जनता को फायदा क्यों नहीं देते बैंक ?

File Photo ( PTI )

File Photo ( PTI )

एक लंबे अंतराल के बाद रिज़र्व बैंक ने बीते दिनों रेपो और रिवर्स रेपो रेट में 0.50 प्रतिशत की कमी का ऐलान किया. यह खबर जितनी उद्योग जगत के लिए राहत वाली है, उतनी ही लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए. महंगाई से मुकाबले के लिए अब उनकी जेब में थोड़े पैसे और बच सकेंगे. हालांकि, ये जरूरी नहीं कि हर लोनधारक को केंद्रीय बैंक के इस उदार फैसले का लाभ मिले क्योंकि उनकी ईएमआई का फैसला आखिरकार उनके बैंकों को ही करना होता है.

आगे बढऩे से पहले रेपो और रिवर्स रेपो को गहराई से समझना जरूरी है. रेपो वो ब्याज दर होती है, जिसपर बैंक आरबीआई से लोन लेते हैं, उसके उलट रिवर्स रेपो बैंकों द्वारा आरबीआई के पास पैसा रखने पर मिलने वाला ब्याज है. रेपो रेट में कमी से बैंकों को ब्याज की राशि कम चुकानी होगी. जबकि रिवर्स रेपो में कमी से बैंकों को आरबीआई से कम ब्याज मिलेगा. काफी वक्त से उम्मीद की जा रही थी कि रिजर्व बैंक नीतिगत दरों में कटौती करेगी. औद्योगिक विकास को गति देने के लिए यह जरूरी भी था, लेकिन महंगाई के बढ़ते आंकड़े और वैश्विक कारणों को मद्देनजर रखते हुए केंद्रीय बैंक दरों में बदलाव से कतरा रहा था. इस सख्ती के लिए रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन की आलोचना भी शुरू हो गई थी, यहां तक कि उन्हें धमकी भी मिली थी.

अब जब थोक महंगाई दर 10 महीने के निचले स्तर पर आई तो रिजर्व बैंक ने सीधे रेपो और रिवर्स रेपो दरों में 0.50 प्रतिशत की कटौती कर दी. ये कटौती उम्मीदों से ज्यादा है, क्योंकि मौजूदा सख्ती को देखते हुए माना जा रहा था कि आरबीआई ज्यादा से ज्यादा 0.25 फीसदी की कटौती करेगा. महंगाई को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत दरों का सहारा लेना, रिजर्व बैंक का सबसे पुराना हथियार है. आर्थिक पैमाने में इस कवायद को बहुत कारगर माना जाता है. इसके पीछे सोच है कि ब्याज दरें बढऩे से कर्ज़ महंगा होगा, कर्ज़ महंगा होने से लोगों की क्रय शक्ति कम होगी और बाजार में मांग एवं उत्पादन के बीच की खाई में कमी आएगी. वैसे, इस कवायद की खिलाफत करने वालों की भी कमी नहीं है.

खैर ये एक अलग मुद्दा है, फिलहाल हम बात कर रहे हैं रिजर्व बैंक से मिली छूट के बारे में. जो लोग लंबे वक्त से लोन के सस्ता होने की आस लगाए बैठे हैं, उन्हें रिजर्व बैंक के इस कदम का लाभ मिलना ही चाहिए. लेकिन इस बात की संभावना अधिक नहीं है. कई बैंकों ने अब तक पिछली कटौतियों का लाभ भी लोनधारकों को नहीं दिया है, जो 100 से ज्यादा बेस अंकों की है. आरबीआई की मौजूदा घोषणा के बाद कुछ बैंकों ने ब्याज दरों में कमी के त्वरित फैसले लिए, लेकिन अधिकतर अब भी इससे कतरा रहे हैं. इनमें निजी बैंका की संख्या अच्छी-खासी है. जो लाभ देने के लिए आगे आ रहे हैं, उनके लाभ का प्रतिशत भी उम्मीदों के अनुरूप नहीं है. आरबीआई बैंकों के इस मिजाज को अच्छे से समझता है, इसलिए राघुराम राजन से लेकर आरबीआई के डिप्टी गर्वनर तक ने बैंकों से कटौती का लाभ ग्राहकों को पहुंचाने की अपील की. वित्तमंत्री अरुण जेटली को भी यही मांग दोहरानी पड़ी.

दरअसल, बैंकों के मामले में सीधी दखल का अधिकार किसी को नहीं है. यहां तक की रिजर्व बैंक भी केवल समझाइश दे सकता है, आदेश नहीं. नियमों के मुताबिक बैंकों को अपनी ब्याज दरें खुद तय करने का अधिकार है और यही अधिकार उन्हें मुनाफाखोर साहूकार बना रहा है. पिछले कुछ सालों में होम लोन पर ब्याज दरें कई बार बढ़ चुकी हैं, लेकिन जब बात कटौती की आती है तो बैंक कतराने लगते हैं. खासतौर पर नीतिगत दरों में कटौती का फायदा नए ग्राहकों को देने में दिलचस्पी दिखाई जाती है, ताकि उन्हें आकर्षित किया जा सके. पुराने ग्राहक तो पहले से ही उनसे जुड़े हुए हैं.

लोग भले ही कितने भी जागरुक क्यों न हो गए हों, लेकिन एक बैंक से दूसरे बैंक में लोन शिफ्ट कराने से आज भी वो बचना चाहते हैं. क्योंकि इसकी प्रक्रिया जितनी सरल बताई जाती है, उतनी होती नहीं. गौर करने वाली बात ये भी है कि ज्यादातर बैंक छोटे लोन को अपने यहां शिफ्ट कराने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते. ऐसे में छोटे ग्राहकों के लिए पुराने बैंक में बने रहने के सिवा कोई और चारा नहीं रह जाता. ये प्रक्रिया साहूकार नीति से जुदा नहीं है. पहले तो लोन को इतना सरल बनाया गया कि आम इंसान को यह बोझ भी हलका लगने लगा और जब इस हल्के बोझ के सहारे उसने सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो ब्याज दरें बढ़ाकर उसके पैरों में जंजीरें लगा दी गईं.

कोई व्यक्ति जब कर्ज़ लेता है तो उसे चुकाने के लिए अपनी जरूरतों में कटौती का खाका पहले ही तैयार कर लेता है. ब्याज़ दरों में बार-बार वृद्धि इस कटौती को और भी चौड़ा करती जाती हैं. मौजूदा वक्त में बैंकों के इस भेदभाव वाले रवैये पर लगाम लगाने की जरूरत है. हालांकि ये पहल सरकार की तरफ से ही हो सकती है, आरबीआई के हाथ इस मामले में बंधे हुए हैं. बैंकों को यह समझाना बेहद जरूरी है कि जिस वजह को आधार बनाकर वो ब्याज़ दरों में वृद्धि करती हैं, उसके खत्म होने का लाभ भी ग्राहकों को मिलना चाहिए. इस पर सबसे पहला हक उन ग्राहकों का होना चाहिए, जो पहले से ही लोन का भार उठा रहे हैं, क्योंकि नया ग्राहक लोन लेने या न लेने का फैसला कर सकता है, मगर जो पहले से ही लोन ले बैठा है वो इससे पीछे नहीं हट सकता.