जो झेलम ने झेला, और जो लोगों ने…

Abhay Mishra

kashmir_floodsझेलम के पानी ने जिस खामोशी से पूरे कश्मीर को डूबो दिया उसे बचाया जा सकता था. एक बेहद लचर प्रशासन की बानगी देखिए, जम्मू कश्मीर में बाढ़ की चेतावनी जारी करने वाली कोई भी केंद्रीय इकाई नहीं है. झेलम पर श्रीनगर के करीब बने केंद्रीय जल आयोग के तीन हाइड्रोलॉजिकल स्टेशनों (इनका काम सिर्फ पाकिस्तान को दिए जा रहे पानी के आंकड़े को सहेजना है) ने 4 सितंबर को ही भांप लिया था कि खतरा तेजी से बढ़ रहा हैं.

श्रीनगर के सबसे पास राम मुंशी बाग हाइड्रोलॉजिकल स्टेशन के अधिकारियों ने 5 सितंबर की सुबह प्रशासन को चेतावनी दे दी. बाढ़ 7 तारीख को आई यानि राज्य सरकार के पास करीब 60 घंटे थे अपने लोगों को बचाने के लिए परन्तु कुछ नहीं हुआ, बाद में जैसा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, ‘कि इस बाढ़ में मेरी सरकार ही बह गई.‘ से पता चलता है कि सरकार में नीचे से ऊपर तक संवाद का क्या स्तर है.

राज्य सरकार का दावा था कि उसे इस सैलाब का अंदेशा ही नहीं था. तो कैसे रातोंरात कैबिनेट के सारे मंत्री श्रीनगर से बाहर सुरक्षित स्थानों पर चले गए? एकमात्र वीआईपी कॉलोनी जवाहर नगर को छोड़ दिया जाए, जो झेलम के पेट को काट कर ही बसाई गयी है, तो किसी भी नेता, मंत्री या राजनीतिक रसूख वाले शख्स के परिवार का कोई भी इस बाढ़ का शिकार नहीं हुआ. कश्मीर के सराकारी कुलीनों ने आपदा में भी हकदारी की जाति व्यवस्था नहीं छोड़ी.

बाढ़ के आने पर घाटी में सारे फ्लड चैनल बंद थे. जवाहर नगर की तरह ही झेलम की जमीन नादरू नंबल, नरकारा नंबल, और होकारसर पर रिहायशी कालोनियां बन गई है. 7 सितंबर को आई बाढ़ के बाद 9 सितंबर को सरकार को अहसास हुआ कि खतरा गंभीर है तो मुख्यमंत्री के आदेश से जारी राहत सामग्री के ट्रकों को स्थानीय प्रशासन ने इसलिए रवाना नहीं होने दिया क्योंकि उनका पंजीयन नहीं हुआ था. क्या ऐसे अति सक्रिय अधिकारियों के खिलाफ 302 का मामला नहीं दर्ज होना चाहिए?

राज्य में एक बाढ़ नियंत्रक विभाग काम करता है. उसने चार साल पहले यानी फरवरी 2010 में रिपोर्ट जारी कर बताया था कि अगले 5 सालों में पूरे राज्य को डूबाने वाली भयानक बाढ़ आ सकती है. इस रिपोर्ट को स्थानीय अखबारों ने छापा भी था. रिपोर्ट में बकायदा डेढ़ लाख क्यूसेक पानी नदी से निकलने का जिक्र था. इन रिपोर्टों का पूरा ढेर दिल्ली भी भेजा गया था. लेकिन राज्य की तरह केंद्र ने रिपोर्ट की तरफ देखना, सोचना, विचारना गंवारा नहीं किया.

कश्मीर के गुनहगार सिर्फ यही नहीं हैं. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एनडीएमए के नक्शों में बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों में जम्मू कश्मीर को शामिल नहीं किया गया है. जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने राज्य को आकस्मिक बाढ़ का क्षेत्र माना है. इससे पहले 1992 और 1959 में भयानक बाढ़ आ चुकी है.

केंद्र ने अपनी ओर से दिखाई तत्परता, सरोकार, उदारता और पाक अधिकृत कश्मीर में भी मदद की पेशकश से वाहवाही लूटी. लेकिन मोदी की कोशिशों को उनके प्रचार तंत्र ने हल्का कर दिया. उन्होंने कश्मीर बाढ़ की तुलना पिछले साल केदारनाथ हादसे करते हुए कहा कि उत्तराखंड हादसे में ज्यादा जाने बचाई जा सकती थी. मनमोहन यह सोच कर बैठे रहे कि राज्य जब सहायता मांगेगा तब देंगे. बेशक मोदी ने राहत कार्यों में राजनीति को आड़े नहीं आने दिया लेकिन बीजेपी के दूसरी पांत के नेता इसे आने वाले चुनावों में अपने लिए सुनहरा अवसर मान कर चल रहे हैं. इसे परवान चढ़ाते हुए बीजेपी नेताओं ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वो राहत सामग्री का समान वितरण नहीं कर रही. राजौरी में तबाही ज्यादा हुई है लेकिन सिख बहुसंख्यक होने के चलते वहां राहत नहीं पहुंच रही. दिल्ली बीजेपी द्वारा भेजे गए कई ट्रक सीधे राजौरी गए.

राजौरी में झमीरा नाला है, एक तरह की बरसाती नदी कह लिजिए, गाद और कचरे से पटा यह नाला हमेशा सूखा पड़ा रहता है. हालांकि इसकी सफाई खुदाई और देखरेख का अच्छा खासा बजट हैं. जो कागजों में लगातार नाले को लगातार खूबसूरत बनाता रहा हैं. बाढ़ के दौरान राजौरी में कहर ढाने वाला यह नाला ही था. सौ साल से भी पहले आई भयानक बाढ़ से राजौरी को इस नाले ने बचा लिया था, क्योंकि इसकी गहराई ने पानी को अपने में समेट लिया था.

जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश में नदी झीलों के किनारे अवैध निर्माण जारी है. इसे रोकने की कोई पहल भी नहीं दिखती. नदियों के लिए बनी तटीय नियमन अधिनियम की 1982 की अधिसुचना कभी लागू ही नहीं हो सकी. केंद्रीय जल आयोग की सिफारिशें भी ठंडे बस्ते में डाल दी गईं. समुद्र तटीय नियमन कानून को भी सुनामी के बावजूद लचर बना दिया गया. अब केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 और पर्यावरण रक्षा कानून 1986 की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है, जो संकेत है कि कानून कमजोर करने की कवायद हो रही है.

नवम्बर ठंड के साथ ही शुरु होगा. एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लाखों लोगों को छत मुहैया कराने की है. कश्मीर के लोग केंद्र के भरोसे यह उम्मीद कर रहे हैं कि राष्ट्रीय इन्फ्रास्टचर कंपनियां पूर्वनिर्मित घर बनाकर उन्हे एक ओर आपदा से बचा लेगी. झेलम उदास है और लोग भी. देखिए, राहत कब अपने रास्ते पहुंचती है.