छोटे उद्योग – देखन में छोटन लगे

Sandeep Yash
File photo: Small and medium enterprises in india

File photo: Small and medium enterprises in india

महात्मा गाँधी मानते थे कि गांव के विकास के बिना देश का विकास संभव नहीं है। तो जनाब देश में तमाम गांव,कस्बे और छोटे शहर हैं जहाँ एसएमई (SMEs) उद्यमिता को बढ़ावा देकर रोजगार और आय पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। सीधी बात है कि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है, कृषि भूमि पर भी दबाव बढ़ रहा है और वो सीमित श्रम शक्ति को ही सोख सकती है। तो एक बड़ा श्रमजीवी तबका बचता है जो अपनी मेधा और कौशल तथा स्थानीय संसाधनों को SMEs के साथ जोड़ कर तमाम घरों में रोजी -रोटी की व्यवस्था कर सकता है। पर मौके कम या न होने के चलते ये तबका रोटी की तलाश में अक्सर दूसरे शहरों और राज्यों की तरफ बढ़ जाता था। पर कोविद 19 जैसी महामारी ने सारा निजाम ध्वस्त कर डाला। और इससे उबरने में फिलहाल हमें चुनौतियाँ और अवसर- दोनों स्वीकारने होंगे।

सरकार चौकन्नी है और जानती है घायल अर्थवयवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए देश भर में फैली SMEs को पहले संजीवनी देनी होगी। और इसकी पहल खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। हाल ही में उन्होंने 20 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज में 3 लाख करोड़ रुपये इस सेक्टर को दिए हैं। जान लीजिये कि हमारे छोटे व्यवसायों की भारत की $ 2.9 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था में लगभग एक-चौथाई की हिस्सेदारी है और ये करीब 50 करोड़ श्रमिकों को रोज़गार देते हैं। तो प्रोत्साहन पैकेज के तहत कई मूलभूत सुधार भी किये गए हैं जैसे –

1 . अब 100 करोड़ रुपये टर्नओवर तक की कंपनी MSME की नयी परिभाषा के दायरे में आ गयी है
2 . इस क्षेत्र में विनिर्माण (Manufacturing) और सेवाओं (Services) के बीच अंतर को हटा दिया गया है
3 . 100 फ़ीसदी क़र्ज़ की व्यवस्था की गयी है, 12 महीने तक मूल न लौटाने का भी प्रावधान भी किया गया है

तो सरकार, कुटीर उद्योग, मध्यम और छोटे उद्यमों से जुड़े छोटे कारोबारियों को चार वर्षों के लिए 3 लाख करोड़ रुपये तक कोलेट्रल- फ्री क़र्ज़ देगी। विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसका फायदा करीब 6 करोड़ संगठित और असंगठित छोटे उद्यमों (MSME) को मिलेगा। और ये योजना 31 अक्टूबर तक उपलब्ध होगी।  आपकी जानकारी के लिए दुनिया में सबसे ज़्यादा MSME भारत में हैं – इनमें करीब 97 % सूक्ष्म और असंगठित हैं जिनमें 10 से कम श्रमिक काम करते हैं।  यही वजह है कि सरकार इस सेक्टर पर इतना तवज्जो रही है। CII के डाटा के मुताबक ये स्व-वित्तपोषित निजी फर्म, निजी सहकारी संस्थाएं, निजी स्व-सहायता समूह, खादी, और ग्राम और कॉयर उद्योग, न केवल रोजगार के बड़े अवसर प्रदान करते हैं, बल्कि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगीकरण को लेकर क्षेत्रीय संतुलन तय भी करते हैं।  इनमें लगभग 20% MSME ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में काम कर रही हैं।   – कुछ और तथ्य आपसे साझा करते हैं।  msme.gov.in (2017) के आकड़ों के मुताबिक़

– भारत में एसएमई कुल औद्योगिक इकाइयों का 95% थीं
– कृषि क्षेत्र के बाद एसएमई रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर हैं
– एसएमई क्षेत्र लगभग 6000 से अधिक उत्पादों का उत्पादन करता है
– जीडीपी : विनिर्माण में लगभग 6.11% और सेवा क्षेत्र में 24.63% का योगदान हैं।
– एसएमई आउटपुट: कुल भारतीय विनिर्माण उत्पादन का 45% है
– एसएमई निर्यात: कुल निर्यात का 40% है
– 16 % बैंक ऋण एसएमई को मिलते हैं
– एसएमई के फिक्स्ड एसेट्स 1,471,912.94 करोड़ रुपये थे
– एसएमई विकास की औसत दर 10% से ज़्यादा रही

साल 2020 के पहले तिमाही तक इस क्षेत्र का GDP में योगदान 29 % और निर्यात 48 % रहा। और आज जब भारत कोविद – 19 काल के आगे का रोडमैप बना रहा है तो इस क्षेत्र से जुड़े जानकार इस नयी पहल में ये चार सुधार देख रहे हैं

पहला – MSMEs को ऑनलाइन बढ़ावा:

