दिल की ज़बान कोई फ़र्क़ नहीं करती

Rajesh Badal

Sahir_poet2उस हिंदुस्तान की बात ही निराली थी. ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा था लेकिन वतन पे जान क़ुर्बान करने की हसरत लिए बच्चा पैदा होता था. ख़ून में मुक्ति की चाहत घुल गई थी. इसलिए उसमें हरारत का अहसास तो पहली साँस लेते ही पता चल जाता था. सोच पिंजरे में कैद थी, साँस पर पहरा था और ज़ुल्म की भट्टी में सुखों की आस उबल रही थी. यह केवल गोरी हुक़ूमत के कारण नहीं था. उस दौर का हिंदुस्तानी समाज भी कमोबेश ऐसा ही था. यह समाज ज़ाती ज़िंदगी को उड़ान भरने के लिए पंख नहीं देता था. आधी आबादी परदे में दम तोड़ती थी. लड़कियों के लिए स्कूलों, मदरसों में जगह नहीं थी. बिरादरी ने उन पर ढेरों बंदिशें लगा रखी थीं. उन पर अत्याचार करते थे वे मर्द, जो घर के बाहर गोरों के सामने मेमने बने रहते थे और देहरी के भीतर पाँव रखते ही शेर बन जाते थे. दिनभर की कड़वाहट और कसैलेपन का ज़हर घर के अंदर उड़ेल देते.

ऐसे में लुधियाना का अब्दुल हई जब अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की कोशिश कर रहा था, तो अवचेतन में उस दौर के इंसान का भाव पनप रहा था. वो इंसान, जो हिंदू नहीं था, मुस्लिम नहीं था, सिख नहीं था, पारसी नहीं था और यहूदी भी नहीं था. वो इंसान, जो अपने रीति रिवाज़ों से तो बंधा था, लेकिन अभिव्यक्ति की नज़र से बंधनमुक्त था. भाषा का भेद उसके जेहन में नहीं था. भोर होते ही उगते सूरज की किरणें उसे लुभाती थीं. राह चलते मंदिर, मस्ज़िद या गिरजाघर मिलते ही उसके हाथ अपने आप प्रणाम के लिए उठ जाते और पल भर के लिए आँखे बंद हो जातीं. गणेश जी की सवारी निकलती तो बुर्क़ा नशीं महिलाएँ आरती की थाली में दिए की लौ पर बच्चों की बलैयाँ लेती और श्रद्धापूर्वक कुछ सिक्के चढ़ावे के तौर पर डाला करतीं. इसी तरह ताज़िए निकलते तो महिलाएँ सीधे पल्ले में घूंघट डाले बच्चों को गोद में लिए उनके नीचे से निकलतीं और उनकी सेहत के लिए दुआ माँगतीं. रात-रात भर कव्वालियों की महफ़िल सजती तो रामलीला और नौटंकी में भी भीड़ उमड़ती. ब्याह में हल्दी इधर भी चढ़ती, उधर भी. बन्ने यहाँ भी गाए जाते, वहाँ भी. दूल्हा दुल्हिन निकाह के बाद गाँव की देवी के मंदिर में मत्था टेकते और गुरुग्रंथ साहिब की अरदास के लिए पहुँचते. कौन जाने ऐसे ही किसी दिन सरदार बेग़म ने ग्रंथ साहिब की अरदास में अब्दुल हई के लिए शब्दों की ताक़त माँगी हो. वो ताकत जो शौहर फ़ज़ल मोहम्मद के सामने सरदार बेग़म कभी न दिखा पाई. शायद इसी अरदास का असर था कि अब्दुल हई को दुनिया ने साहिर के नाम से जाना. साहिर याने जादूगर. शब्दों का.

