चिंताजनक है इराक़ में बढ़ती हिंसा

iraq_violenceसंयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि इराक में हिंसा में मरने वालों की तादात लगातार बढ़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक़ हिंसा की आग में झुलस रहे इराक में सबसे ज्यादा नुक़सान यहां के आम नागरिकों को हो रहा है.

अकेले मई के दौरान ही इराक़ में 800 लोगों को जान गंवानी पड़ी है. मरने वालों में इराक़ सुरक्षा बलों के 196 जवान शामिल हैं. 28 मई को ही 74 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. यह पिछले सात महीने में यहां का सबसे ज्यादा खून खराबे का दिन रहा.

ये आंकड़ा और भी ज़्यादा हो सकता है, क्योंकि इस रिपोर्ट में अंबर प्रांत में मरने वालों को शामिल नहीं किया गया हैं. अंबर में सरकार पिछले कुछ महीनों से चरमपंथियों के ख़िलाफ अभियान छेड़े हुए है.

इस बीच इराक़ी सुरक्षाबलों ने दावा किया है कि उन्होंने चरमपंथियों के ख़िलाफ कार्यवाही करते हुए अंबर प्रांत में क़रीब सौ उग्रवादी मार गिराये हैं. सेना ने यह कार्यवाही फलूजा और सक़लाविया में की है.

2003 में हुए अमेरिकी हमले के बाद से इराक़ में शांति क़ायम नहीं हो पाई है. इराक़ का सामाजिक ताना बाना बिखर गया है और रोज़ाना घट रही हिंसा की वारदातों के बीच आम आदमी का जीना मुहाल हो गया है. लोगों के बीच जातीय तनाव बढ़ा है. इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा है और हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही हैं.

यहां 2006 सबसे ज़्यादा ख़ून ख़राबे वाला साल रहा है. हालांकि 2008 में हिंसक घटनाओं में थोड़ी कमी आई थी. पिछले साल से इराक़ में हिंसा अपने चरम पर है.

एक अनुमान के मुताबिक़ पिछले एक साल में मुल्क भर में 2500 से ज़्यादा लोग मारे गये हैं. बढ़ती हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता की वजह से आज का इराक़ पश्चिम एशिया के सबसे ख़तरनाक इलाक़ों में एक है.

बेहतर आर्थिक स्थिति

हालांकि आर्थिक तौर पर इराक़ के हालात अपने कई पड़ोसी मुल्कों से बेहतर है. पिछले कुछ सालों में इराक़ आर्थिक मामलों में बहुत हद तक आत्मनिर्भर हुआ है. इसमें तेल की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ती मांग और बढ़ती क़ीमतों का भी हाथ है.

इराक़ की अर्थव्यवस्था 8.5 फीसद की आकर्षक दर से बढ़ रही है जो पश्चिम एशिया में सबसे ज़्यादा है. प्रति व्यक्ति आय भी तक़रीबन 6900 डॉलर है जो भारत से लगभग 5 गुना ज़्यादा है.

इधर प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी उम्मीद जता रहे हैं कि इराक़ इस हिंसा के दौर से बाहर निकलेगा और जल्द ही देश में शांति की स्थापना होगी. हालांकि जिस तेज़ी से चरमपंथी हमले बढ़ रहे उसे देखते हुए प्रधानमंत्री के दावे में दम नज़र नहीं आता.

इराक़ में हाल ही में हुए चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है.नतीजे आने के बाद से इराक़ में गठबंधन सरकार बनाने की कोशिशें जारी हैं. इराक़ में नई सरकार के सामने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बड़ी चुनौती होगी.

अगर इराक़ जातीय हिंसा के चंगुल से निकल पाता है तो उसमें विकसित देशों की जमात में शामिल होने की क्षमता है लेकिन हिंसा पर जल्द लग़ाम न लगाई गई तो इराक़ एक बार फिर से अस्थिरता की चपेट में आ जाएगा जो पूरे पश्चिम एशिया के लिये अच्छा नहीं होगा.