नया दौर में शिक्षा की बदलती तासीर

Sandeep Yash
File photo: education, elementary school, E-learning during lockdown

File photo: education, elementary school, E-learning during lockdown

कोविड 19 ने दुनिया और उसके निजाम को उम्मीद से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदल डाला है। क्या सरकार, क्या संस्थाएं और क्या इंसान -सब दूरगामी योजनाएं बनाने में जुट गए हैं। मार्च में इस महामारी के प्रसार के चलते सारे शिक्षण संस्थान बंद करने पड़े। इसका असर सीधा करीब 32 करोड़ शिक्षार्थियों के साथ साथ  स्कूली शिक्षा के तौर तरीकों, मूल्यांकन और बुनियादी संरचना पर पड़ा। नतीजतन, अप्रैल आते आते ऑनलाइन टीचिंग प्लेटफार्म का प्रसार तेज़ी से हुआ। पिछले 20 वर्षों में ऑनलाइन शिक्षण की आधी अधूरी कोशिशें कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कौशल विकास कंपनियों, कॉर्पोरेट शिक्षण केंद्रों में होती रही है । पर अधिकांश नीतिगत स्तर के बदलाव भी फलीभूत नहीं हुए। कुल मिला कर मामला प्रयोग स्तर तक सीमित रहा। तो आज महामारी के बाद स्कूली शिक्षा की सूरत क्या हो सकती है -जान लीजिये इस क्षेत्र के उतार -चढ़ाव का अर्थव्यवस्था पर गहरा असर होगा। तो इसी मुद्दे पर कुछ मोटी मोटी बातें करते हैं।

इतिहास में झाकेँ तो शिक्षा प्रणाली में बदलाव का ये चौथा दौर कहा जा सकता है।  पहले तीन ये रहे
1. गुरुकुल प्रणाली (कुछ विद्यार्थियों के लिए एक मास्टर)
2, पारंपरिक विश्वविद्यालय प्रणाली (एक शिक्षक और कई शिक्षार्थी)
3 . दूरस्थ शिक्षा (Distance learning)  (एक स्पेक्ट्रम बहुत से शिक्षार्थियों के लिए)

नीति आयोग से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि आज इस माहमारी ने सदियों पुराने चाक -टॉक शिक्षण मॉडल को तकनीक से बदल डाला है। और नीति निर्माताओं के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ पेश की हैं – एक inclusive e -learning mechanism बनाने की और दूसरी, देश में पसरे digital divide को कम करने की।
तो इस संकट से उबरने के लिए एक लंबी अवधि वाली लचीली देसी शिक्षा प्रणाली गढ़ने की ज़रुरत है – जैसे

1. Deeksha जैसे ओपन-सोर्स डिजिटल लर्निंग सॉल्यूशंस और लर्निंग मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर को अपनाया जाए। और इन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से सरकारी स्कूलों और विश्विद्यालयों में ऑनलाइन शिक्षण की निरंतरता सुनिश्चित की जाए।

2 . भारत में मोबाइल इंटरनेट 2024 तक 85% घरों तक पहुंचने की उम्मीद है। इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल सबसे कमजोर और हाशिए पर पड़े तबके के लिए समावेशी या inclusive शिक्षण समाधान विकसित किया जाना है।

3. कक्षा शिक्षण को E -Learning
मोड के साथ जोड़ कर एक नयी प्रणाली बनाना प्राथमिकता होगी। ये कोई आसान काम नहीं है। UDISE के आकड़ों के मुताबिक़ भारत में दुनिया का सबसे बड़ा और विविध एजुकेशन सिस्टम है जिसमे 15 लाख से ज़्यादा स्कूल, 25 करोड़ से ज़्यादा छात्र, स्कूल स्तर पर 94 लाख  शिक्षक और 50 हज़ार से ज़्यादा उच्च शिक्षण संस्थान शामिल हैं।

4. भारतीय पारंपरिक ज्ञान दुनिया भर में अपने innovations, मूल्यों, स्थायी प्रौद्योगिकियों और दवाओं के विकास के लिए जाना जाता है। ये सही समय है जब तकनीक को योग, भारतीय दवाओं, वास्तुकला, हाइड्रोलिक्स, एथ्नोबोटनी, धातु विज्ञान और कृषि के क्षेत्र में भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जोड़ा जाना चाहिए।

आज सरकार के लिए भी शिक्षा क्षेत्र को एक नए ढांचे में व्यवस्थित करने का चुनौतीपूर्ण पर स्वर्णिम मौका है।
– स्वयंप्रभा इस दौर में हुई एक बड़ी पहल है। इसका लक्ष्य खासकर उन इलाकों तक पहुंचना है जहाँ इंटरनेट सेवाएं दुबली है।  इस पहल के तहत देश भर में DTH (Direct to Home) 24×7 के माध्यम से 32 उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक चलाये जा रहे हैं।  इन चैनल्स का कंटेंट IIT, UGC, NCERT जैसी संस्थाएं डिज़ाइन करती हैं।

– MHRD से जुड़े राष्ट्रीय संस्थान तकनीक का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं।  ये संस्थान ऑडियो-वीडियो मोड और ई-पुस्तकों और पत्रिकाओं के माध्यम से शिक्षा  प्रदान करने में सबसे आगे हैं।

-भारतीय डिजिटल लाइब्रेरी (एनएलडीआई) में पत्रिकाओं और पुस्तकों के डिजिटल रिपॉजिटरी की सिंगल विंडो व्यवस्था है जिसका इस्तेमाल शिक्षार्थियों द्वारा किया जा सकता है।

– MHRD ने वर्चुअल लैब्स की भी व्यवस्था की है जहाँ छात्र असल पर्यावरण का आभास पाते हैं।

तो अब चलिए देखते है कि चुनौतियाँ किस शक्ल में हैं।

– भारत में इंटरनेट की पहुंच फिलहाल 36 प्रतिशत है, प्रति 100 पर इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 78 है, प्रति 100 पर ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन सिर्फ 1.34 है, और कुल 46 प्रतिशत परिवारों के पास ही टेलीविजन है।  ऐसे में लक्षित शिक्षा के रास्ते तय करना कठिन हो जाता है।

–  इसके अलावा स्थानीय बिजली आपूर्ति, डिवाइस की उपलब्धता, शिक्षकों और छात्रों के डिजिटल कौशल का स्तर वगैरह

– सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती मेट्रो शहरों, टीयर 1 और 2 शहरों से बाहर टीयर 3 और 4 शहरों से संचालित होने वाले संघर्षरत स्कूलों और संस्थानों को एक मंच पर लाना है । रिमोट-लर्निंग तकनीक के अनुकूल बनाना है, समान मानक गढ़ने है और इनके बीच पसरे डिजिटल डिवाइड को दूर करना है।

– छात्रों की गतिविधियों को दूर से नापने के लिए एक मुक्कमल निगरानी पद्धति बनाना एक बड़ी चुनौती है

– छात्रों के लिए शिक्षकों का पर्याप्त ऑनलाइन शिक्षण, मार्गदर्शन सुनिश्चित करना

– शिक्षकों को डिजिटल मोड में लाना और शिक्षण के तंत्र में छात्रों / माता-पिता को ईमेल करना, ऑनलाइन वीडियो क्लिप बनाना और अपलोड करना, ऑनलाइन ‘लाइव’ वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग, ऑनलाइन निर्देश जैसे घटकों को शामिल करना

– दिन-प्रतिदिन डिजिटल संचालन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा के लिए सभी स्तरों पर शिक्षकों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना

– एक बड़ी चुनौती  डिजिटल माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों का मूल्यांकन करना होगा

– और ये भी बहस का मुद्दा है कि क्या ई-लर्निंग -उच्च-स्तरीय शिक्षण कौशल जैसे रचनात्मकता, समस्या का समाधान और जिज्ञासा जैसे सवालों पर खरी उतारेगी

फिलहाल, समाधान के तौर पर UNESCO स्कूलों की Clustering कुछ इस तरह  से करने की बात करता है जिससे शिक्षक नेटवर्क बना सकें और हेडटेचर्स, कोच, विषय-वस्तु विशेषज्ञों से मदद ले सकें। पर शिक्षकों और पेरेंट्स का एक वर्ग है जो मानता है कि एक शिक्षक-छात्र का संबंध, संवाद और अनुशासन केवल असली कक्षा में ही गढ़ा जा सकता है।  ऑनलाइन लर्निंग किसी एक विशेष समय में ही एक अच्छा विकल्प हो सकती है। लेकिन यह कक्षा की जगह नहीं ले सकती क्योंकि जीवन कौशल सीखने के लिए असल दुनिया में जाना पड़ता है।

जाते जाते – एक कहीं बड़े वर्ग का कहना है कि निकट भविष्य दोनों ही प्रणालियों का समायोजन होगा यानी इनका समान महत्त्व होगा। जो विघटन आज के दौर की सच्चाई है, डिजिटल तकनीक तय करेगी किआगे ऐसा न हो। शिक्षा चक्र न टूटे। स्कूलों के भारी बैग हलके हों। होमवर्क ऑनलाइन हों।  और शिक्षा उन कोनो में पहुंचे जहाँ उसकी सख्त ज़रुरत है। इसमें समय लग सकता है। लेकिन यहअब सुनिश्चित करना ही होगा। नए दौर की सीधी और सपाट सच्चाई आपके सामने है।