नारी तू कल्याणी

Sandeep Yash
Represantative image: Girl Education

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बेटियों का विकल्प नहीं है। जान लीजिये। इस अंतहीन पर निहायत ज़रूरी विषय पर मोटी मोटी बात करते हैं जैसे मानवता के विकास में पहली सीढ़ी से लेकर आजतक इनके सशक्त हस्ताक्षर हैं। पर अब ऐसा क्या हुआ है की इनके अस्तित्व के लिए बाकायदा योजनाएं चलानी पड़ रही हैं, नारे गढ़ने पड़  रहे है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बेटियों के सामाजिक मूल्य को शिक्षा, रोजगार, मृत्यु और जीवन दर जैसे कारकों पर मापा जा सकता है। तो सवाल ये कि फिर देश में लिंगानुपात और बेटियों की शिक्षा वक़्त के साथ घाटी क्यों। अंतराष्ट्रीय संस्था Population Council की एक रिपोर्ट के मुताबिक़

-1871 में ब्रिटिश भारत में पहली राष्ट्रीय जनगणना हुई थी जिसमे  हर 100 पुरुष के मुक़ाबले 95 महिलाओं होने की पुष्टि हुई थी।
– भारत में महिलाओं का अनुपात पिछले 12 दशकों में कम रहा है
– 20 वी सदी की शुरुआत से लिंगानुपात की हर गणना में लगातार 1% तक गिरावट दर्ज़ हुई है

इस रिपोर्ट की पुष्टि Census India के आकड़ों से होती है

S.N. Census Year Sex Ratio ( females/1000 males)
1. 1901 972
2. 1911 964
3. 1921 955
4. 1931 950
5. 1941 945
6. 1951 946
7. 1961 941
8. 1971 930
9. 1981 934
10. 1991 927
11. 2001 933
12. 2011 943

ये तस्वीर साफ़ कहती है की बेटी बचाना क्यों ज़रूरी है। और बेटी पढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी -ये नीचे दिए आकड़े बताते हैं

S.N. Census year Persons Gap in Male- Female Literacy Rate (in %)
1. 1901 5.4 9.2
2. 1911 5.9 9.6
3. 1921 7.2 10.40
4. 1931 9.5 12.7
5. 1941 16.1 17.6
6. 1951 18.33 12.30
7. 1961 28.3 25.05
8. 1971 34.45 23.98
9. 1981 43.57 26.62
10. 1991 52.21 24.84
11. 2001 64.83 21.59
12. 2011 74.04 16.68

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय मोटे तौर पर इन वजहों को ज़िम्मेदार मानता है ।

– लड़कियों को उचित भोजन की कमी, स्वास्थ्य की देखभाल न होना
– अर्थव्यवस्था का लाभ गरीब ग्रामीण और शहरी महिलाओं तक न पहुंचना
– महिलाओं की सामाजिक हैसियत में गिरावट आना
– बेटे की चाह
– दहेज का दबाव
– तकनीक का गलत इस्तेमाल

फिलहाल गंभीर होते हालात की झलक रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त द्वारा किये गए सर्वे में मिलती है। 2014 -2016 में बाल लिंगानुपात 898 तक आ गया था।  2015 -2017 में ये और घट कर 896 हो गया था। दिलचस्प बात तो ये थी कि हालात ग्रामीण इलाकों में हालत शहरों से बेहतर थे- यानी बेटियों का भविष्य ग्रामीण आंचलों में बेहतर था। फिलहाल सरकार के लिए जनहित और राष्ट्रहित में इसका संज्ञान और निवारण दोनों ज़रूरी हो गया था।

जल्द पहल हुई – प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को पानीपत, हरियाणा से बेटी बचाओ, बेटी पढाओ (BBBP) योजना शुरू की। इसका मक़सद देश में घटते child sex ratio (CSR) (0- 6 years) को रोकना था। शुरुआत 100 सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िलों से हुई।  यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सामूहिक और सिलेसिलेवार राष्ट्रीय पहल है। लक्ष्य बाल लिंग अनुपात में सुधार करना है जिसका सकारात्मक असर आगे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर परिलक्षित होगा।