साहिर की पैदाईश के क़रीब 94 साल बाद कुछ आलोचक यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि साहिर के फ़िल्मी गीतों में हिंदी का इस्तेमाल लोकप्रियता के नज़रिए से किया गया. याने साहिर ने जानबूझकर हिंदी के शब्द गीतों में ढाले और वो ठूँसे हुए लगते हैं. आलोचक दूसरा तर्क शब्द-संतुलन का देते हैं. वो मानते हैं कि साहिर उर्दू अदब का इकलौता शख्स है, जिसने फ़िल्मी गीतों में अदबी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया. लेकिन वो यह भी कहते हैं कि साहिर के हृदय में हिंदी का स्वाभाविक झरना नहीं फूटता था और उन्होंने इरादतन हिंदी के शब्द अपनी रचनाओं में डाले. मैं इन तर्कों को विनम्रता से ख़ारिज़ करना चाहता हूँ. मिसाल के तौर पर साहिर की तल्खियाँ को लीजिए. उन दिनों साहिर अब्दुल हई था और कॉलेज में पढ़ता था. उमर के इसी पड़ाव पर वो लुधियाना से लाहौर जा पहुँचा और वहाँ उसने इस कविता संग्रह की रचना की. उस दौर के हिंदुस्तान में अब्दुल हई को कौन जानता था? इक़बाल, जोश, मजाज़, फ़ैज़ और फ़िराक़ उर्दू अदब के आसमान पर सितारों की तरह दमक रहे थे. जब तल्खियाँ छपकर आया तो यक ब यक साहिर बुलंदियों पर जा पहुँचे. इस संग्रह की सबसे मशहूर नज़्म परछाइयाँ मानी जाती है. इस नज़्म की पंक्तियाँ मैं यहाँ याद करना चाहूँगा–जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल/ मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरी की तरह. इसी नज़्म में आगे देखिए- धूल उड़ने लगी बाज़ारों में/ भूख उड़ने लगी खलिहानों में/ हर चीज़ दुकानों से उठकर/ रुपोश हुई तहख़ानों में. बदहाल घरों की बदहाली/ बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी/ महँगाई बढ़कर काल बनी/ सारी बस्ती कंगाल बनी. चरवाहियाँ रास्ता भूल गई/ पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं/ कितनी ही कुँआरीं अबलाएँ/ माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं.

यह नौजवान साहिर है. लुधियाना में पला-बढ़ा और जवान हुआ. अपने ख्यालों का इज़हार करने के लिए उसने जिन शब्दों का उपयोग किया, क्या वो जबरिया और ठूँसे हुए लगते हैं? कृपया यह भी ध्यान दें कि हिंदी के जिन शब्दों का इस्तेमाल हुआ, उनकी जगह उर्दू का कौन सा लफ़्ज उपयुक्त होता?

इससे पहले कि हम साहिर की शायरी में हिंदी के इस्तेमाल पर आगे बढ़ें, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि भारतीय उप महाद्वीप में उर्दू ने अपना सफ़र किस तरह तय किया और कैसे वह जनमानस के सोच में घुल गई. क्या इसे भुलाया जा सकता है कि सदियों पहले जो काफ़िले हिंदुस्तान की सरज़मीं पर आए, वो अपनी बोली भी तो लेकर आए थे. उस बोली में अरबी, फ़ारसी और वहाँ की स्थानीय बोलचाल के जुमले भी थे. ये लश्कर आए तो यहीं के होकर रह गए और उन्होंने हिंदी, संस्कृत, क्षेत्रीय भाषाओं और यहाँ की बोलियों को भी अपना लिया. ठीक वैसे ही जैसे आज हिंदी में अँगरेजी के अनेक शब्द घुल मिल गए हैं. यह अलहदा है कि मुल्क़ के बँटवारे के बाद उर्दू को लेकर ज्यादातर लोगों में उदासीनता का भाव समा गया है. ताज्जुब है कि उर्दू जैसा भाव अँगरेजी को लेकर नहीं है. अँगरेजों ने जो ज़ुल्म किए, हिंदुस्तान को जिस तरह से लूटा, उसके बाद भी अँगरेजी हमारी चहेती बनी हुई है. मैं किसी भाषा का विरोधी नहीं, लेकिन भाषा को लेकर उपजने वाले शत्रु या मित्र भाव का विरोधी हूँ. उर्दू ने हिंदुस्तान की मिट्टी में नहाकर भाषा का आकार लिया है. इसी वजह से तो मुस्लिम विश्व में भारतीय उप महाद्वीप की उर्दू शिद्दत से नहीं अपनाई गई. शायर बशीर बद्र जब कहते हैं कि उर्दू और हिंदी- संस्कृत की दो बेटियाँ हैं तो मुझे कुछ ग़लत नहीं लगता. और साहिर की भाषा क्या थी? यही तो थी, जो हमारी मिट्टी से उपजी थी. आज हम कवियों-शायरों-उपन्यासकारों-कहानीकारों को भाषा के आधार पर बाँट कर देखते हैं, लेकिन क्या आप भूल जाएँगे कि हिंदी के कथा सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद ने लेखन फ़ारसी मिश्रित उर्दू में शुरू किया था. क्या आप भूल जाएँगे कि रघुपति सहाय की पहचान फ़िराक़ गोरखपुरी से है. क्या आप भूल जाएँगे कि हिंदी के छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तो पहले हिंदी जानते ही नहीं थे. क्या आप भूल जाएँगे कि सम्पूरन सिंह कालरा की पहचान गुलज़ार से है.

