नदी कथाः गंगा पर भाषण से ऊपर उठने का वक़्त

Abhay Mishra

modi_banaras400हमें उम्मीद नहीं कि हम अपने जीते जी गंगा को उसके मूल रूप में देख पाएगें लेकिन क्या भावी पीढ़ी को हम एक अविरल और निर्मल गंगा नहीं दे सकते? सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की बातों में निराशा और उम्मीद दोनों ही झलक रहे थे. तीरथ सिंह ठाकुर और आर भानुमति की खंडपीठ ने केंद्र को लताड़ लगाते हुए, गंगा पर दाखिल हलफनामे को यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि वह गोलमोल बोल रहा है और पुराना राग ही दोहरा रहा है. संदेश साफ था कि गंगा पर अब काम होना चाहिए… सिर्फ काम.

पिछले महीने जब कोर्ट ने गंगा पर प्राथमिकता के आधार पर काम ना होने पर सरकार को आड़े हाथों लिया और गंगा पर हलफ़नामा दायर करने को कहा तब केंद्रीय गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा था कि कोर्ट की टिप्पणी उनके लिए नहीं पिछली सरकार के लिए थी, जिसने गंगा को हमेशा दोयम दर्जे की नदी समझा. उनका दावा था कि हमारे लिए गंगा से बढ़कर और कोई दूसरा काम नहीं है. लेकिन उनके मंत्रालय के नौकरशाहों तक वे अपनी भावनाएं पहुंचाने में नाकाम रही. सुप्रीम कोर्ट के तीन सितंबर के आदेश के बाद सभी ने चुप्पी साध ली है.

बहरहाल निर्धारित तारीख से एक दिन पहले 2 सितंबर को सालिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने गंगा को स्वच्छ करने के लिए अब तक किए गए प्रयास और भविष्य की योजना व प्रस्ताव का ब्योरा कोर्ट के सामने रखा. उन्होंने कहा, ‘सरकार गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. सरकार के लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है बल्कि बहुत खास अहमियत रखती है. गंगा हमारी पहचान है.’ उन्होंने गंगा एक्शन प्लान के दोनों चरणों का ब्योरा देते हुए बताया कि इसके तहत गंगा के क्षेत्र में पड़ने वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड के लिए 78 योजनाएं बनीं. इसमें जापान और व‌र्ल्ड बैंक से भी आर्थिक मदद मिली.

रंजीत कुमार ने ब्यौरा देते हुए कहा, ‘गंगा में प्रदूषण के मुख्यत: तीन कारण हैं. पहला, उद्योगों से होने वाला प्रदूषण क्योंकि उनके पास कचरा शोधन संयंत्र नहीं हैं. दूसरा, धार्मिक आस्था से जुड़ा है जिसमें गंगा के विभिन्न घाटों पर दाह संस्कार होता है और तीसरा व सबसे अहम कारण बढ़ती आबादी है. कस्बों और शहरों का लगातार विस्तार हो रहा है. स्थानीय निकाय ठीक से अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे. सीवर और कचरे के प्रबंधन व सफाई पर वे ध्यान नहीं दे रहे. गंगा रिवर बेसिन अथारिटी भी बनाई गई है जिसके जरिये और प्रभावी ढंग से योजनाओं को लागू किया जा रहा है.

रंजीत कुमार अभी बोल ही रहे थे कि न्यायाधीशों ने उन्हे रोक दिया. जज ने सख्त लहजे में कहा कि इसमें नया क्या है, गंगा के बारे में यह भाषण हम पहले भी कई बार सुन चुके है. जो ब्यौरा आपने दिया है वह नौकरशाहों की ‘सिर्फ बातें करने वाली शैली’ पर आधारित है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह तो 200 साल में भी गंगा साफ नहीं हो पाएगी.

सालिसिटर जनरल ने समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि सरकार गंगा के पुनर्जीवन को ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता” देती है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसने उपयुक्त रणनीति और कार्यबिंदु तैयार किए हैं. उन्होंने कहा कि नदी के पारिस्थितिकीय प्रवाह को कायम रखना, विभिन्न प्रकार के प्रदूषण को रोकना और घटाना, पारिस्थिकीय पवित्रता को बहाल करना, नदी संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना व इन कार्यों में जनभागीदारी सुनिश्चित करना इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं. लेकिन कोर्ट इन बातों से प्रभावित नहीं हुआ.

न्यायधीशों की खंडपीठ ने साफ किया कि गंगा पर उस भाषा में बात कीजिए जो आम आदमी की समझ में आए.

गंगा नदी को स्वच्छ बनाने की प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी परियोजना धीरे धीरे सुप्रीम कोर्ट की महत्तवकांक्षी परियोजना में तब्दील होती जा रही है. मंत्रालय के अधिकारी कोर्ट को संतुष्ट करने के लिए नए जवाब तैयार करने में जुटे है. कोर्ट ने चरणबद्ध योजना मांगी है. पीएमओ भी इसमें सीधे हस्तक्षेप कर रहा है ताकि 24 सितंबर को जब मामला जजों के सामने आए तो सरकार को शर्मिंदा न होना पड़े. उससे बढ़कर यह कि जनता में यह संदेश जाए कि गंगा के व्यावहारिक समाधान निकाले जा रहे हैं. लेकिन यह भी सच्चाई है कि बांधों पर सरकार की चुप्पी बेहद नकारात्मक संकेत दे रही है.

चरणबद्ध तरीकों में सबसे पहले गंगोत्री से उत्तरकाशी तक 135 किलोमीटर की नदी के पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारें में अवगत कराया जाना चाहिए. क्योंकि 2003 की अधिसूचना के बाद से कोई कदम उठाया ही नहीं गया है. सरकार कह सकती है कि इस 135 किलोमीटर का प्राकृतिक स्वरूप हर हाल में बरकरार रखा जाएगा और इस आगे बढ़ाया जाएगा. हलफनामे का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू औद्योगिक इकाइयों पर अंकुश लगाने का होना चाहिए. अदालत ने भी इसका जिक्र करते हुए कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सरकार की हर संभव मदद करेगी. यह कदम भरोसा पैदा करेंगे लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए.