दक्षिण चीन सागर में भारत का बहुत कुछ दाँव पर है

Beijing : State Council Information Office spokesman, Guo Weimin holds up white policy paper on South China Sea during a press briefing at the State Council Information Office in Beijing, Wednesday, July 13, 2016. China blamed the Philippines for stirring up trouble and issued a policy paper Wednesday calling the islands in the South China Sea its "inherent territory," a day after an international tribunal said China had no legal basis for its expansive claims. AP/PTI

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दक्षिण चीन सागर पर हेग अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के फैसले से प्रशांत महासागर क्षेत्र में तनाव है. कोर्ट ने इस इलाके पर चीन के दावे को खारिज कर फिलिपींस के पक्ष में फैसला सुनाया है, जिससे भारत का ये पड़ोसी आगबबूला है. उसकी ओर से लगातार तीखे बयान आ रहे हैं.

दूसरी ओर अमेरिका और जापान सहित अन्य देश इस मामले में चीन को कोई रियायत देने के मूड में नहीं हैं. भारत के लिए यह इसलिए भी चिंता की बात है क्योंकि इस क्षेत्र में उसका बहुत कुछ दांव पर लगा है. भारत किसी भी सूरत में इस इलाके पर चीनी एकाधिकार बर्दाश्त नहीं कर सकता.

पांच महासागरों के बाद दुनिया का सबसे बड़ा जलक्षेत्र दक्षिण चीन सागर सिंगापुर से ताइवान तक करीब 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है. इसके एक तरफ चीन तो दूसरी तरफ वियतनाम, मलेशिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया और ब्रूनेई जैसे देश. अंतरराष्ट्रीय समुद्र कानून के मुताबिक किसी भी देश के समुद्र तट से 12 समुद्री मील तक उस देश की समुद्री सीमा होती है. इसके बाद के 12 समुद्री मील यानी तट से 24 समुद्री मील तक के क्षेत्र में वो देश प्रदूषण, कर, सीमाशुल्क और अप्रवासन को लेकर अपने कानून लागू कर सकता है लेकिन उसके बाहर का जल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाता है. इस हिसाब से दक्षिण चीन सागर का अधिकतर हिस्सा अंतररारष्ट्रीय समुद्र सीमा में आता है जहां से पूरी दुनिया के जहाज बेरोकटोक आवागमन कर सकते हैं और ऊपर विमान उड़ान भर सकते हैं. चीन 1947 के एक नक्शे के आधार पर दावा करता है कि दक्षिण चीन सागर का अधिकतर हिस्सा चीनी क्षेत्र है. इसकी बड़ी वजह है इस क्षेत्र में मौजूद विशाल टापू. इसमें पारासेल और स्प्रैटली आइलैंड शामिल हैं. स्प्रैटली 750 चट्टानों, टापुओं, प्रवालद्वीप का समूह है जबकि पैरासेल ऐसे 130 टापुओं का समूह है. पारासेल और स्प्रैटली द्वीप समूह को कई देश अपना पूरा या आंशिक हिस्सा बताते हैं.

चीन 1947 के अपने नक्शे के आधार पर इनमें से अधिकतर टापुओं पर अधिकार जताता है. अमेरिका, जापान जैसे देशों की आपत्ति दरकिनार कर चीन कुछ साल से वहां कृत्रिम टापू बनाकर उनपर अड्डे विकसित कर रहा है. फिलिपींस चीन के साथ विवाद बढ़ने पर मामले को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में ले गया तो उसने फैसला फिलिपींस के पक्ष में सुना दिया. चीन भले ही फैसले को खारिज करे लेकिन पूरी दुनिया के सामने वो बेनकाब हुआ है. तमाम देश उस पर फैसले का सम्मान का दबाव डाल रहे हैं.

UNDATED : In this Sept. 23, 2015, photo, provided by Filipino fisherman Renato Etac, a Chinese Coast Guard boat sprays a water cannon at Filipino fishermen near Scarborough Shoal in the South China Sea.  A landmark ruling on an arbitration case filed by the Philippines that seeks to strike down China's expansive territorial claims in the South China Sea will be a test for international law and world powers. China, which demands one-on-one talks to resolve the disputes, has boycotted the case and vowed to ignore the verdict, which will be handed down Tuesday, July 12, 2016,  by the U.N. tribunal in The Hague.  AP/PTI

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दक्षिण चीन सागर में दुनिया भर के देशों की दिलचस्पी बेवजह नहीं है. इस इलाके में तेल और गैस के विशाल भंडार हैं. इस समुद्री रास्ते से हर साल 7 ट्रिलियन डॉलर का बिजनेस होता है. वियतनाम ने भारत सरकार की तेल और गैस कंपनी ओएनजीसी के साथ इस इलाके में वियतनाम के छोटे द्वीपों पर तेल और गैस की खोज के लिए समझौता किया था. चीन तब भी इसपर भड़का था, जबकि भारत दक्षिण चीन सागर को पूरी दुनिया की संपत्ति बताता रहा है.

दरअसल इस इलाके में भारत का बहुत कुछ दांव पर है. उसका 55 फीसदी आयात-निर्यात इसी समुद्री रास्ते से होता है. दूसरे देशों के साथ भारत के सैन्य रिश्तों के लिहाज से भी भारत के लिए ये जरूरी है कि ये इलाका किसी दूसरे देश की दखलंदाजी से मुक्त रहे. चीन भले ही ये कहे कि उसका इस इलाके से आवागमन पर रोक का कोई इरादा नहीं है लेकिन पूरी दुनिया जानती है कि एक बार चीन के कब्जे को वैधता मिली तो वो किस हद तक जा सकता है. वैसे चीन ने भी इस इलाके में एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन (एडीआईजेड) घोषित करने की धमकी देकर माहौल में तनाव घोल दिया है. उसने तीन महीने के युद्धाभ्यास का भी ऐलान किया है. दूसरी ओर अमेरिका चीन को कोर्ट का फैसला स्वीकार करने और उत्तेजक बयानों से बचने की नसीहत दे रहा है. व्हाइट हाउस ने साफ कहा है कि बड़े देशों की ओर से अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नुकसानदेह हो सकता है.

चीन के विस्तारवादी रवैए से दुनिया वाक़िफ़ है. अरुणाचल और लद्दाख पर उसका रवैया दोस्ताना नहीं है .ऐसे में दक्षिण चीन सागर पर उसके रुख में नरमी आएगी ऐसा नहीं लगता. दूसरी ओर अमेरिका, जापान, फिलिपींस जैसे देश चीन को इस मुद्दे पर मनमानी नहीं करने देंगे.  ऐसे में दक्षिण चीन सागर के दुनिया के नक्शे पर नए रणक्षेत्र के रूप में तब्दील होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता. चिंता की बात ये है कि टकराव बढ़ा तो कीमत भारत को भी चुकानी होगी.