और ज़रा पीछे जाइए. सौ बरस पहले गायत्री मंत्र का अनुवाद उर्दू में करने वाले इक़बाल का इरादा क्या हिंदू पंडितों को खुश करना था? जब उन्होंने नया शिवालय लिखी, तो उसका उद्देश्य कोई शिव भक्तों को खुश करना नहीं था. शिवालय में वो लिखते हैं- शक्ति भी, शांति भी, भक्तों के गीत में है/ धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है. इसी तरह नज़ीर अकबराबादी को लीजिए. क़रीब दो सौ बरस पहले नज़ीर गुरुनानक पर नज़्म लिखते हैं, कृष्ण भगवान पर लिखते हैं और होली के त्यौहार पर लिखते हैं तो उसका अर्थ कोई हिंदी और हिंदुस्तान को खुश करना नहीं रहा होगा. एक बार उनको पढ़ जाइए, हिंदी की किसी भी रचना से कम आनंद नहीं मिलता.

साफ है कि पचास-साठ के दशक तक आम हिंदुस्तानी के दिलों में भाषा का भेद नहीं था. उस समय हमारी साक्षरता का प्रतिशत क्या था और कितने लोग पढ़े-लिखे थे? आज जब हम पढ़ लिख कर सभ्यता की बुलंदियों पर पहुँचने का दावा करते हैं तो हमारे दिमाग़ सिकुड़ते जा रहे हैं. साहिर ने खुद अपने लेखन के बारे में लिखा था कि गीतकार को शब्दों के चुनाव में यह ध्यान रखना पड़ता है कि देश के अंदरूनी इलाक़ों में बसने वाले अनपढ़ लोगों को उसके गीत समझ में आएँगे अथवा नहीं. वो किसी भी इलाक़े में रहते हों, उनकी मातृभाषा हिंदी, उर्दू या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा हो, वो गीतकार के भाव अपने भीतर महसूस करते हैं या नहीं.

साहिर के गीतों में हम पाते हैं कि चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर फ़िल्मी, कभी भी जानबूझकर शब्दों का उपयोग नहीं किया गया. जो कलम से निकल कर बहते गए, वो गीत बन गए. अपवादों की बात मैं नहीं करना चाहता. वो तो कभी भी, कहीं भी हो सकते हैं. साहिर ने सिर्फ़ इश्क़िया मिज़ाज के गीत ही नहीं लिखे. उनमें आध्यात्मिक, जीवन दर्शन, सामाजिक, सांस्कृतिक सोच और आर्थिक असमानता लिए गीत या नज़्में भी हैं.शुरुआत आध्यात्मिक गीतों से कर सकते हैं.उन्नीस सौ चौवन में बनी फ़िल्म राधाकृष्ण में वो लिखते हैं-नित नित की ये रार कन्हाई, हमसे सही न जाए/ ढीठ लंगर, नटखट हरजाई, तोहे लाज न आए/ बाँसुरिया की टेर सुनाकर, हमको पास बुलाए/ हम आँए तो औरों के संग, हिलमिल रास रचाए/ एक और फ़िल्म आई थी- अरमान(1953). इसमें साहिर को देखिए-क्रोध कपट के अंधियारे में, जीवन ज्योति जगाए जा/ आते जाते साँस की धुन पे, हरीनाम गुण गाए जा/ ये जग है दो दिन का ठिकाना/ जोगी रे तोहे दूर है जाना/ तोड़ के मायाजाल के बंधन/ लौ ईश्वर से लगाए जा/

1974 में आई थी फ़िल्म- छत्तीस घंटे. इस फ़िल्म में साहिर की कलम से निकला- यहाँ बंधु आते को है जाना/ कोई हो, यहाँ बंधु आते को है जाना/ बोले ये हे बंधु तोसे, जल की लहर/ कल हो कहाँ किसको ख़बर/ बोले यही साँसों का तराना/ कोई हो, नहीं यहाँ किसी का ठिकाना. और 1955 की फ़िल्म देवदास में कृष्ण भक्ति में राधा के हाल का बयान देखिए- आन मिलो, आन मिलो, श्याम साँवरे/ बृज में अकेली राधे खोई खोई फ़िरे/ वृंदावन की गलियों में, तुम बिन जियरा न लागे/ निस दिन तुमरी बाट निहारे व्याकुल नैन अभागे/ अब ही ऐसी दशा है मन की/ का होई है फिर आगे/ बृज में अकेली राधे खोई खोई फ़िरे. 1958 में आई थी फ़िल्म साधना. इसमें अकिंचन साहिर रामजी के द्वार पर जाते हैं. लिखते हैं- तोरा मनवां क्यों घबराए रे/ लाखों दीन-दुखियारे प्राणी, जग में मुक्ति पाएँ रे/ रामजी के द्वार से.

