास कर इन अवसरों को भुनाने का है, अव्वल रहने का है।

U – Universalism यानी आचार, विचार के माध्यम से एकता और भाईचारे को लक्षित करना। क्यूंकि महामारी धर्म, रंग, जाति, पंथ, भाषा या सीमा को नहीं मानती।

प्रधानमंत्री के इस सारगर्भित सन्देश को अर्थशाष्त्री , समाजशास्त्री समेत तमाम विशेषज्ञ अलहदा तरीके से देख रहे हैं। समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस महामारी के बादआने वाला कल कैसा हो सकता है। क्या बदलेगा, क्या प्राथमिकताएं होंगी, कौन कौन से सेक्टर्स देश -दुनिया और समाज को पोसेंगे, दिशा देंगे। हमारी सुबह और शाम का मिज़ाज तय करेंगे। निजी तौर पर देखें तो हमारी रोज़ी कैसे और कहाँ से आएंगी – कहाँ, कब और कितना खर्च होगा, हम-आप माहवारी कितनी बचत कर पाएंगे – ये भी तय होगा। अगर साफ़ साफ़ कहें तो प्रधानमत्री एक ऐसी बैलेंसशीट की बात कर रहे हैं जिसमे खुशियां, कौशल, परिश्रम और नेकी – ग़म, दरिद्रता, छुद्रपन, हिंसा और संताप पर सर्वदा भारी पड़ें। तो क्या प्राथमिकता हों हमारी अगले दौर में

1- खाद्य सुरक्षा - इस महामारी के दौरान गेहूं का आटा, चावल, दालें, खाद्य तेल, फल और सब्ज़ियों जैसे मुख्य खाद्य पदार्थ देश के अधिकांश हिस्सों लगातार उपलब्ध रहे। वैश्विक आपूर्ति श्रंखला (global supply chain) भी सलामत रही जिसके चलते खाने के तेल की सप्लाई और दाम सामान्य रहे। आपकी जानकारी के लिए भारत लगभग 23 मिलियन टन खाद्य तेलों का उपभोग करता है। इसमें से लगभग 8 मिलियन टन का उत्पादन देश में होता है और शेष 15 मिलियन टन का आयात किया जाता है। पर विशेषज्ञों कहते हैं आपदा के मद्देनज़र इस तंत्र की प्राथमिकताएं फिर तय करनी होंगी।

– खाद्य और कृषि क्षेत्र में आत्म निर्भरता बढ़ानी होगी
– पर्याप्त भोजन भंडारण की घरेलु क्षमता विकसित करनी होगी
– बंदरगाहों पर आधुनिक बुनियादी ढांचा निर्माण में निवेश बढ़ाना होगा
– कृषि और खाद्य की आपूर्ति श्रृंखला को आधुनिक बनाना होगा

इस समय देश के सामने पहली चुनौती कम से कम छह महीने तक खाद्यान भण्डारण क्षमता विकसित करने की है। और अभी सरकारी भंडारण की साइलो क्षमता 6.6 लाख टन है। इसको बढ़ाने के लिए भारत बड़ी खरीद वाले राज्यों में आधुनिक स्टील साइलो भंडारण क्षमता में जल्दी निवेश करेगा। ताकि खरीदे गए गेहूं को कच्चे भण्डारण से होने वाले सुरक्षित किया जा सके।

भारत की अधिकांश मंडियों में परख और ग्रेडिंग की सुविधा नहीं है। कमीशन एजेंट अन्न की कीमत गंध और शक्ल के आधार पर करते हैं। मंडियों को आसानी से परीक्षण के लिए आधुनिक उपकरणों से लैस किया जा सकता है। निकट दौर में भारत कोल्ड चेन्स के विकास पर भी तवज्जो दे रहा है जिससे जल्द खराब होने वाले भोजन, सब्ज़ियां, दवाओं और टीकों वगैरह को सुरक्षित उनके लक्ष्य तक पहुंचाया। विशेषज्ञों के मुताबिक़ यही वक़्त है जब सरकार न सिर्फ निर्णायक और तेज़ कदम उठाते हुए आत्मनिर्भरता की तरफ बढे बल्कि विदेशी बाजारों में मांगों को पूरा करने के लिए कृषि निर्यात का विस्तार भी करे।

