डॉ तुलसीरामः मणिकर्णिका के भगीरथ का अवसान

RSTV Bureau
दलित लेखन में अपना एक अलग स्थान रखने वाले डॉ. तुलसी राम का शुक्रवार को निधन हो गया. वे पि‍छले कुछ वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे.
आजमगढ़ से तालुक्कात रखने वाले डॉ. तुलसी राम बचपन में सामाजिक मान्यताओं और बंधनों से जुझे. उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता. गरीबी का अभाव उनकी ज़िदगीं में साये की तरह रहा लेकिन आरंभिक जीवन में उन्हें जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा झेली उसकी उनके जीवन और साहित्य में मुखर अभिव्यक्ति हुई.
शुरुआती तालीम आजमगढ़ से लेने के बाद उनकी ज़िदगीं के दुसरे अध्याय की शुरुआत बनारस से की. बचपन से किताबों के शौकीन डॉ तुलसीराम जब मार्क्सवाद के संपर्क में आये तो उन्हें इससे बहुत संबल और साहस मिला.
बनारस आने के बाद उनकी जान पहचान कुछ लेखकों से हुई और अपनी ज़िदगी के प्रेरणा रहे डॉ॰ भीमराव अंबेडकर की रचनाओं पर अध्ययन किया. इससे उनकी रचना-दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन हुआ. बनारस विश्व विद्यालय से अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे दिल्ली आये और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्याल में एक प्रोफ़ेसर के रूप में काम किया.
डॉ. तुलसीराम ने अपनी लेखन में दलितों के तमाम कष्टों, यातनाओं, उपेक्षओं, प्रताड़नाओं को खुलकर लिखा और सामाजिक बंधनों पर जमकर हमला बोला.
डॉ तुलसीराम की लेखनी की एक और विशेषता जो उन्हें तमाम दलित लेखकों से अलग करती है, वह उनके अचेतन पर बुद्ध का गहरा प्रभाव है. उनके जीवन के हरेक पल खासकर निर्णायक क्षणों में बुद्ध हमेशा सामने आते हैं. इसका उदाहरण उनकी आत्मकथा मुर्दहिया और मणिकर्णिका में दिखता है.
गीत और कविताएं डॉ तुलसीराम के जीवन का अभिन्न अंग रहे इसीलिए उनके मुर्दहिया और मणिकर्णिका दोनों की ही लेखन शैली में इन दोनों के बहाव दिखे. उनकी आत्म कथा के दो खण्डम ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ अनूठी साहित्यिक कृति होने के साथ ही पूरबी उत्तर प्रदेश के दलितों की जीवन स्थितियों तथा साठ और सत्तर के दशक में इस क्षेत्र में वाम आन्दोरलन की सरगर्मियों के जीवन्तज खजाना हैं.
इसमें बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के सामाजिक आत्म को प्रोफ़ेसर तुलसीराम ने अपनी स्मृतियों का सहारे अपने आत्म से जोड़ने की कोशिश की.