नेपालः राहत और बचाव का कइयों को है इंतज़ार

Vimal Chauhan

Earthquake3पांच दिन तक सुनीता मौत के साथ एक-एक सांस जी रही थी. लेकिन ज़िंदगी थकने को तैयार नहीं थी. राहत दस्ते ने मलबे में फंसी सुनीता सीतोला को बाहर निकाला तो उसके लिए यह एक नई दुनिया, एक नई ज़िंदगी से कम नहीं था.

लेकिन सुनीता की तरह कितने ही लोग अभी भी मकानों, इमारतों के मलबे में दबे हुए हैं जहाँ उनके हिस्से में राहत का इंतज़ार और बची-खुची सांसें हैं.

नेपाल में गत शनिवार आए भूकंप में मरनेवालों की संख्या अब 5000 के पार हो चुकी है. लेकिन अभी भी माना जा रहा है कि ध्वस्त इमारतों और अन्य जगहों पर मलबे के नीचे जीवन की संभावना हो सकती है.

इन लोगों को जीवन रहते मलबे से बाहर निकाल पाना ही सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है और इसी काम को सबसे पहले और तेज़ी से किए जाने की आवश्यकता भी है.

काठमांडू घाटी और भूकंप से सबसे ज्यादा प्रभावित ग्रामीण पहाड़ी इलाकों में हज़ारों की संख्या में लोग अब भी मलबे में दबे हुए हैं.

मंगलवार को एनडीआरएफ की आपदा राहत टीम ने पांच दिनों से मलबे में दबी हुई सुनीता सीतोला नामक नेपाली महिला को सुरक्षित बाहर निकाला. सुनीता को पास के एक अस्पताल ले जाया गया, जहां पर उसने कहा कि उसे लग रहा है मानो वह अलग दुनिया में हो.

नेपाल दुनिया के सबेस ग़रीब देशों में से एक है और इसलिए उसके पास संसाधनों और प्रयासों की अपनी सीमाएं हैं. ऐसे में बाहरी देशों से मिलनेवाली मदद नेपाल के लिए एक बड़ी राहत है. भारत अपनी मित्रता और पड़ोसी होने के नाते इस ज़िम्मेदारी को निभा रहा है.

नेपाल के नेताओं और अधिकारियों ने भारत की ओर से अबतक किए गए प्रयासों की सराहना भी की है. इसके अलावा चीन की ओर से भी नेपाल को मदद मिल रही है और वहां पर व्यापक पैमाने पर बचाव कार्य किया जा रहा है.

राहत की ज़रूरत

लेकिन चुनौती अभी कठिन है. मौसम की प्रतिकूलता और सूचनाओं, पहुंच की अपनी सीमा के चलते राहत अबतक ग्रामीण इलाकों में उस स्तर पर नहीं पहुंच पा रही है, जिसकी तुरंत ज़रूरत है.

बचाव दल अभी तक लामजुंग के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों तक नहीं पहुंचे हैं. लामजुंग इस भूकंप का केंद्र था. भारतीय रक्षा दल के जवान गोरखा जिले जैसे सुदूर इलाकों में भी जा रहे हैं. भूकंप का केंद्र इसी जिले में था. बचावकर्मी गोरखा, धाडिंग, सिंधुपालचोक, कावरे और नुवाकोट समेत विभिन्न जिलों के उन गांवों में अब तक नहीं पहुंच पाए हैं, जो इस भूकंप में सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं.

माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में लोगों को निकालने के प्रयास को और गति दी जाएगी और साथ ही मृत लोगों के शवों को बाहर निकालने का काम भी तेज़ी से करना होगा क्योंकि पांच दिन से मृत लोगों के शव अब खराब होने लगे हैं और तुरंत इनको न निकालने से बीमारियों और महामारियों का खतरा बढ़ सकता है.

इसके साथ साथ नेपाल के अधिकारियों के सामने दूसरी बड़ी ज़िम्मेदारी लोगों के पुनर्वास, चिकित्सा और भोजन की है. पानी और न्यूनतम आहार के लिए नेपाल के हज़ारों प्रभावित लोगों को रोज़ राहत सामग्री पर आश्रित रहना पड़ रहा है.

लोगों के दिमाग पर भूकंप और उसके बाद के झटकों का प्रभाव इतना व्यापक है कि अभी भी बड़ी तादाद में लोगों ने मैदानों, खेल परिसरों, पार्कों आदि को अपनी शरणगाह बना रखा है और अस्थायी डेरों में ये लोग रात और दिन काट रहे हैं.

ऐसे में शरीर और इस्तेमाल की गई चीज़ों के कारण पैदा हो रही गंदगी से निपटना, लोगों को पीने योग्य पानी उपलब्ध करा पाना और उन्हें वापस उनके घरों में भेजने के लिए पुनर्निर्माण और प्रवास की तैयारी नेपाल के लिए एक बड़ी चुनौती है.

नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत रॉय ने मंगलवार को नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोराइला से मुलाकात कर उन्हें ऑपरेशन मैत्री के तहत चले रहे बचाव एवं राहत कार्यों की जानकारी दी.

भारत ने बुधवार को 6 और एनडीआरएफ की टीमें नेपाल भेजी हैं, जिससे नेपाल में एनडीआरएफ की टीमों की संख्या 16 हो गई है. एक एनडीआरएफ की टीम में 45 सदस्य होते हैं.

बुधवार को भारतीय वायुसेना ने भी एवरेस्ट पर फंसे 11 वर्षीय बच्ची समेत 16 पर्वतरोहियों की जान बचाई. ये पर्वतारोही एवरेस्ट तक जाने वाले रास्ते में बीच में फंसे हुए थे. अपने पहले एवरेस्ट मिशन पर आए पर्वतारोही राकेश निभजया ने बताया कि हमें कुछ फोन काल्स के द्वारा पता लगा कि नेपाल में भूकंप आया है. हम भूंकप से बचने के लिए होटल से बाहर आए. फिर हम किराये एक हैलीकॉप्टर की मदद से लुकला तक आए और वहां से भारतीय वायुसेना द्वारा हमें बचाया गया.

राहत के लिए नेपाल की ओर अभी कितने ही हाथ बढ़ रहे हैं. ज़रूरत है कि इसे सही जगह पर और वक्त रहते पहुंचाया जा सके. और राहत के इस भाईचारे को यहीं रोकना भी बेमानी हो जाएगा यदि सहयोग कर रहे देश नेपाल के पुनर्निर्माण में जुटते नहीं हैं.