BBBP योजना के तहत केंद्र सरकार
–  जिला स्तर पर बेटियों की शिक्षा के लिए 100% सहायता देती है –
–  (जनगणना 2011 के अनुसार) पहले दो चरणों में 161 जिलों को कवर करने के बाद, तीसरे चरण में बाकी 479 ज़िलों को कवर करने का लक्ष्य रखा है
–  इसका लक्ष्य चुनिंदा जिलों में जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार करना है।
– समाज से संवाद कर बेटी और बेटे में भेद मिटाना है।  भ्रूण हत्या रोक बेटियों को बचाना है
– इसमें प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer) का कोई प्रावधान नहीं है।

और पिछले 6 बरसों में हुए सतत प्रयासों के नतीजे भी दिखने लगे हैं।  इसी बरस 4 फरवरी को अपनी बजट स्पीच में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि BBBP योजना के चलते –
–  लड़कों की तुलना में अब शिक्षा के सभी स्तरों पर बेटियों का gross enrolment ratio बढ़ा है।
प्राथमिक विद्यालय स्तर पर – 94. 32%
सेकेंडरी लेवल पर – 81. 32%
हायर सेकेंडरी लेवल पर – 59.7% हो गया है

इसके अलावा Health Management Information System (HMIS), स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़
–  हरियाणा का बाल लिंगानुपात 2019 में बढ़ कर 914 /1000 हो गया है
–  104 लक्षित जिलों में Sex Ratio at Birth (SRB) में सुधार आया है
–  119 जिलों में पहली तिमाही के एंट-नेटल केयर रजिस्ट्रेशन में इजाफा हुआ है
–  146 जिलों में संस्थागत प्रसव में सुधार हुआ है

WCD मंत्रालय ने ”Chronicles of Change Champions” नाम की पुस्तक इसी मार्च निकाली है जो 25 ज़िलों में हुई 25 अभिनव पहलों का संकलन है। इन्ही अनूठी पहलों के माध्यम से जिला प्रशासन और फ्रंटलाइन वर्कर्स ने BBBP योजना को सफलतापूर्वक ज़मीन पर उतारा।

साथ ही अभी 27 जुलाई को National Task Force की बैठक में BBBP की प्रगति पर विचार – विमर्श हुआ। SRS 2018 के डाटा के मुताबिक़ राष्ट्रीय स्तर पर ”जन्म के समय लिंग अनुपात” (Sex Ratio at Birth) में तीन पॉइंट का सुधार आया है। ये 896 से बढ़ कर 899 हो गया है। मिली योजना में 15 राज्यों ने अच्छी प्रगति दिखाई है – इस फेहरिस्त में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, असम और जम्मू एवं कश्मीर शीर्ष पर हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना अब जिला स्तर पर जड़े पकड़ रही हैं जो राष्ट्र के लिए शुभ संकेत है।

आज इस योजना के तहत ज़मीनी स्तर पर जागरूकता अभियान चल रहे हैं। प्री कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक (पीसी एंड पीएनडीटी) एक्ट, जच्चाओं का प्री-नेटल / पोस्ट नेटल केयर, स्कूलों में बेटियों के बढ़ते एडमिशन, कम्युनिटी एंगेजमेंट / ट्रेनिंग / अवेयरनेस जनरेशन पर भी पैना काम चल रहा है। 2018 -2019 से देश के सभी 640 जिलों को BBBP योजना के तहत कवर किया गया है।

जाते जाते – Ministry of Statistics and Programme Implementation के मुताबिक़ 2020 में भारत का राष्ट्रीय लिंगानुपात 924 /1000 है। ये तभी बढ़ेगा जब बाल लिंगानुपात स्वस्थ होगा। इस मामले में अभी भारत दुनिया के 201 देशों में से 189 वें स्थान पर है। एशियाई देशों में भारत – 51 में से 43 वें स्थान पर है।  तो जान लीजिये कि सामना सदियों पुरानी जड़ मानसिकता से है। सरकार कानून बना सकती है, लागू कर सकती हैं।  पर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे प्रगतिशील और दूरगामी मिशन की सफलता हमारे घरों से शुरू होती है- हमारी बेटियों से, जो आधी आबादी हैं। तो बेटी को बढ़ाएं, बुढ़ापे का सहारा सिर्फ बेटे ही नहीं होते।