2. मानवीय मूल्यों द्वारा पोषित अर्थव्यवस्था - नब्बे फीसदी भारतीय श्रमिक अनिश्चितकालीन रोजगार में लगे हुए हैं, जैसे कि संविदा कर्मचारी, अंशकालिक श्रमिक, आकस्मिक मजदूर, घरेलू कामगार आदि। इनके पास आय की कोई सुरक्षा नहीं है। हालिया महामारी ने इनकी दशा और दुर्दशा की तरफ देश का ध्यान खींचा है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ इस महामारी ने व्यापार की पुरानी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर डाला है जिनका दोबारा आना मुश्किल है। उनके मुताबिक़ नए बिज़नेस मॉडल की बुनावट कुछ ऐसी लचीली हो जो वित्तीय संकट, महामारी और यहां तक कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के खिलाफ भी मजबूती से खड़ी रह सके। साथ ही

1. ये नया मॉडल बुनियाद परक और समावेशी विकास का हामी हो
2. सामाजिक कल्याण इसकी बुनावट का हिस्सा हो
3. इसकी आत्मा में कानून निर्देशों से आगे जाकर श्रमिक कल्याण की क्षमता और इच्छाशक्ति हो
4. ऐसे कानून हों जो रोजगार के साथ लचीलेपन की अनुमति देते हैं
5 . नए बिज़नेस मॉडल्स को नए मिज़ाज के प्रगतिशील अनुबंध भी हों जो जो काम और व्यवसाय के बीच संतुलन स्थापित करें
6 . इन सारे मॉडल्स के ऑपरेशन डिजिटल हों ताकि किसी भी आपदा में काम न रुके

इन नए बिज़नेस मॉडल्स की ज़रुरत निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, हॉस्पिटैलिटी और कृषि जैसे क्षेत्र में ज़्यादा होगी। फिलहाल, हाल में लाक्डॉन के दौरान direct benefit transfer के माध्यम से सरकार ने 16 करोड़ लाभार्थियों के एकाउंट्स करीब 36 हज़ार करोड़ रुपये भेजे। JAM प्लेटफार्म का इस काम में सटीक इस्तेमाल हुआ। जानकार इसे सही दिशा उठा कदम मानते है। उनके मुताबिक़ सरक़ार को कतार के अंत में खड़े हर व्यक्ति को इसकी जद में लाना चाहिए। दूसरी ओर, उद्योग जगत को इस काल से उबरने और आगे बढ़ने के लिए सरकारी सहायता और धन की आवश्यकता होगी। सरकार को भी इनकी मदद के लये आगे आना होगा। इन्हें टैक्स ब्रेक, क़र्ज़ अदायगी पर अल्पकालीन रोक और कम दर पर ब्याज उपलब्ध कराना होगा, ख़ास तौर पर छोटे और मंझोले उद्योगों को। वैसे इस महामारी ने समाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को दोबारा रेखांकित किया है। सरकार का प्रयास जारी है, नतीजे भी दिख रहे हैं जिनकी इस दौर के बाद तेज़ होने की पूरी संभावना है। ऐसे सुरक्षा कवच आपदाओं में व्यापार, श्रमिक और आम नागरिक- सबकी रक्षा करते हैं और जल्द उबरने में मदद करते हैं। पर ये मदद सशर्त होनी चाहिए। आने वाले कल में व्यापार ज़रूर पनपे पर सामाजिक हितों की कीमत पर नहीं।

3. स्वास्थ्य क्षेत्र - ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी महामारी से मुक़ाबला करना में मानव का कोई पुराना अनुभव काम न आया। दुनिया अभी भी कोरोना वायरस का इलाज ढूंढ रही है और अब तक सिर्फ लाक्डॉन ही इसको रोकने में कारगर साबित हुआ है। एक न एक दिन तो ये माहमारी भी ख़त्म होगी और जानकारों के मुताबिक़ ये स्वास्थ्य क्षेत्र को भी बदल डालेगी। यानी एक ऐसी स्वास्थ्य व्य्वस्था का निर्माण भविष्य में ऐसी भयंकर जान माल की हानि को रोक सके। विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन द्वारा ये स्वीकारने में देरी कि ये नया वायरस है और फिर WHO द्वारा पारस्परिक विरोधी बयान जिसने दूसरे देशों के लिए दुविधा भरे हालात पैदा कर दिए थे। इनका घातक असर हुआ। ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय में प्रोफेसर डेनिस स्नोवर के मुताबिक़ एक देश में वायरस को हराने का अकेला तरीका यह है कि इसे हर जगह पराजित किया जाए। विश्व बिरादरी ने पोलियो उन्मूलन के खिलाफ जंग में ये कर दिखाया है। इस महामारी के विषय में भी ऐसा ही होना चाहिए। तो निकट भविष्य में