1967 में प्रदर्शित नीलकमल में एक दुखियारी जगत के स्वामी के चरणों में अपनी भावना का अर्पण कुछ इस प्रकार करती है-हे ! रोम रोम में बसने वाले राम/ जगत के स्वामी, हे! अंतर्यामी/ मैं तुझसे क्या माँगूं?/ तेरे चरण की धूल जो पाए/ वो कंकर हीरा हो जाए/ भाग मेरे जो मैंने पाया/ इन चरणों में धाम/ जगत के स्वामी, हे! अंतर्यामी, मैं तुझसे क्या माँगूं?

एक फ़िल्म आई थी- नया रास्ता. इसके एक गीत में शब्दों के साथ गहराई और ऊँचाई दिखाई देती है. साहिर लिखते हैं- ईश्वर अल्ला तेरो नाम! सबको सन्मति दे भगवान/ ज़ातों नस्लों के बँटवारे, झूठ कहाये तेरे द्वारे/ तेरे लिए सब एक समान, सबको सन्मति दे भगवान. इसी तरह पचास साल पहले की फ़िल्म काजल में साहिर की कलम से निकला बेमिसाल गीत है- तोरा मन दर्पण कहलाए/ भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाए/ तोरा मन दर्पण कहलाए/ मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय/ मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय/ इस उजले दर्पण पर प्राणी, धूल न जमने पाए/ तोरा मन दर्पण कहलाए.

वैसे तो साहिर ने इस तरह की अनेक अनमोल रचनाएँ रचीं लेकिन जब वो आस्था के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो शब्दों के फूल उनकी अंजुली में भरे होते हैं और इन फूलों की खुशबू कहीं से भी खुसरो, रसखान, रहीम, कबीर, तुलसीदास, सूरदास या मीरा से कम नहीं होती. ये गीत दशकों से लोगों के दिलो दिमाग़ पर छाए हुए हैं और सैकड़ों साल तक छाए रहेंगे.

Sahir_poetअब बढ़ते हैं साहिर के जीवन दर्शन पर. साहिर के जीवन में पारिवारिक झंझटों और ज़िंदगी में ख़ालीपन ने उनका एक नया रूप पेश किया. इसमें उनका ज़िंदगी के प्रति नज़रिया स्पष्ट होता है. रेलवे प्लेटफॉर्म (1955) का यह गीत इसका शानदार उदाहरण है- बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाए बंजारा, लेकर दिल का इकतारा/ कदम कदम पर होनी बैठी, अपना जाल बिछाए/ इस जीवन की राह में, जाने कौन कहाँ रह जाए/ धन दौलत के पीछे क्यों है, ये दुनिया दीवानी/ यहाँ की दौलत यहीं रहेगी, साथ नहीं ये जानी/ बस्ती बस्ती……..

इकतीस बरस का युवा साहिर पक्की उम्र के किसी बुज़ुर्ग जैसा व्यवहार अपनी कलम से करता है. चालीस तक पहुँचते पहुँचते वो अपने फलसफ़े का बयान हमदोनों(1961) के इस गीत में करते हैं– मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया/ हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया/ जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया/ जो खो गया, मैं उसको भुलाता चला गया/ ग़म और ख़ुशी मे फ़र्क न महसूस हो जहाँ/ मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया.

तीन चार साल बाद चित्रलेखा आती है और साहिर स्थितप्रज्ञ की तरह सामने हैं. वो किसी से कुछ अपेक्षा नहीं करते. जिसने साथ दिया, उसका भी भला, जिसने नहीं दिया, उसका भी भला. इस तरह का संत भाव रखने वाले कितने रचनाकार हैं. ज़रा देखिए- मन रे! तू काहे न धीर धरे/ ओ निर्मोही मोह न जाने, जिनका मोह करे/ उतना ही उपकार समझ कोई, जितना साथ निभा दे/ जनम-मरण का मेल है सपना, ये सपना बिसरा दे/ कोई न संग मरे, मन रे तू काहे न धीर धरे. इसी फ़िल्म में वो मज़हबी संकीर्णता पर भी हमला बोलते हैं. शब्द शांत हैं, लेकिन चट्टान की तरह अटल. साहिर ने लिखा- संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे/ इस लोक को भी अपना न सके, उस लोक में भी पछताओगे/ ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या/ रीतों पर धर्म की मुहरें हैं/ हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे.

