चीन के लिए अभी भी एमटीसीआर दूर है

china-visit-2015न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप यानी कि एनएसजी में एंट्री की भारत की कोशिशें विफल होने से मायूस देश के लिए दो दिन बाद ही अच्छी खबर आई जब उसे मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम यानी एमटीसीआर का 35वां सदस्य घोषित किया गया. एनएसजी को लेकर विफलता का शोर इस हद तक था कि ये खबर किसी बड़ी सफलता से कम नहीं थी. जिस एमटीसीआर में शामिल होने के लिए भारत कोशिशें कर रहा था, उसके सदस्य देशों ने पड़ोसी देश की तुलना में भारत का रिकॉर्ड ज्यादा साफ-सुथरा होने पर मुहर लगा दी.नतीजा भारत को एंट्री मिली और चीन जैसा ताकतवर मुल्क सुरक्षा परिषद और एनएसजी का सदस्य देश होने के बावजूद अब भी इससे महरूम है.

एमटीसीआर की सदस्यता भारत के लिए कितनी महत्वपूर्ण है , इसका जवाब तलाशने से पहले समझना ज़रूरी है कि एमटीसीआर है क्या? दरअसल दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया भर में हथियारों की होड़ से ये चिंता हुई कि इन विनाशकारी हथियारों के गलत इस्तेमाल से कहीं पूरी मानवता ही खतरे में न पड़ जाए. इस चिंता के चलते परमाणु हथियारों के अप्रसार और उनके आयात-निर्यात पर नियंत्रण की कोशिशें शुरू हुईं. सीटीबीटी, एनपीटी, एमटीसीआर जैसे समूह और संधियां इन्हीं की उपज हैं.

मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम की स्थापना जी -7 में शामिल देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका ने अप्रैल 1987 में की थी . भारत इसका 35वां सदस्य देश है. ये मिसाइल टैक्नोलॉजी विकसित करने में सक्षम देशों का समूह है. इसके सदस्य ये सुनिश्चित करते हैं कि उन्होंने जो मिसाइल तकनीक विकसित की है वो किसी गैरजिम्मेदार देश को न बेच दी जाए. ये देश 300 किलोमीटर से ज़्यादा दूर मार करने वाली या 500 किलो से ज्यादा भार ले जाने वाली मिसाइलों की तकनीक ग्रुप के बाहर के देशों को नहीं बेच सकते. ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे को ही मिसाइल तकनीक आयात-निर्यात करते हैं. यानी ग्रुप का सदस्य बनने के बाद भारत अपनी मिसाइलें बाकी देशों को बेच पाएगा और वहां से जरूरी मिसाइल तकनीक खरीद भी पाएगा. उदाहरण के लिए भारत का मित्र देश होने के बाद भी रूस ने भारत को क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक देने से मना कर दिया था. वजह थी भारत का एमटीसीआर का सदस्य न होना. इसी तरह भारत इजरायल से एरो-2 जैसी मिसाइलें चाहकर भी नहीं खरीद पा रहा था और न ही अपनी अत्याधुनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस दूसरे देशों को बेच पा रहा था. एमटीसीआर की सदस्यता के बाद अब उसके लिए रास्ते खुल गए हैं.

लेकिन एमटीसीआर की सदस्यता को महज तकनीकी फायदे के तौर पर देखना इस उपलब्धि को कम आंकना होगा. यह उससे आगे की चीज है. भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर साइन नहीं किए हैं, क्योंकि उसका मानना है कि ये संधि भेदभावपूर्ण है और बराबरी के सिद्धांत के उलट है लेकिन इसके बावजूद परमाणु तकनीक को लेकर उसका व्यवहार एनपीटी पर साइन कर चुके देशों से किसी मायने में कम नहीं है. एक तरफ एनपीटी पर साइन कर चुका चीन जैसा देश उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को मिसाइल तकनीक बेचने का लोभ नहीं छोड़ सका. वहीं भारत ने परमाणु अप्रसार का सख्ती और जिम्मेदारी से पालन किया.

एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद सालों की रुकी भारत की महत्वाकांक्षी मिसाइल परियोजनाएं फिर रफ्तार पकड़ सकेंगी. भारत ड्रोन विमान खरीद सकता है क्योंकि मिसाइल की तरह यूएवी के आयात-निर्यात पर भी एमटीसीआर का नियंत्रण रहता है. कई देशों ने भारत द्वारा विकसित ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों में दिलचस्पी दिखाई है. भारत अब इसका निर्यात कर सकता है. क्रायोजेनिक इंजन बनाने का भारत का सालों पुराना सपना अब साकार होगा क्योंकि वे इसके लिए जरूरी तकनीक खरीदने के रास्ते की एक बड़ी अड़चन को पार कर चुका है. इस इंजन के बनने से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई मिलेगी. इजरायल के साथ एरो-2 जैसी एंटी बैलेस्टिंक मिसाइल का सौदा भी अब हकीकत बन जाएगा. इससे भारत का डिफेंस सिस्टम और बुलंद होगा. भारत दक्षिण एशिया की बड़ी ताकत बनकर उभरेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ योजना को भी इससे काफी मदद मिलेगी.

यही नहीं जिस तरह एमटीसीआर में एक मत से भारत की दावेदारी पर मुहर लगी ,उससे भारत के एनएसजी में शामिल होने के दावे को भी मजबूती मिली है. साल के अंत में एनएसजी की बैठक में जब एक बार फिर भारत की सदस्यता का मुद्दा विचार के लिए आएगा तो विरोध कर रहे देशों के पास अपने समर्थन में कोई तर्क नहीं बचेगा. जिस तरह पिछले साल इटली ने भारत को एमटीसीआर का सदस्य नहीं बनने दिया था लेकिन इस बार उसने हरी झंड़ी दे दी, उसी तरह एनएसजी में भी चीन जैसे देशों को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.