1. स्वास्थ्य क्षेत्र में पनप रही किसी भी स्थिति पर पारदर्शिता, स्पष्ट और सामयिक संवाद पहली शर्त होगी
2 .विशेषज्ञ एक ऐसे अंतराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं जिसमे किसी भी ज़रूरी मुद्दे पर एक निश्चित समयावधि में आम सहमति बनायीं जा सके। इससे काम में तेज़ी आएगी। Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) की रिपोर्ट्स इसका अच्छा उदाहरण हैं।
3.. संकट के इस दौर में निजी, सार्वजनिक क्षेत्रों में इनोवेशन हुए। जिससे बेहतर, सस्ते और कम समय में नतीजे देने वाले टेस्ट किट सामने आये। निकट भविष्य में ऐसे अनुभव उम्मीद की जोत जगाये रखते हैं
4. इसी दौर में साइंटिस्ट्स मौजूदा दवाओं के संयोजन से भी उपचार ढूढ़ने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। कुछ केसेस में नतीजे उत्साहजनक भी रहे। तमाम ज़रूरी डेटा सामने आया जो भविष्य में राह दिखायेगा।
5 .इस महामारी ने भविष्य के लिए दुनिया को सबक दिया कि उसे स्वास्थ्य क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता पैदा करना है। और ऐसे संकट के समय के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SoP) भी तैयार करने है।
6. मौजूदा संकट, भविष्य में आवश्यक दवाओं के पर्याप्त स्टॉक को बनाए रखने, उत्पादन क्षमता को भी बढ़ाने की तरफ इशारा करता है। साथ सप्लाई चेन न टूटे इसके लिए भी भारत को किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना है।

तो हमने यहाँ कुछ बुनियादी सेक्टर्स की ही मोटी मोटी बातें कीं जो निकट भविष्य में भारत को फिर से परिभाषित करेंगे। वैसे तो कोरोना वायरस के खात्मे के बाद का युग कैसा होगा इस पर तमाम किताबें लिखी जा सकती है। पर जान लीजिये की आने वाले युग में तकनीक ही भारत भाग्य विधाता होगी। विशेषज्ञ इन चार लक्षणों की तरफ इशारा करते हैं –
1. डेटा आधारित हेल्थकेयर क्षेत्र तेज़ी से बढ़ेगा
2. डिजिटल बिज़नेस मॉडल दूसरे परंपरागत मॉडल्स को पीछे छोड़ देंगे
3. ई-कॉमर्स सेक्टर के मार्किट शेयर में इजाफा होगा
4. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद मनोरंजन कम्पनीज सामान्य जीवन का अटूट हिस्सा बन जाएँगी

इतना ही नहीं, सोशल मीडिया के इस युग में सरकार को भविष्य की विपदा प्रबंधन नीति बुनते वक़्त सूचना प्रबंधन पर ख़ास ध्यान देना होगा। जानकार कहते हैं कि हाल के दौर में जनता में अनावश्यक तनाव बढ़ाने में इस प्लेटफार्म का बड़ा हाथ रहा है। तो निकट भविष्य में, इस चुनौती से सही और सामयिक सूचना उपलब्ध करा कर काफी हद तक निबटा जा सकता है।

तो, जाते जाते – इसी हफ्ते बर्लिन में G -20 Global Solution Virtual Summit हुई। जानते हैं उसकी थीम क्या थी – “Post COVID, What new measures are required for economic success, well-being, and business performance” .तो जनाब, सारी दुनिया भारत की तरह उसी दिशा में सोच रही है। चलिए, प्रयास करते हैं, अपने हिस्से का आसमां उठाते है। सिर्फ तभी, क्षितिज पार, वो नयी और उजली दुनिया हमें अपना दामन देगी।