क्या किसी अन्य कवि या गीतकार ने इतनी खूबसूरती से इस तरह की बात कही है? इसी ऊँचाई पर जाकर दिल ही तो है(1963) में साहिर सन्देश देते हैं- कोरी चुनरिया आत्मा मोरी/ मैल है मायाजाल/ वो दुनिया मोरे बाबुल का घर/ ये दुनिया ससुराल/ जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे/ लगा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे?

ज़िंदगी के सफ़र में थक रहे मुसाफ़िरों के भीतर साहिर आशा का संचार करते हैं. उम्मीदों का चिराग़ जलाते हुए 1953 में आई फ़िल्म बाबला में उन्होंने लिखा-रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंज़िल दूर नहीं/ धरती के फैले आँगन में, पल दो पल है रात का डेरा/ज़ुल्म का सीना चीर के देखो, झाँक रहा है नया सवेरा/ ढलता दिन मजबूर सही, चढ़ता सूरज मजबूर नहीं.

उर्दू अदब से हों अथवा हिंदी के सितारे, फ़िल्मी दुनिया के हों या बाहर के- ऐसे शायर या कवि कम हैं, जिन्होंने जीवन के हर रंग को अपने शब्दों में उतारा है.प्रेम गीतों में साहिर ने मुहब्बत के अफसानों को उर्दू अदब की परंपरागत पहचान से उपर ले जाते हुए नया आयाम दिया.वियोग और श्रृंगार की जिन गहराइयों और ऊँचाइयों तक साहिर ले जाते हैं, वैसा प्रयोग कम ही दिखाई देता है. किसी भी शब्द सितारे को भूलने या उसे कमतर बताने का इरादा मेरा नहीं है. अनेक गीतकारों ने बेजोड़ और अमर इश्क़िया गीत रचे हैं, लेकिन जैसे ही साहिर की बात आती है- दिल यही कहता है कि जो बात साहिर में है, वो किसी और में नहीं. इस ज़बर्दस्त पूर्वाग्रह के लिए असहमत होने वालों से मुझे माफी माँगने में भी कोई हिचक नहीं है. हक़ीक़त तो यही है कि साहिर के दिल से निकली प्यार भरी आवाज सदियों तक गूँजती रहेगी. बानगी के तौर पर कुछ प्रेम गीतों को याद करना चाहूँगा. इनमें कहीं भी भाषा का कोई भेद नज़र नहीं आता. 1963 की फ़िल्म मुझे जीने दो के एक गीत की कुछ पंक्तियाँ देखिए- माँग में भर ले रंग सखी, आंचल भर ले तारे/ मिलन ऋतु आ गई/ कोई चांदी के रथ में आया है, मेरे बाबुल की राजधानी में/ मैं उसे देखती हूँ छुप छुप कर, इक हलचल सी है जवानी में/ तड़के इक इक अंग सखी, आज खुशी के मारे/ मिलन ऋतु आ गई.

और इसी फ़िल्म का एक गीत-रात भी है कुछ भीगी भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम मद्धम/ तुम आओ तो आँखे खोले, सोई हुई पायल की छम छम/ छम छम छम छम/ तपते दिल पर यूं गिरती है, तेरी नज़र से प्यार की शबनम/ जलते हुए जंगल पर जैसे/ बरखा बरसे रुक रुक थम थम/ छम छम छम छम.