COVID-19 ने एक मजबूत सबक व्यापार जगत को सिखाया है। और वो है डिजिटल प्लेटफार्म से बिज़नेस के जुड़ाव का।  यह जुड़ाव वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से होता है। ये न केवल ब्रांड रिकॉल बनाने में मदद करता है, बल्कि चैनलों को बढ़ा कर व्यापार में वृद्धि भी करता है।  आज सोशल डिस्टन्सिंग, लाक्डॉन और वर्क फ्रॉम होम के दौर में डिजिटल तकनीक उपभोक्ता और व्यापारी और उद्यमी दोनों के लिए वरदान साबित हो रही है। तो इस प्लेटफार्म पर सवार MSMEs सरकार के 5 खरब रुपये की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने में मजबूत भूमिका निभा सकती हैं।

दूसरा – MSME से जुड़े श्रमिकों की सुरक्षा :

ये माना जा रहा है कि हाल में महामारी के चलते इस तबके ने बड़ी संख्या में पलायन किया है जिससे कुछ वक़्त तक समस्या आ सकती है। भारत सरकार की वर्किंग ग्रुप ऑन माइग्रेशन की रिपोर्ट में 54 ऐसे जिलों की पहचान की गई है जहाँ से लगभग आधे श्रमिक दूसरे राज्यों में काम करने जाते हैं। इनमें से 36 जिले पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं. इसके अलावा नदिया और मिदनापुर (पश्चिम बंगाल), गंजम (ओडिशा), गुलबर्गा (कर्नाटक), जलगाँव (महाराष्ट्र) और पाली (राजस्थान) और पश्चिमी यूपी में कुछ ज़िले शामिल हैं। इस जानकारी के साथ पूरे भारत में श्रम की मांग और आपूर्ति के मुताबिक़ विशेष परिवहन व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए। दूसरी ओर श्रमिकों के लिए प्रोविडेंट फंड की हालिया सीमा 15 हज़ार रुपये से बढ़ा कर  30 हज़ार रुपये किया जाना चाहिए। जो मजदूर घर लौट गए हैं, उन्हें आयुष्मान भारत अस्पताल के बीमा कार्डों द्वारा कवर दिया जाना चाहिए जिससे वो आश्वस्त होकर काम पर वापस आएं और इस समूह को प्रमाणित चिकित्सा एजेंसियों द्वारा कारखाना स्थलों पर स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।

तीसरा – सतत वित्तीय प्रोत्साहन:

विशेषज्ञ कहते हैं कि लिक्विडिटी यानी नकदी सहयोग एमएसएमई के पुनरुद्धार की कुंजी है। वर्त्तमान में इन छोटी इकाइयों को तगड़ा नुक्सान हुआ है। तो इन्हें वित्तीय मदद देने वाली संस्थाओं जैसे माइक्रोफाइनांस संस्थानों (एमएफआई) और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को मजबूत किया जाना ज़रूरी है।  बदले में ये संस्थाएं MSMEs को वित्तीय संजीवनी दें। साथ ही एमएसएमई के वर्किंग कैपिटल की करंट अकाउंट लिमिट को कम से कम 75 प्रतिशत बढ़ाया जाना चाहिए और सरकार को इसके लिए गारंटी देनी चाहिए। अटका हुआ भुगतान जल्द से जल्द जारी किया जाना चाहिए जिसका निर्देश मोदी सरकार पहले ही दे चुकी है। जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट और आयकर रिफंड में तेजी लाई जानी चाहिए। एक और ज़रूरी बात, ऐसे समय में जब उद्योग बिजली का उपयोग नहीं कर रहे हैं तो बिजली पर न्यूनतम शुल्क माफ कर दिया जाना चाहिए।

चौथा – कच्चे माल की समस्या का निदान: 

हज़ारों टन आयातित कच्चा माल लॉकडाउन के कारण बंदरगाहों या हवाई अड्डों पर अटक गया है। और इसका किराया MSMEs को देना पड़ रहा है।  सरकार इस लागत को माफ़ कर सकती है। और इस व्यवस्था को स्थायी बना सकती है।

इन कदमों के अलावा विशेषज्ञ कहते हैं हर MSME को समीक्षा कर, नए सिरे से अगले 3 – 6 महीने के लिए विकास योजनाएं और व्यवहारिक रणनीतियां बनानी होंगी, सामने आ खड़ी नयी सच्चाइयों को इन प्लान्स में बुनना होगा। इनमें उन श्रमिकों की वापसी भी शामिल है जो अपने कमाए कौशल से इनकी योजनाओं में नयी जान फूंक सकते हैं और स्थाइत्व ला सकते हैं। पर इतना काफी नहीं है, वर्तमान से सबक ले MSME सेक्टर को अगले कुछ बरसों को ध्यान में रख आपदा प्रबंधन योजनाओं में भी निवेश करना होगा।  ऐसी योजनाएं जो डिजिटल हों, संकट में भी उत्पादकता बनाये रखने वाली हों और दूरदर्शी हो ताकि भविष्य में आने वाले किसी भी बवंडर से बचा जा सके – कम से कम नुक्सान के साथ। तो MSMEs की सेहत सरकार की सक्रियता पर निर्भर है। और इस सेहत तथा मजबूती से जुड़ा है महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज्य और उन लाखों श्रमिकों का सपना जो आज अपने नीड़ों में रह कर ससम्मान रोटी कमाने की बाट जोह रहे हैं। जानकार कहते हैं कि MSMEs, सरकार और श्रमिक वर्ग का ये गठजोड़ उत्तर कोविद – 19 काल में नए भारत की इबारत ज़रूर लिखेगा। इसका आगाज़ भी हो चुका है।