इस आलेख में मेरी कोशिश साहिर के उन गीतों से बचने की रही है, जो हर दिल में धड़कते हैं और लोकप्रियता के सारे कीर्तिमान भंग कर चुके हैं. क्योंकि इन गीतों को तो वैसे ही सुननेवालों ने अपने भीतर बिठा रखा है. इसलिए मैने ऐसे गीतों का चुनाव किया है जिनमें हिंदी के शब्द साहिर के शब्द बन गए हैं. 1964 में एक फ़िल्म आई थी-चांदी की दीवार. इसमें साहिर ने लिखा- कुछ दिन से किसी के सपनों में/ तुम चुपके चुपके आते हो/ हाथों में हाथ पकड़ते हो, नैनों से नैन मिलाते हो/ कुछ कहते हुए रुक जाते हो/ वो बात कहो तो मैं कह दूँ/ जो कहने से तुम शरमाती हो, वो बात कहो तो मैं कह दूँ. धूल का फूल (1959) में एक नायिका के होठों पर साहिर के बोल कुछ इस तरह फूटे- धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया, जो तुम मुस्करा दो/ सँवर जाए हम बेक़रारों की दुनिया, जो तुम मुस्करा दो/ ये बोझल घटाएँ बरसती हुईं, ये बेचैन रूहें तरसती हुईं/ ये साँसों से शोले निकलते हुए, बदन आँच खाकर पिघलते हुए/ धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया……

इसके दो साल बाद की फ़िल्म हम दोनों के गीत ने काफी लोकप्रियता बटोरी. एक युगल गीत के बीच का टुकड़ा इस प्रकार था- सितारे झिलमिला उठे, चराग़ जगमगा उठे/ बस अब ना मुझको टोकना, न बढ़ के राह रोकना/ अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊँगी कभी/ यही कहोगे तुम सदा, कि दिल अभी नहीं भरा/ जो ख़त्म हो किसी जगह ये ऐसा सिलसिला नहीं/ अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं. और 1975 में आई फ़िल्म अमानत को आप कैसे भूल सकते हैं. एक यादगार रात नायक नायिका से कहता है- दूर रहकर न करो बात, क़रीब आ जाओ/ /याद रह जाएगी ये रात, क़रीब आ जाओ/ एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हे छूने की/ आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ/ इस क़दर हमसे झिझकने की ज़रूरत क्या है/ ज़िंदगी भर का है अब साथ, क़रीब आ जाओ.

प्रणय गीतों के बाद बारी ऐसे गीत की, जो उत्तर भारत के गाँव-गाँव में हर शादी ब्याह का सुबूत बनता है और लोगों को रुलाता है. क्या इन भावों को आप भाषा की किसी हद में बांधना चाहेंगे? फ़िल्म नीलकमल(1968) का ये गीत है- बाबुल की दुआएँ लेती जा/ जा तुझको सुखी संसार मिले/ मैके की कभी न याद आए/ ससुराल में इतना प्यार मिले/ बीते तेरे जीवन की घड़ियाँ, आराम की ठंढ़ी छाँव में/ कांटा भी न चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाँव में/ उस द्वार से भी दुख दूर रहे, जिस द्वार से तेरा द्वार मिले/ बाबुल की दुआएँ लेती जा.

इस आलेख का समापन मैं ऐसे गीत से करना चाहूँगा, जो क़रीब 60 साल से देश का चहेता गीत है. इसे सुनकर मन अपने मुल्क़ को लेकर गर्व से भर जाता है. नया दौर का ये गीत है– ये देश है वीर जवानों का/ अलबेलों का, मस्तानों का/ इस देश का यारो क्या कहना/ ये देश है दुनिया का गहना/ पेड़ों में बहारें झूलों की/ राहों में कतारें फूलों की/ यहाँ हंसता है सावन बालों में/ खिलती हैं कलियाँ गालों में/ इस देश का यारो क्या कहना…..

जिस तरह सूरज की किरणों की कोई सरहद नहीं होती, बहते हुए झरने का कोई मज़हब नहीं होता और ठंडी हवाओं की कोई भाषा नहीं होती, वैसे ही साहिर के गीत और भावों को आप किसी एक ज़बान में बांध नहीं सकते. अफसोस! हमारे विश्वविद्यालयों ने आज तक साहिर की पोइट्री पर कोई गंभीर काम नहीं किया. उन लोगों को पूरा सम्मान देना चाहता हूँ, जिनपर शोध ग्रंथ लिखे गए, पीएचडी हुईं. मगर शिक़ायत है कि हमारे शैक्षणिक ढाँचे में आख़िर कब साहिर जैसे शायरों पर शोध का नियमित सिलसिला शुरू होगा. किताबें आती रहेंगी और लोग पढ़ते रहेंगे, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आने वाली नस्लों तक इस जादूगर का जादू पहुँचता रहेगा. क्या हमारा सिस्टम या सरकारें इस दिशा में कभी सोचेंगीं? साहिर की शायरी सिर्फ अदबी नहीं है, बल्कि वो हिंदुस्तान के कुछ दशकों के सफ़र का दस्तावेज भी है. इस दस्तावेज पर अभी बहुत काम बाकी है.